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नज़्म
लेकिन मेरा ग़ुस्सा किस शेर के बदन में झरझराता है?
मेरी आग किस उक़ाब की आँखों में कपकपाती है?
ज़ाहिद इमरोज़
नज़्म
ˈफ़ॉवड् जाता हूँ मैं गुगली उठाने के लिए
अक़ब में अपने मगर विकटें गिरी पाता हूँ मैं