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नज़्म
मोहम्मद हनीफ़ रामे
नज़्म
थर-थर का ज़ोर उखाड़ा हो बजती हो सब की बत्तीसी
हो शोर फफू हू-हू का और धूम हो सी-सी सी-सी की
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
सुब्ह-सलोनी गर्म चाय की प्याली ले कर दौड़ी
कैसा थर-थर काँप रहे हैं हाए दिसम्बर बाबा
अब्दुर्रहीम नश्तर
नज़्म
ठंडी ठार पलकें भी नहीं झपकतीं
पलकों की झालरें सफ़ेद हो जाती हैं बर्फ़ बन कर उन में अटी रहती है
नसरीन अंजुम सेठी
नज़्म
सर से पा तक जिस्म को ढाँपें आया मौसम जाड़े का
लेकिन फिर भी थर थर काँपें आया मौसम जाड़े का