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नज़्म
जब भी महताब-ए-ज़र-अफ़्शाँ के हो चेहरे पे नक़ाब
जान हम रख के हथेली पर उलट देते हैं
नूर-ए-शमा नूर
नज़्म
क़ल्ब मेरा दौलत-ए-एहसास खो सकता नहीं
आब-ओ-ताब-ए-ज़र में ख़ुद्दारी डुबो सकता नहीं
नख़्शब जार्चवि
नज़्म
कहीं ये ख़ूँ से फ़र्द-ए-माल-ओ-ज़र तहरीर करती है
कहीं ये हड्डियाँ चुन कर महल ता'मीर करती है
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
सलाम संदेलवी
नज़्म
मिसाल-ए-मुह्र-ए-ज़र सेहत के साँचे में ढले इंसाँ
नि’अम से नाज़ से आग़ोश-ए-राहत में पले इंसाँ
उफ़ुक़ लखनवी
नज़्म
ज़बान-ए-दिल से फिर कहूँ तुम्हीं मिरी बहार हो
सुकून-ए-क़ल्ब-ए-ज़ार हो सुरूर-ए-सद-ख़ुमार हो
इक़बाल उमर
नज़्म
अभी दिमाग़ पे क़हबा-ए-सीम-ओ-ज़र है सवार
अभी रुकी ही नहीं तेशा-ज़न के ख़ून की धार
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
फ़र्दा का एक ख़ौफ़ है दिल में निहाँ कहीं
निकले थे जब वतन से हम अपने ब-हाल-ए-ज़ार
जयकृष्ण चौधरी हबीब
नज़्म
वो ख़ाक हो कि जिस में मिलें रेज़ा-हा-ए-ज़र
वो संग बन कि जिस से निकलते हैं लाल-ए-नाब