aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "uqaab"
जब कहीं बैठ के रोते हैं वो बेकस जिन केअश्क आँखों में बिलकते हुए सो जाते हैंना-तवानों के निवालों पे झपटते हैं उक़ाबबाज़ू तोले हुए मंडलाते हुए आते हैं
मुझे मालूम थाये दिन भी दुख की कोख से फूटा हैमेरी मातमी चादरनहीं तब्दील होगी आज के दिन भीजो राख उड़ती थी ख़्वाबों की बदन मेंयूँही आशुफ़्ता रहेगीऔर उदासी की यही सूरत रहेगीमैं अपने सोग में मातम-कुनाँयूँ सर-ब-ज़ानू रात तक बैठी रहूँगीऔर मिरे ख़्वाबों का पुर्सा आज भी कोई नहीं देगामगर ये कौन हैजो यूँ मुझे बाहर बुलाता हैबड़ी नर्मी से कहता हैकि अपने हुजरा-ए-ग़म से निकल कर बाग़ में आओज़रा बाहर तो देखोदूर तक सब्ज़ा बिछा हैऔर हरी शाख़ों पे नारंजी शगूफ़े मुस्कुराते हैंमुलाएम सब्ज़ पत्तों पर पड़ी शबनमसुनहरी धूप में हीरे की सूरत जगमगाती हैदरख़्तों में छुपी नद्दीबहुत धीमे सुरों में गुनगुनाती हैचमकते ज़र्द फूलों से लदी नन्ही पहाड़ी के अक़ब मेंनुक़रई चश्मा ख़ुशी से खिलखिलाता हैपरिंद-ए-ख़ुश-गुलूशाख़-ए-शगुफ़्ता पर चहकता हैघने जंगल में बारिश का ग़ुबार-ए-सब्ज़सत्ह-ए-शीशा-ए-दिल परमुलाएम उँगलियों से मर्हबा के लफ़्ज़ लिखता हैकोई आता हैआ कर चादर-ए-ग़म को बड़ी आहिस्तगी सेमेरे शानों से हटा करसात रंगों का दुपट्टा खोल कर मुझ को उड़ाता हैमैं खुल कर साँस लेती हूँमिरे अंदरकोई पैरों में घुंघरू बाँधता हैरक़्स का आग़ाज़ करता हैमिरे कानों के आवेज़ों को ये किस ने छुआजिस से लवें फिर से गुलाबी हो गई हैंकोई सरगोशियों में फिर से मेरा नाम लेता हैफ़ज़ा की नग़्मगी आवाज़ देती हैहवा जाम-ए-सेहत तज्वीज़ करती है
मगर कोई तोड़े दे रहा हैलरज़ती मिज़्गाँ के नश्तरों कोदिलों के अंदर उतारता हैकोई सियासत के ख़ंजरों कोकिसी के ज़हरीले तेज़ नाख़ुनउक़ाब के पंजा-हा-ए-ख़ूनींकी तरह आँखों पे आ रहे हैंगुलाब से तन मिसाल-ए-बिस्मिलज़मीन पर तिलमिला रहे हैंजो प्यास पानी की मुंतज़िर थीवो सूलियों पर टंगी हुई हैवो भूक रोटी जो माँगती थीसलीब-ए-ज़र पर चढ़ी हुई हैये ज़ुल्म कैसा, सितम ये क्या हैमैं सोचता हूँ ये क्या जुनूँ हैजहाँ में नान-ए-जवीं की क़ीमतकिसी की इस्मत, किसी का ख़ूँ है
तमाम लफ़्ज़ों में रौशन हर इक बाब में माँजुनूँ के शेल्फ़ में है इश्क़ की किताब में माँऐ माँ तो ख़ुशबू का नायाब इस्तिआ'रा हैऐ माँ तू ऊद में अम्बर में तू गुलाब में माँख़ुद अपनी ममता में ही नूर का समुंदर हैनहीं है और किसी रौशनी की ताब में माँवो जिस्म खो के बदल सी गई है कुछ मुझ मेंथी पहले सिर्फ़ सवाल अब है हर जवाब में माँमिरे सवालों के सारे जवाब ले आईचली गई थी मगर लौटी फिर से ख़्वाब में माँमैं जब भी ज़ब्ह हुई ज़िंदगी के ख़ंजर सेदुखी है ख़्वाबों में इक दश्त-ए-इज़्तिराब में माँगँवा के जिस्म वो फ़ुर्सत से