aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "u.daa.e"
अदा-ए-इज्ज़-ओ-करम से उठा रही हो तुमसुहाग-रात जो ढोलक पे गाए जाते हैं
वो जिस की दीद में लाखों मसर्रतें पिन्हाँवो हुस्न जिस की तमन्ना में जन्नतें पिन्हाँहज़ार फ़ित्ने तह-ए-पा-ए-नाज़ ख़ाक-नशींहर इक निगाह ख़ुमार-ए-शबाब से रंगींशबाब जिस से तख़य्युल पे बिजलियाँ बरसेंवक़ार जिस की रफ़ाक़त को शोख़ियाँ तरसेंअदा-ए-लग़्ज़िश-ए-पा पर क़यामतें क़ुर्बांबयाज़-रुख़ पे सहर की सबाहतें क़ुर्बांसियाह ज़ुल्फ़ों में वारफ़्ता निकहतों का हुजूमतवील रातों की ख़्वाबीदा राहतों का हुजूमवो आँख जिस के बनाव प ख़ालिक़ इतराएज़बान-ए-शेर को तारीफ़ करते शर्म आएवो होंट फ़ैज़ से जिन के बहार लाला-फ़रोशबहिश्त ओ कौसर ओ तसनीम ओ सलसबील ब-दोशगुदाज़ जिस्म क़बा जिस पे सज के नाज़ करेदराज़ क़द जिसे सर्व-ए-सही नमाज़ करेग़रज़ वो हुस्न जो मोहताज-ए-वस्फ़-ओ-नाम नहींवो हसन जिस का तसव्वुर बशर का काम नहींकिसी ज़माने में इस रह-गुज़र से गुज़रा थाब-सद ग़ुरूर ओ तजम्मुल इधर से गुज़रा थाऔर अब ये राह-गुज़र भी है दिल-फ़रेब ओ हसींहै इस की ख़ाक में कैफ़-ए-शराब-ओ-शेर मकींहवा में शोख़ी-ए-रफ़्तार की अदाएँ हैंफ़ज़ा में नर्मी-ए-गुफ़्तार की सदाएँ हैंग़रज़ वो हुस्न अब इस रह का जुज़्व-ए-मंज़र हैनियाज़-ए-इश्क़ को इक सज्दा-गह मयस्सर है
आया हमारे देस में इक ख़ुश-नवा फ़क़ीरआया और अपनी धुन में ग़ज़ल-ख़्वाँ गुज़र गयासुनसान राहें ख़ल्क़ से आबाद हो गईंवीरान मय-कदों का नसीबा सँवर गयाथीं चंद ही निगाहें जो उस तक पहुँच सकींपर उस का गीत सब के दिलों में उतर गयाअब दूर जा चुका है वो शाह-ए-गदा-नुमाऔर फिर से अपने देस की राहें उदास हैंचंद इक को याद है कोई उस की अदा-ए-ख़ासदो इक निगाहें चंद अज़ीज़ों के पास हैंपर उस का गीत सब के दिलों में मुक़ीम हैऔर उस के लय से सैकड़ों लज़्ज़त-शनास हैं
1सियाह पेड़ हैं अब आप अपनी परछाईंज़मीं से ता-मह-ओ-अंजुम सुकूत के मीनारजिधर निगाह करें इक अथाह गुम-शुदगीइक एक कर के फ़सुर्दा चराग़ों की पलकेंझपक गईं जो खुली हैं झपकने वाली हैंझलक रहा है पड़ा चाँदनी के दर्पन मेंरसीले कैफ़ भरे मंज़रों का जागता ख़्वाबफ़लक पे तारों को पहली जमाहियाँ आईं2तमोलियों की दूकानें कहीं कहीं हैं खुलीकुछ ऊँघती हुई बढ़ती हैं शाह-राहों परसवारियों के बड़े घुंघरूओं की झंकारेंखड़ा है ओस में चुप-चाप हर सिंगार का पेड़दुल्हन हो जैसे हया की सुगंध से बोझलये मौज-ए-नूर ये भरपूर ये खिली हुई रातकि जैसे खिलता चला जाए इक सफ़ेद कँवलसिपाह-ए-रूस है अब कितनी दूर बर्लिन सेजगा रहा है कोई आधी रात का जादूछलक रही है ख़ुम-ए-ग़ैब से शराब-ए-वजूदफ़ज़ा-ए-नीम नर्गिस-ए-ख़ुमारआलूदकँवल की चुटकियों में बंद है नदी का सुहाग3ये रस का सेज ये सुकुमार ये सुकोमल गातनयन कमल की झपक काम-रूप का जादूये रस्मसाई पलक की घनी घनी परछाईंफ़लक पे बिखरे हुए चाँद और सितारों कीचमकती उँगलियों से छिड़ के साज़ फ़ितरत केतराने जागने वाले हैं तुम भी जाग उठो4शुआ-ए-महर ने यूँ उन को चूम चूम लियानदी के बीच कुमुदनी के फूल खिल उठ्ठेन मुफ़्लिसी हो तो कितनी हसीन है दुनियाये झाएँ झाएँ सी रह रह के एक झींगुर कीहिना की टट्टियों में नर्म सरसराहट सीफ़ज़ा के सीने में ख़ामोश सनसनाहट सीये काएनात अब इक नींद ले चुकी होगी5ये महव-ए-ख़्वाब हैं रंगीन मछलियाँ तह-ए-आबकि हौज़-ए-सेहन में अब इन की चश्मकें भी नहींये सर-निगूँ हैं सर-ए-शाख़ फूल गुड़हल केकि जैसे बे-बुझे अंगारे ठंडे पड़ जाएँये चाँदनी है कि उमडा हुआ है रस-सागरइक आदमी है कि इतना दुखी है दुनिया में6क़रीब