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नज़्म
न गर्मियों का ज़ोर है न सर्दियों की मार है
न धूप तन पे बार है न ठण्ड नागवार है
मोहम्मद शफ़ीउद्दीन नय्यर
नज़्म
मेरे होंट कोहरे की ठण्ड की तरह सफ़ेद पड़ गए हैं
वो अब बोलने के बजाए ज़ियादा कपकपाने लगे हैं