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नज़्म
जोश मलीहाबादी
नज़्म
दिल के ऐवाँ में लिए गुल-शुदा शम्ओं की क़तार
नूर-ए-ख़ुर्शीद से सहमे हुए उकताए हुए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
हम सब अपनी अपनी लाशें अपने अना के दोश पे लादे
इक क़ब्रिस्ताँ की पुर-हौल उदासी से उकताए हुए
वहीद अख़्तर
नज़्म
दुनिया की महफ़िलों से उक्ता गया हूँ या रब
क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ये 'ख़ुसरो' 'मीर' 'ग़ालिब' का ख़राबा बेचता क्या है
हमारा 'ग़ालिब'-ए-आज़म था चोर आक़ा-ए-'बेदिल' का