चाँद के मंडला रही है इक चिड़ियाभँवर में नूर के करवट से जैसे नाव चलेकि जैसे सीना-ए-शाइर में कोई ख़्वाब पलेवो ख़्वाब साँचे में जिस के नई हयात ढलेवो ख़्वाब जिस से पुराना निज़ाम-ए-ग़म बदलेकहाँ से आती है मदमालती लता की लिपटकि जैसे सैकड़ों परियाँ गुलाबियाँ छिड़काएँकि जैसे सैकड़ों बन-देवियों ने झूले परअदा-ए-ख़ास से इक साथ बाल खोल दिएलगे हैं कान सितारों के जिस की आहट परइस इंक़लाब की कोई ख़बर नहीं आतीदिल-ए-नुजूम धड़कते हैं कान बजते हैं7ये साँस लेती हुई काएनात ये शब-ए-माहये पुर-सुकूँ ये पुर-असरार ये उदास समाँये नर्म नर्म हवाओं के नील-गूँ झोंकेफ़ज़ा की ओट में मर्दों की गुनगुनाहट हैये रात मौत की बे-रंग मुस्कुराहट हैधुआँ धुआँ से मनाज़िर तमाम नम-दीदाख़ुनुक धुँदलके की आँखें भी नीम ख़्वाबीदासितारे हैं कि जहाँ पर है आँसुओं का कफ़नहयात पर्दा-ए-शब में बदलती है पहलूकुछ और जाग उठा आधी रात का जादूज़माना कितना लड़ाई को रह गया होगामिरे ख़याल में अब एक बज रहा होगा8गुलों ने चादर-ए-शबनम में मुँह लपेट लियालबों पे सो गई कलियों की मुस्कुराहट भीज़रा भी सुम्बुल-ए-तुर्की लटें नहीं हिलतींसुकूत-ए-नीम-शबी की हदें नहीं मिलतींअब इंक़लाब में शायद ज़ियादा देर नहींगुज़र रहे हैं कई कारवाँ धुँदलके मेंसुकूत-ए-नीम-शबी है उन्हीं के पाँव की चापकुछ और जाग उठा आधी रात का जादू9नई ज़मीन नया आसमाँ नई दुनियानए सितारे नई गर्दिशें नए दिन रातज़मीं से ता-ब-फ़लक इंतिज़ार का आलमफ़ज़ा-ए-ज़र्द में धुँदले ग़ुबार का आलमहयात मौत-नुमा इंतिशार का आलमहै मौज-ए-दूद कि धुँदली फ़ज़ा की नब्ज़ें हैंतमाम ख़स्तगी-ओ-माँदगी ये दौर-ए-हयातथके थके से ये तारे थकी थकी सी ये रातये सर्द सर्द ये बे-जान फीकी फीकी चमकनिज़ाम-ए-सानिया की मौत का पसीना हैख़ुद अपने आप में ये काएनात डूब गईख़ुद अपनी कोख से फिर जगमगा के उभरेगीबदल के केचुली जिस तरह नाग लहराए10ख़ुनुक फ़ज़ाओं में रक़्साँ हैं चाँद की किरनेंकि आबगीनों पे पड़ती है नर्म नर्म फुवारये मौज-ए-ग़फ़लत-ए-मासूम ये ख़ुमार-ए-बदनये साँस नींद में डूबी ये आँख मदमातीअब आओ मेरे कलेजे से लग के सो जाओये पलकें बंद करो और मुझ में खो जाओ
ये कौन मुस्कुराहटों का कारवाँ लिए हुएशबाब-ए-शेर-ओ-रंग-ओ-नूर का धुआँ लिए हुएधुआँ कि बर्क़-ए-हुस्न का महकता शोला है कोईचटीली ज़िंदगी की शादमानियाँ लिए हुएलबों से पंखुड़ी गुलाब की हयात माँगे हैकँवल सी आँख सौ निगाह-ए-मेहरबाँ लिए हुएक़दम क़दम पे दे उठी है लौ ज़मीन-ए-रह-गुज़रअदा अदा में बे-शुमार बिजलियाँ लिए हुएनिकलते बैठते दिनों की आहटें निगाह मेंरसीले होंट फ़स्ल-ए-गुल की दास्ताँ लिए हुएख़ुतूत-ए-रुख में जल्वा-गर वफ़ा के नक़्श सर-ब-सरदिल-ए-ग़नी में कुल हिसाब-ए-दोस्ताँ लिए हुएवो मुस्कुराती आँखें जिन में रक़्स करती है बहारशफ़क़ की गुल की बिजलियों की शोख़ियाँ लिए हुएअदा-ए-हुस्न बर्क़-पाश शोला-ज़न नज़ारा-सोज़फ़ज़ा-ए-हुस्न ऊदी ऊदी बिजलियाँ लिए हुएजगाने वाले नग़मा-ए-सहर लबों पे मौजज़ननिगाहें नींद लाने वाली लोरियाँ लिए हुएवो नर्गिस-ए-सियाह-ए-नीम-बाज़, मय-कदा-ब-दोशहज़ार मस्त रातों की जवानियाँ लिए हुएतग़ाफ़ुल-ओ-ख़ुमार और बे-ख़ुदी की ओट मेंनिगाहें इक जहाँ की होशयारियाँ लिए हुएहरी-भरी रगों में वो चहकता बोलता लहूवो सोचता हुआ बदन ख़ुद इक जहाँ लिए हुएज़-फ़र्क़ ता-क़दम तमाम चेहरा जिस्म-ए-नाज़नींलतीफ़ जगमगाहटों का कारवाँ लिए हुएतबस्सुमश तकल्लुमे तकल्लुमश तरन्नुमेनफ़स नफ़स में थरथराता साज़-ए-जाँ लिए हुएजबीन-ए-नूर जिस पे पड़ रही है नर्म छूट सीख़ुद अपनी जगमगाहटों की कहकशाँ लिए