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नज़्म
ब-ज़ाहिर गो हम इक तूदा हैं बिल्कुल राख का लेकिन
अगर चाहें तो ख़ाकिस्तर से कर दें सौ शरर पैदा
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
ग़रज़ ऐसी बहुत सी ख़ूबियाँ थीं मौत ने लेकिन
बना डाला मिरे आतिश-कदे को ख़ाक का तूदा