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नज़्म
आम तख़मीने के रू से उन की तादाद-ओ-शुमार
तूल-ओ-अर्ज़-ए-मुल्क में थी दो करोड़ इकसठ हज़ार
रज़ा नक़वी वाही
नज़्म
कि शामें शबों में और शबें उजले सवेरों के
तसलसुल में गुँधी तूल-ए-अबद उम्र-ए-ख़िज़र पातीं
शफ़ीक़ फातिमा शेरा
नज़्म
आज़ादी-ए-ख़याल-ओ-'अमल चाहता हूँ फिर
ज़िंदाँ की फिर है चाह सलासिल की आरज़ू
अब्दुल मन्नान बेदिल अज़ीमाबादी
नज़्म
कि ये शामें शबों में और शबें उजले सवेरों के
तसलसुल में गुँधी तूल-ए-अबद उम्र-ए-ख़िज़र पातीं