हुए''सितारा-बार ओ मह-चकाँ ओ ख़ुर-फ़िशाँ'' जमाल-ए-यारजहान-ए-नूर कारवाँ-ब-कारवाँ लिए हुएवो ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म शमीम-ए-मस्त से धुआँ धुआँवो रुख़ चमन चमन बहार-ए-जावेदाँ लिए हुएब-मस्ती-ए-जमाल-ए-काएनात, ख़्वाब-ए-काएनातब-गर्दिश-ए-निगाह दौर-ए-आसमाँ लिए हुएये कौन आ गया मिरे क़रीब उज़्व उज़्व मेंजवानियाँ, जवानियों की आँधियाँ लिए हुएये कौन आँख पड़ रही है मुझ पर इतने प्यार सेवो भूली सी वो याद सी कहानियाँ लिए हुएये किस की महकी महकी साँसें ताज़ा कर गईं दिमाग़शबों के राज़ नूर-ए-मह की नर्मियाँ लिए हुएये किन निगाहों ने मिरे गले में बाहें डाल दींजहान भर के दुख से दर्द से अमाँ लिए हुएनिगाह-ए-यार दे गई मुझे सुकून-ए-बे-कराँवो बे-कही वफ़ाओं की गवाहियाँ लिए हुएमुझे जगा रहा है मौत की ग़ुनूदगी से कौननिगाहों में सुहाग-रात का समाँ लिए हुएमिरी फ़सुर्दा और बुझी हुई जबीं को छू लियाये किस निगाह की किरन ने साज़-ए-जाँ लिए हुएसुते से चेहरे पर हयात रसमसाती मुस्कुरातीन जाने कब के आँसुओं की दास्ताँ लिए हुएतबस्सुम-ए-सहर है अस्पताल की उदास शामये कौन आ गया नशात-ए-बे-कराँ लिए हुएतिरे न आने तक अगरचे मेहरबाँ था इक जहाँमैं रो के रह गया हूँ सौ ग़म-ए-निहाँ लिए हुएज़मीन मुस्कुरा उठी ये शाम जगमगा उठीबहार लहलहा उठी शमीम-ए-जाँ लिए हुएफ़ज़ा-ए-अस्पताल है कि रंग-ओ-बू की करवटेंतिरे जमाल-ए-लाला-गूँ की दास्ताँ लिए हुए'फ़िराक़' आज पिछली रात क्यूँ न मर रहूँ कि अबहयात ऐसी शामें होगी फिर कहाँ लिए हुए(2)मगर नहीं कुछ और मस्लहत थी उस के आने मेंजमाल-ओ-दीद-ए-यार थे नया जहाँ लिए हुएइसी नए जहाँ में आदमी बनेंगे आदमीजबीं पे शाहकार-ए-दहर का निशाँ लिए हुएइसी नए जहाँ में आदमी बनेंगे देवतातहारतों का फ़र्क़-ए-पाक पर निशाँ लिए हुएख़ुदाई आदमी की होगी इस नए जहान परसितारों के हैं दिल ये पेश-गोईयाँ लिए हुएसुलगते दिल शरर-फ़िशाँ ओ शोला-बार बर्क़-पाशगुज़रते दिन हयात-ए-नौ की सुर्ख़ियाँ लिए हुएतमाम क़ौल और क़सम निगाह-ए-नाज़-ए-यार थीतुलू-ए-ज़िंदगी-ए-नौ की दास्ताँ लिए हुएनया जनम हुआ मिरा कि ज़िंदगी नई मिलीजियूँगा शाम-ए-दीद की निशानियाँ लिए हुएन देखा आँख उठा के अहद-ए-नौ के पर्दा-दारों नेगुज़र गया ज़माना याद-ए-रफ़्तगाँ लिए हुएहम इन्क़िलाबियों ने ये जहाँ बचा लिया मगरअभी है इक जहाँ वो बद-गुमानियाँ लिए हुए
भारत के ऐ सपूतो हिम्मत दिखाए जाओदुनिया के दिल पे अपना सिक्का बिठाए जाओमुर्दा-दिली का झंडा फेंको ज़मीन पर तुमज़िंदा-दिली का हर-सू परचम उड़ाए जाओलाओ न भूल कर भी दिल में ख़याल-ए-पस्तीख़ुश-हाली-ए-वतन का बेड़ा उठाए जाओतन-मन मिटाए जाओ तुम नाम-ए-क़ौमीयत परराह-ए-वतन में अपनी जानें लड़ाए जाओकम-हिम्मती का दिल से नाम-ओ-निशाँ मिटा दोजुरअत का लौह-ए-दिल पर नक़्शा जमाए जाओऐ हिंदूओ मुसलमाँ आपस में इन दिनों तुमनफ़रत घटाए जाओ उल्फ़त बढ़ाए जाओ'बिक्रम' की राज-नीती 'अकबर' की पॉलीसी कीसारे जहाँ के दिल पर अज़्मत बिठाए जाओजिस कश्मकश ने तुम को है इस क़दर मिटायातुम से हो जिस क़दर तुम उस को मिटाए जाओजिन ख़ाना-जंगियों ने ये दिन तुम्हें दिखाएअब उन की याद अपने दिल में भुलाए जाओबे-ख़ौफ़ गाए जाओ ''हिन्दोस्ताँ हमारा''और ''वंदे-मातरम'' के नारे लगाए जाओजिन देश सेवकों से हासिल है फ़ैज़ तुम कोइन देश सेवकों की जय जय मनाए जाओजिस मुल्क का हो खाते दिन रात आब-ओ-दानाउस मलक पर सरों की भेटें चढ़ाए जाओफाँसी का जेल का डर दिल से 'फ़लक' मिटा करग़ैरों के मुँह पे सच्ची बातें सुनाते जाओ