आई मेरे पाससिसक सिसक के सुनाया थी किस अज़ाब में माँमैं माँ की ज़िंदा निगाहों को ख़ुद में जीती हूँहर इंक़लाब में हर दम हर आब-ओ-ताब में माँमिरे उरूज का वो सिलसिला इनआ'म-ओ-सज़ामिरे ज़वाल में हर ज़िंदा इंक़लाब में माँतुझे लुभाने को मैं सतरंगी बनी थी माँये जा छुपी है तू किस पर्दा-ए-ग़याब में माँबंधी हैं आँखें मिरी अब भी मौत के पुल सेहै हर सुकूत में ख़ामोश इज़्तिराब में माँउमड रहे हैं हर इक पल से मौत के ढट्ढेवो जा रही है मिरी पंजा-ए-उक़ाब में माँवो जिस्म हार गई मौत से मगर मुझ मेंवो जी के गोया है फिर मौत से जवाब में माँ
چيونٹيميں پائمال و خوار و پريشان و دردمندتيرا مقام کيوں ہے ستاروں سے بھي بلند؟عقابتو رزق اپنا ڈھونڈتي ہے خاک راہ ميںميں نہ سپہر کو نہيں لاتا نگاہ ميں!
क्या लेगा ख़ाक-ए-मुर्दा-ओ-उफ़्तादा बन के तूतूफ़ान बन कि है तिरी फ़ितरत में इंक़लाबक्यूँ टिमटिमाए किर्मक-ए-शब-ताब की तरहबन सकता है तू औज-ए-फ़लक पर अगर शहाबवो ख़ाक हो कि जिस में मिलें रेज़ा-हा-ए-ज़रवो संग बन कि जिस से निकलते हैं लाल-ए-नाबचिड़ियों की तरह दाने पे गिरता है किस लिएपर्वाज़ रख बुलंद कि तू बन सके उक़ाबवो चश्मा बन कि जिस से हों सरसब्ज़ खेतियाँरह-रौ को तू फ़रेब न दे सूरत-ए-सराब
नवम्बर की ज़र्द-रू धूपखिड़की के रौज़न से निकल करहर सू फैल गई हैवीरान उजाड़ कमरे मेंख़ुश्क मोटी किताबें हैंनीम-शब की जली अध-जली सिगरेटेंबूढे शाइ'र का पुराना चश्माझुर्रियों भरे हाथों की लर्ज़िश में अनोखे अल्फ़ाज़रंग ख़ुशबू फ़लक-पैमाई के नए अंदाज़किर्म-ख़ुर्दा मेज़ के अक़ब में बूढ़ा शाइ'रपार कर की मोटी निब से लिखे जा रहा हैरंग की ज़बाँ में ख़ुशबू के अफ़्सानेउसे ख़बर भी नहींकिनवम्बर की ज़र्द-रू धूपउस की मेज़ पर सरक आई हैऔरअंगूर की सर्द ख़ुश्क बेलखिड़की की दर्ज़ सेउसे झाँकती है
मैं आसमान के साथ फैली शाम की नारंजी रौशनी हूँया सूरज की आँख में रेंगती सुर्ख़ धार?क्या है मेरा वजूद?यौम-ए-ईद क़ुर्बान होती भेड़ों का सब्रया हीरों के तआक़ुब में कोएला कोएला फिरती ख़्वाहिश?मैं सरमा में अबाबीलों की मुरझाई रूह हूँया सरमस्त दरख़्तों की चोटियों में मदहोश हवा?हाँ...... मैं रात की झिलमिलाती रौशनियों के पीछेउलझी आलूदा शिकन हूँबच्चा जन्ती माँ की आख़िरी चीख़ मेरी मोहब्बत हैमैं राह-गीरों की ला-परवाह ख़ुशी मेंसहमा ख़ौफ़ हूँमैं गौतम के मुस्कुराते रुख़्सारों का लम्स हूँसातवें आसमान पर ग़ोता-ज़न परिंदेअगर मेरी पुर-सुकून रूह में पर्वाज़ करते हैंतो फिर ये कैसा बोझ हैजो तुम्हारे छोड़ जाने के ब'अदइस ग़ुबार-आलूद सीने में जमने लगा है?लेकिन मेरा ग़ुस्सा किस शेर के बदन में झरझराता है?मेरी आग किस उक़ाब की आँखों में कपकपाती है?जिसे तुम्हारी हँसी तुम्हारे मक्कार दिलऔर तुम्हारी धोके-बाज़ नाफ़ में उंडेल सकूँ!
