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नज़्म
जी में आता है कि अब अहद-ए-वफ़ा भी तोड़ दूँ
उन को पा सकता हूँ मैं ये आसरा भी तोड़ दूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
उट्ठे हैं जिस की गोद से आज़र वो क़ौम है
तोड़े हैं जिस ने चर्ख़ से अख़्तर वो क़ौम है
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मिरे दादा जो ब्रिटिश फ़ौज के नामी भगोड़े थे
न जाने कितनी जेलों के उन्हों ने क़ुफ़्ल तोड़े थे
नश्तर अमरोहवी
नज़्म
इक गूँज नए अंदाज़ की है कत्थक के धमकते तोड़े में
मुरली की सुहानी संगत को ताऊस-ओ-रबाब आ जाते हैं
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
ये भी तोड़े जा रहे हो आशियाँ बनने तो दो
मैं तो बूढ़ा भी नहीं नॉस्टेलजिया बनने तो दो