तह-ए-नुजूम, कहीं चाँदनी के दामन मेंहुजूम-ए-शौक़ से इक दिल है बे-क़रार अभीख़ुमार-ए-ख़्वाब से लबरेज़ अहमरीं आँखेंसफ़ेद रुख़ पे परेशान 'अम्बरीं आँखेंछलक रही है जवानी हर इक बुन-ए-मू सेरवाँ हो बर्ग-ए-गुल-ए-तर से जैसे सैल-ए-शमीमज़िया-ए-मह में दमकता है रंग-ए-पैराहनअदा-ए-इज्ज़ से आँचल उड़ा रही है नसीमदराज़ क़द की लचक से गुदाज़ पैदा हैअदा-ए-नाज़ से रंग-ए-नियाज़ पैदा हैउदास आँखों में ख़ामोश इल्तिजाएँ हैंदिल-ए-हज़ीं में कई जाँ-ब-लब दु'आएँ हैंतह-ए-नुजूम कहीं चाँदनी के दामन मेंकिसी का हुस्न है मसरूफ़-ए-इंतिज़ार अभीकहीं ख़याल के आबाद-कर्दा गुलशन मेंहै एक गुल कि है ना-वाक़िफ़-ए-बहार अभी
ख़ुदा अलीगढ़ के मदरसे को तमाम अमराज़ से शिफ़ा देभरे हुए हैं रईस-ज़ादे अमीर-ज़ादे शरीफ़-ज़ादेलतीफ़ ओ ख़ुश-वज़'अ चुस्त ओ चालाक ओ साफ़ ओ पाकीज़ा शाद-ओ-ख़ुर्रमतबीअतों में है इन की जौदत दिलों में इन के हैं नेक इरादेकमाल-ए-मेहनत से पढ़ रहे हैं कमाल-ए-ग़ैरत से पढ़ रहे हैंसवार मशरिक़ राह में हैं तो मग़रिबी राह में पियादेहर इक है इन में का बे-शक ऐसा कि आप उसे चाहते हैं जैसादिखावे महफ़िल में क़द्द-ए-र'अना जो आप आएँ तो सर झुका देफ़क़ीर माँगे तो साफ़ कह दें कि तू है मज़बूत जा कमा खाक़ुबूल फ़रमाएँ आप दावत तो अपना सरमाया कुल खिला देबुतों से इन को नहीं लगावट मिसों की लेते नहीं वो आहटतमाम क़ुव्वत है सर्फ़-ए-ख्वांदन नज़र के भोले हैं दिल के सादेनज़र भी आए जो ज़ुल्फ़-ए-पेचाँ तो समझें ये कोई पॉलीसी हैइलेक्ट्रिक लाइट उस को समझें जो बर्क़-वश कोई कूदेनिकलते हैं कर के ग़ोल-बंदी ब-नाम-ए-तहज़ीब ओ दर्द-मंदीये कह के लेते हैं सब से चंदे जो तुम हमें दो तुम्हें ख़ुदा देउन्हें इसी बात पर यक़ीं है कि बस यही अस्ल कार-ए-दीं हैइसी से होगा फ़रोग़-ए-क़ौमी इसी से चमकेंगे बाप दादेमकान-ए-कॉलेज के सब मकीं हैं अभी उन्हें तजरबे नहीं हैंख़बर नहीं है कि आगे चल कर है कैसी मंज़िल हैं कैसे जादेदिलों में इन के हैं नूर-ए-ईमाँ क़वी नहीं है मगर निगहबाँहवा-ए-मंतिक़ अदा-ए-तिफ़ली ये शम्अ ऐसा न हो बुझा देफ़रेब दे कर निकाले मतलब सिखाए तहक़ीर-ए-दीन-ओ-मज़हबमिटा दे आख़िर को दीन-ओ-मज़हब नुमूद-ए-ज़ाती को गो बढ़ा देयही बस 'अकबर' की इल्तिजा है जनाब बारी में ये दुआ हैउलूम ओ हिकमत का दर्स इन को प्रोफ़ेसर दें समझ ख़ुदा दे
दो चूहों की एक कहानीकुछ ताज़ा है कुछ है पुरानीइक चूहे की जेब में बटवाइक चूहे के हाथ में हुक़्क़ाहुक़्क़े में थे बोर के लड्डूकुछ थे मोती-चूर के लड्डूलड्डू थे सब रंग रंगीलेकुछ थे नीली और कुछ पीलेबटवे में थे चार टमाटरऔर थोड़ा सा मिनरल वाटरलड्डू खा कर पानी पी करबोले चूहे छत पर चढ़ करकहाँ है बिल्ली उस को बुलाओआया है अब हम को तावआज नहीं वो बचने वालीबच्चा लोग बजाए तालीबिल्ली ने जब सुनी ये बातबीत चुकी थी आधी रातपहले उस ने दुम को हिलायादाँतों को दाँतों पे जमायाचुपके चुपके छत पर पहुँचीफिर तेज़ी से उन पर झपटीदोनों चूहे डर कर भागेबिल्ली पीछे चूहे आगेसॉरी सॉरी लाख वो बोलेसुनी न उन की बात किसी नेबिल्ली ने फिर मज़े उड़ाएइक इक कर के दोनों खाए
मुसाफ़िर यूँही गीत गाए चला जासर-ए-रहगुज़र कुछ सुनाए चला जातिरी ज़िंदगी सोज़-ओ-साज़-ए-मोहब्बतहँसाए चला जा रुलाये चला जातिरे ज़मज़मे हैं ख़ुनुक भी तपाँ भीलगाए चला जा बुझाए चला जाकोई लाख रोके कोई लाख टोकेक़दम अपने आगे बढ़ाए चला जाहसीं भी तुझे रास्ते में मिलेंगेनज़र मत मिला मुस्कुराए चला जामोहब्बत के नक़्शे तमन्ना के ख़ाकेबनाए चला जा मिटाए चला जाक़दामत हदें खींचती ही रहेगीक़दामत की बुनियाद ढाए चला जाक़सम शौक़ की फ़ितरत-ए-मुज़्तरिब कीयूँही नित-नई धुन में गाए चला जाजो परचम उठा ही लिया सर-कशी का!उसे आसमाँ तक उड़ाए चला जा
पूछ न क्या लाहौर में देखा हम ने मियाँ-'नज़ीर'पहनें सूट अंग्रेज़ी बोलें और कहलाएँ 'मीर'चौधरियों की मुट्ठी में है शाइ'र की तक़दीररोए भगत कबीरइक-दूजे को जाहिल समझें नट-खट बुद्धीवानमेट्रो में जो चाय पिलाए बस वो बाप समानसब से अच्छा शाइ'र वो है जिस का यार मुदीररोए भगत कबीरसड़कों पर भूके फिरते हैं शाइ'र मूसीक़ारएक्ट्रसों के बाप लिए फिरते हैं मोटर-कारफ़िल्म-नगर तक आ पहुँचे हैं सय्यद पीर फ़क़ीररोए भगत कबीरलाल-दीन की कोठी देखी रंग भी जिस का लालशहर में रह कर ख़ूब उड़ाए दहक़ानों का मालऔर कहे अज्दाद ने बख़्शी मुझ को ये जागीररोए भगत कबीरजिस को देखो लीडर है और से मिलो वकीलकिसी तरह भरता ही नहीं है पेट है उन का झीलमजबूरन सुनना पड़ती है उन सब की तक़दीररोए भगत कबीरमहफ़िल से जो उठ कर जाए कहलाए वो बोरअपनी मस्जिद की तारीफ़ें बाक़ी जूते-चोरअपना झंग भला है प्यारे जहाँ हमारी हीररोए भगत कबीर
मिरी निगाह को अब भी तिरी ज़रूरत हैदिल-ए-तबाह को अब भी तिरी ज़रूरत हैख़रोश-ए-नाला तड़पता है तेरी फ़ुर्क़त मेंसुकूत-ए-आह को अब भी तिरी ज़रूरत हैये सुब्ह-ओ-शाम तिरी जुस्तुजू में फिरते हैंकि मेहर-ओ-माह को अब भी तिरी ज़रूरत हैबहार-ए-ज़ुल्फ़ परेशाँ लिए है गुलशन मेंगुल-ओ-गियाह को अब भी तिरी ज़रूरत हैज़माना ढूँड रहा है कोई नया तूफ़ाँसुकून-ए-राह को अब भी तिरी ज़रूरत हैवो वलवले वो उमंगें वो जुस्तुजू न रहीतिरी सिपाह को अब भी तिरी ज़रूरत हैख़िरद ख़मोश जुनूँ बे-ख़रोश है अब तकदिल-ओ-निगाह को अब भी तिरी ज़रूरत हैबयाँ हो ग़म का फ़साना दिल-ए-तपाँ से कहाँये बार उट्ठेगा मिरी जान-ए-ना-तवाँ से कहाँमिला न फिर कहीं लुत्फ़-ए-कलाम तेरे बा'दहदीस-ए-शौक़ रही ना-तमाम तेरे बा'दजो तेरे दस्त-ए-हवादिस शिकन में देखी थीवो तेग़ फिर न हुई बे-नियाम तेरे बा'दबुझी बुझी सी तबीअत है बादा-ख़्वारों कीउदास उदास हैं मीना-ओ-जाम तेरे बा'दबना है हर्फ़-ए-शिकायत सुकूत-ए-लाला-ओ-गुलबदल गया है चमन का निज़ाम तेरे बा'दअदा-ए-हुस्न का लुत्फ़-ए-ख़िराम बे-मा'नीसुरूद-ए-शौक़ की लज़्ज़त हराम तेरे बा'दतरस गई है समाअ'त तिरी सदाओं कोसुना न फिर कहीं तेरा पयाम तेरे बा'दवो इंक़लाब की रू फिर पलट गई अफ़्सोसबुलंद बाम हैं फिर ज़ेर-ए-दाम तेरे बा'दमिसाल-ए-नज्म-ए-सहर जगमगा के डूब गयाहमें सफ़ीना किनारे लगा के डूब गया
मोहब्बत आह तेरी ये मोहब्बत रात भर की हैतिरी रंगीन ख़ल्वत की लताफ़त रात भर की हैतिरे शादाब होंटों की इनायत रात भर की हैतिरे मस्ताना बोसों की हलावत रात भर की हैमह-ए-रौशन है तू और तेरी तलअत रात भर की हैगुल-ए-शब्बू है तू और तेरी निकहत रात भर की हैतू क्या जाने कि सौदा-ए-मोहब्बत किस को कहते हैंमोहब्बत और मोहब्बत की लताफ़त किस को कहते हैंग़म-ए-हिज्राँ है क्या और सोज़-ए-उल्फ़त किस को कहते हैंजुनूँ होता है कैसा और वहशत किस को कहते हैंतू क्या जाने ग़म-ए-शब-हा-ए-फ़ुर्क़त किस को कहते हैंतिरे इज़हार-ए-उल्फ़त की फ़साहत रात भर की हैनिगाह-ए-मस्त से दिल को मिरे तड़पा रही है तूअदा-ए-शौक़ से जज़्बात को भड़का रही है तूमुझे बच्चे की सूरत नाज़ से फुसला रही है तूखिलौने दे के बोसों के मुझे बहला रही है तूमगर नादान है तू आह धोका खा रही है तूतिरा रू-ए-दरख़्शाँ है ब-ज़ाहिर माहताब-आसातिरे होंटों की शादाबी है रंगत में शराब-आसातिरे रुख़्सार की महताबियाँ हैं आफ़्ताब-आसामगर इन की हक़ीक़त है हबाब-आसा सराब-आसाकि ग़ाज़े की सबाहत उस पे छाई है नक़ाब-आसाऔर इस ग़ाज़े की भी झूटी सबाहत रात भर की हैये माना तेरी ख़ल्वत की फ़ज़ा रूह-ए-गुलिस्ताँ हैतिरी ख़ल्वत का हर फ़ानूस इक महताब-ए-लर्ज़ां हैतिरा अबरेशमी बिस्तर नहीं इक ख़्वाब-ए-ख़ंदाँ हैतिरा जिस्म आफ़त-ए-दिल तेरा सीना आफ़त-ए-जाँ हैतू इक ज़िंदा सितारा है जो तन्हाई में ताबाँ हैमगर कहते हैं तारों की हुकूमत रात भर की हैलताफ़त से हैं ख़ाली तेरे कुम्हलाए हुए बोसेतरावत से हैं ख़ाली तेरे मुरझाए हुए बोसेनज़ाकत से हैं ख़ाली तेरे घबराए हुए बोसेहक़ीक़त से हैं ख़ाली तेरे शरमाए हुए बोसेमोहब्बत से हैं ख़ाली तेरे घबराए हुए बोसेऔर इन बोसों की ये झूटी हलावत रात भर की हैतिरे ज़हरीले बोसे मुझ को जिस दम याद आएँगेमिरे होंटों पे काले नाग बन कर थरथराएँगेपशेमानी के जज़्बे मुझ को दीवाना बनाएँगेमिरे इंकार को नफ़रत के ख़ंजर गुदगुदाएँगेमिरे दिल की रगों में ग़म के शोले तैर जाएँगेमैं समझा! आह समझा! ये मसर्रत रात भर की हैमुझे दीवाना करने की मसर्रत बे-ख़बर कब तकरहेगी मेरे दिल में तेरी उल्फ़त कारगर कब तकमुझे मसहूर रक्खेगा ये इश्क़-ए-बे-समर कब तकहक़ीक़त की सहर आख़िर न होगी पर्दा-दर कब तकमुझे मग़्लूब कर के ख़ुश है तू ज़ालिम मगर कब तकतिरी ये फ़तह मेरी ये हज़ीमत रात भर की है
दुनिया में कोई शाद कोई दर्द-नाक हैया ख़ुश है या अलम के सबब सीना-चाक हैहर एक दम से जान का हर-दम तपाक हैनापाक तन पलीद नजिस या कि पाक हैजो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक हैहै आदमी की ज़ात का उस जा बड़ा ज़ुहूरले अर्श ता-ब-फ़र्श चमकता है जिस का नूरगुज़रे है उन की क़ब्र पे जब वहश और तुयूररो रो यही कहे है हर इक क़ब्र के हुज़ूरजो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक हैदुनिया से जब कि अंबिया और औलिया उठेअज्साम-ए-पाक उन के इसी ख़ाक में रहेरूहें हैं ख़ूब जान में रूहों के हैं मज़ेपर जिस्म से तो अब यही साबित हुआ मुझेजो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक हैंवो शख़्स थे जो सात विलायत के बादशाहहशमत में जिन की अर्श से ऊँची थी बारगाहमरते ही उन के तन हुए गलियों की ख़ाक-ए-राहअब उन के हाल की भी यही बात है गवाहजो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक हैकिस किस तरह के हो गए महबूब-ए-कज-कुलाहतन जिन के मिस्ल-ए-फूल थे और मुँह भी रश्क-ए-माहजाती है उन की क़ब्र पे जिस-दम मिरी निगाहरोता हूँ जब तो मैं यही कह कह के दिल में आहजो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक हैवो गोरे गोरे तन कि जिन्हों की थी दिल में जाएहोते थे मैले उन के कोई हाथ गर लगाएसो वैसे तन को ख़ाक बना कर हवा उड़ाएरोना मुझे तो आता है अब क्या कहूँ मैं हाएजो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक हैउम्दों के तन को ताँबे के संदूक़ में धरामुफ़लिस का तन पड़ा रहा माटी-उपर पड़ाक़ाएम यहाँ ये और न साबित वो वाँ रहादोनों को ख़ाक खा गई यारो कहूँ में क्याजो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक हैगर एक को हज़ार रूपे का मिला कफ़नऔर एक यूँ पड़ा रहा है बे-कस बरहना-तनकीड़े मकोड़े खा गए दोनों के तन-बदनदेखा जो हम ने आह तो सच है यही सुख़नजो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक हैजितने जहाँ में नाच हैं कंगनी से ता-गेहूँऔर जितने मेवा-जात हैं तर ख़ुश्क गूना-गूंकपड़े जहाँ तलक हैं सपीदा ओ सियह नुमूंकिम-ख़्वाब ताश बादिला किस किस का नाम लूँजो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक हैजितने दरख़्त देखो हो बूटे से ता-ब-झाड़बड़ पीपल आँब नीब छुआरा खजूर ताड़सब ख़ाक होंगे जब कि फ़ना डालेगी उखाड़किया बूटें डेढ़ पात के क्या झाड़ क्या पहाड़जो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक हैजितना ये ख़ाक का है तिलिस्मात बन रहाफिर ख़ाक उस को होता है यारो जुदा जुदातरकारी साग पात ज़हर अमृत और दवाज़र सीम कौड़ी लाल ज़मुर्रद और इन सवाजो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक हैगढ़ कोट तोप रहकला तेग़ ओ कमान-ओ-तीरबाग़-ओ-चमन महल्ल-ओ-मकानात दिल-पज़ीरहोना है सब को आह इसी ख़ाक में ख़मीरमेरी ज़बाँ पे अब तो यही बात है 'नज़ीर'जो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक है
नहीं है यूँ तो नहीं है कि अब नहीं पैदाकसी के हुस्न में शमशीर-ए-आफ़्ताब का हुस्ननिगाह जिस से मिलाओ तो आँख दुखने लगेकिसी अदा में अदा-ए-ख़िराम-ए-बाद-ए-सबाजिसे ख़याल में लाओ तो दिल सुलगने लगेनहीं है यूँ तो नहीं है कि अब नहीं बाक़ीजहाँ में बज़्म-गह-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ का मेलाबिना-ए-लुत्फ़-ओ-मोहब्बत, रिवाज-ए-मेहर-ओ-वफ़ाये कस दयार-ए-अदम में मुक़ीम हैं हम तुमजहाँ पे मुज़्दा-ए-दीदार-ए-हुस्न-ए-यार तो क्यानवेद-ए-आमद-ए-रोज़-ए-जज़ा नहीं आतीये किस ख़ुमार-कदे में नदीम हैं हम तुमजहाँ पे शोरिश-ए-रिंदान-ए-मय-गुसार तो क्याशिकस्त-ए-शीशा-ए-दिल की सदा नहीं आती
ये सेहहत-बख़्श तड़का ये सहर की जल्वा-सामानीउफ़ुक़ सारा बना जाता है दामान-ए-चमन जैसेछलकती रौशनी तारीकियों पे छाई जाती हैउड़ाए नाज़ियत की लाश पर कोई कफ़न जैसेउबलती सुर्ख़ियों की ज़द पे हैं हल्क़े सियाही केपड़ी हो आग में बिखरी ग़ुलामी की रसन जैसेशफ़क़ की चादरें रंगीं फ़ज़ा में थरथराती हैंउड़ाए लाल झंडा इश्तिराकी अंजुमन जैसेचली आती है शर्माई लजाई हूर-ए-बेदारीभरे घर में क़दम थम थम के रखती है दुल्हन जैसेफ़ज़ा गूँजी हुई है सुब्ह के ताज़ा तरानों सेसुरूद-ए-फ़त्ह पर हैं सुर्ख़ फ़ौजें नग़्मा-ज़न जैसेहवा की नर्म लहरें गुदगुदाती हैं उमंगों कोजवाँ जज़्बात से करता हो चुहलें बाँकपन जैसेये सादा सादा गर्दूं पे तबस्सुम-आफ़रीं सूरजपै-दर-पै कामयाबी से हो स्तालिन मगन जैसेसहर के आइने में देखता हूँ हुस्न-ए-मुस्तक़बिलउतर आई है चश्म-ए-शौक़ में 'कैफ़ी' किरन जैसे
बड़े नाज़ से आज उभरा है सूरजहिमाला के ऊँचे कलस जगमगाएपहाड़ों के चश्मों को सोना बनायानए बिल नए ज़ोर इन को सिखाएलिबास-ए-ज़री आबशारों ने पायानशेबी ज़मीनों पे छींटे उड़ाएघने ऊँचे ऊँचे दरख़्तों का मंज़रये हैं आज सब आब-ए-ज़र में नहाए
इंजीनियरलिख पढ़ के मैं तो इक दिनअहल-ए-हुनर बनूँगाचाहा अगर ख़ुदा नेइंजीनियर बनूँगाहोगी मिरे हुनर से ता'मीर इस वतन कीजागेगी मेरे फ़न से तक़दीर इस वतन कीचलती रहें मशीनें सनअ'त तमाम चमकेजिस तरह सुब्ह चमके वैसे ही शाम चमकेअहल-ए-हुनर बनूँगाइंजीनियर बनूँगाडॉक्टरजिसे तकलीफ़ में पाऊँउसे आराम पहुँचाऊँजहाँ ग़म का अंधेरा होख़ुशी की रौशनी लाऊँजहाँ आँसू बरसते होंहँसी उस घर में बिखराऊँदुआ है डॉक्टर बन करदुखी लोगों के काम आऊँवतन का सिपाहीवतन का बहादुर सिपाही बनूँशुजाअ'त की दुनिया का राही बनूँलेफ्ट राइट लेफ्टलेफ्ट राइट लेफ्टवतन में जहाँ हो ज़रूरत मिरीवहीं काम आए शुजाअ'त मिरीदिलेरी का मैं सब को पैग़ाम दूँजो मुश्किल हो वो काम अंजाम दूँहमेशा तरक़्क़ी की राहों में हमचलें साथियों से मिला के क़दमलेफ्ट राइट लेफ्टलेफ्ट राइट लेफ्टटीचरना चाँदी ना सोना चाहूँमैं तो टीचर होना चाहूँहासिल जो ता'लीम करूँ मैंसब में उसे तक़्सीम करूँ मैंनन्हे मुन्ने बच्चे आएँइल्म की दौलत लेते जाएँकम न हो ये तक़्सीम किए सेजलता हो जैसे दिया दिए सेपायलटबुलंदी पे जा के सफ़र करने वालाहवा-बाज़ ऊँचा हवा-बाज़ आ'लावो रनवे पे आया जो टेक-ऑफ़ करनेतो सूरज ने पहनाई किरनों की मालापैसेंजर हैं सीटों पे बे-फ़िक्र बैठेउड़ाए लिए जा रहा है जियालाहमारी उमंगों से क्या कह रहा हैफ़ज़ाओं में उड़ता हुआ ये उजालावकीलइंसाफ़ की शान दिखाऊँइंसाफ़ का रंग जमाऊँमज़लूम से हो हमदर्दीज़ालिम को सज़ा दिलवाऊँमुजरिम के काले दिल मेंक़ानून की शम्अ' जलाऊँहर बात में सब से आगेइंसाफ़ की बात बढ़ाऊँइंसाफ़ की शान दिखाऊँइंसाफ़ का रंग जमाऊँहारीसोचा है मैं नेहारी बनूँगाखेतों में झूमूँगंदुम उगा केधरती को चूमूँफ़स्लें सजा केसारे वतन कोख़ुश-हाल कर दूँख़ुशियों से सब केदामन को भर दूँहारी बनूँगा
वो कुछ दोशीज़गान-ए-नाज़-परवरखड़ी हैं इक बिसाती की दुकाँ परनज़र के सामने है एक महशरऔर इक महशर है मेरे दिल के अंदरसुनहरा काम रंगीं सारियों परबिसात-ए-आसमाँ पर माह-ओ-अख़तरजमाल-ओ-हुस्न के पुर-रोब तेवरनुमायाँ चाँद सी पेशानियों परवो रुख़्सारों पे हल्की हल्की सुर्ख़ीलबों में पुर-फ़िशाँ रूह-ए-गुल-ए-तरसियह ज़ुल्फ़ों में रूह-ए-सुंबुलिस्ताँनज़र सर-चश्मा-ए-तसनीम-ओ-कौसरअदा-ए-नाज़ ग़र्क़-ए-कैफ़-ए-सहबासियह मिज़्गाँ शराब-आलूदा नश्तरचमक तारों की चश्म-ए-सुर्मगीं मेंझलक चाँदी की जिस्म-ए-मरमरीं मेंवो ख़ुशबू आ रही है पैरहन सेफ़ज़ा है दूर तक जिस से मोअत्तरतबस्सुम और हँसी के नर्म तूफ़ाँफ़ज़ाओं में मुसलसल बारिश-ए-ज़रनिशात-ए-रंग-ओ-बू से चूर आँखेंशराब-ए-नाब से लबरेज़ साग़रवो मेहराबें सी सीनों पर नुमायाँफ़ज़ा-ए-नूर में क्यूपिड के शह-परनफ़स के आमद-ओ-शुद से तलातुमशब-ए-महताब में जैसे समुंदरसितारों की निगाहें झुक गई हैंज़मीं फिर ख़ंदा-ज़न है आसमाँ परकोई आईना-दार-ए-हुस्न-ए-फ़ारसकिसी में हुस्न-ए-यूनानी के जौहरकिसी में अक्स-ए-''मासूम-ए-कलीसा''किसी में पर्तव-ए-असनाम-ए-आज़रये शीरीं है वो नौशाबा है शायदनहीं याँ फ़र्क़-ए-फ़र्हाद-ओ-सिकन्दरये अपने हुस्न में अज़रा-ए-वामिक़वो अपने नाज़ में सलमा-ए-'अख़्तर'ये ताबानी में ख़ुर्शीद-ए-दरख़्शाँवो रानाई में उस से भी फ़ुज़ूँ-तरहँसी उस की तुलू-ए-सुब्ह-ए-ख़ंदाँनवा उस की सुरूद-ए-कैफ़-आवरये शोला-आफ़रीं वो बर्क़-अफ़गनये आईना-जबीं वो माह-पैकरवो जुम्बिश सी हुई कुछ आँचलों कोवो लहरें सी उठीं कुछ सारियों परख़िराम-ए-नाज़ से नग़्मे जगातीवो चल दीं एक जानिब मुस्कुरा करकिसी की हसरतें पामाल करतीकिसी की हसरतें हम-राह ले करकभी आँखें दुकानों पर जमी हैंकभी ख़ुद अपनी ही बर्नाइयों परइधर हम ने इक आह-ए-सर्द खींचीहँसी फिर आ गई अपने किए पर
तोता छेड़े थप-थप तबला मैना गीत सुनाएउल्लू जब मिर्दंग बजाए कव्वा शोर मचाएकुकड़ूँ कूँ की तान लगा के मुर्ग़ा गाय ख़यालक़ुमरी अपनी ठुमरी गाय मुर्ग़ी देवे तालमोर अपनी दुम को फैला कर कत्थक नाच दिखाएतोता छेड़े थप-थप तबला मैना गीत सुनाएचिड़िया बाजी सभा में नाचे ख़ुशी से छम छम छममोटी बतख़ चोंच से ढोलक पीटे धम धम धमबया बजाए मनजेरे और भौंरा भजन उड़ाएतोता छेड़े थप-थप तबला मैना गीत सुनाएबुलबुल गुल की याद में रो-रो गाए दीपक रागमस्त पपीहा दूर से नग़्मों की भड़काए आगकोयल पहन के पायल सारी महफ़िल में इठलाएतोता छेड़े थप-थप तबला मैना गीत सुनाएरंग बिरंगी चिड़ियाँ अब छेड़ें ऐसी क़व्वालीपत्ता पत्ता बूटा बूटा ताल में देवे तालीफूफी चील वज्द में आ कर ऊँची तान लगाएतोता छेड़े थप-थप तबला मैना गीत सुनाएइंग्लिस्तान का सारस आ कर नाचे राक ऐन रोलमुर्ग़ाबी से बोले मैडम इंग्लिश गाना बोलदेखो देखो कितनी प्यारी महफ़िल है ये हाएतोता छेड़े थप-थप तबला मैना गीत सुनाए
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