एक टहनी पे बैठे थे मिठ्ठू मियाँआ गया एक कव्वा भी उड़ कर वहाँआइए आइए शौक़ फ़रमाइएमीठा अमरूद है आप भी खाइएबोला कव्वा कि ख़ामोश टें टें न करवर्ना मैं फोड़ दूँगा अभी तेरा सरबेवक़ूफ़ों से मैं बात करता नहींअपने दर्जे से नीचे उतरता नहींकौन सा तू उक़ाब और शाहीन हैमुँह लगाना तुझे मेरी तौहीन हैबोलीं कव्वे ने जब ऐसी बड़ बोलियाँतो ग़ुस्से में बोले ये मिठ्ठू मियाँतू ने क्या तीर मारे हैं मैं भी सुनूँतेरी चालाकियों पर ज़रा सर धुनोंबोला कव्वा कि ओ रट्टू तोते ये सुनमेरी दानिश का हर शख़्स गाता है गुनकर दूँ रौशन अभी तेरे चौदह तबक़याद है बच्चे बच्चे को मेरा सबक़एक दिन जब बहुत सख़्त प्यासा था मैंये समझ ले कि बस अध-मरा सा था मैंएक मटके में पानी की देखी झलकचोंच डाली तो पहुँची न पानी तलकज़ेहन ने काम करना शुरूअ' कर दियामटका कंकर से भरना शुरूअ' कर दियाउन की तादाद मटके में जब बढ़ गईसत्ह पानी की ऊपर तलक चढ़ गईमैं ने पानी गटा-गट गटा-गट पियाफिर फुदकते हुए काएँ काएँ कियादेख ले किस क़दर तेज़ तर्रार हूँकितना चालाक हूँ कितना हुश्यार हूँबोले मिठ्ठू मियाँ मार कर क़हक़हाबे-वक़ूफ़ी की बस हो गई इंतिहाजाने मटके में पानी था कब से पड़ाफिर ढकना भी नहीं था खुला था घड़ागंदे कंकर भी भरता गया उस में तूपी गया ऐसे पानी को फिर आख़ थूऐसे पानी से लगती हैं बीमारियाँपेश आती हैं कितनी ही दुश्वारियाँख़ुद को कहता अक़्ल-मंद-ओ-दाना है तूलेकिन अफ़्सोस अहमक़ का नाना है तूतू अगर गंदी चीज़ें न खाए पिएलोग पालें तुझे तू मज़े से जिएसाफ़ होता तो घर घर बुलाते तुझेइस तरह मार कर क्यूँ भगाते तुझेकव्वा सुनते ही ये बात रोने लगाअपने पर आँसुओं से भिगोने लगाऔर कहने लगा बात सच है तिरीलोग करते हैं नफ़रत शक्ल से मिरीकव्वा रो रो के जब आह भरने लगाउस पे मिठ्ठू ने ये तर्स खा कर कहाछोड़ दे इस तकब्बुर बड़ाई को तूअपनी आदत बना ले सफ़ाई की तूगंदा पानी न पी गंदी चीज़ें न खाउन में होता है डेरा जरासीम काये जरासीम बीमार कर देते हैंअच्छे ख़ासों को बे-कार कर देते हैंयूँ ब-ज़ाहिर था कव्वा बहुत काइयाँउस को समझा के हर बात मिठ्ठू मियाँउड़ गए अपने पर फड़फड़ाते हुएमिठ्ठू बेटे के नारे लगाते हुए
पानी दरियाओं से निकलाऔर जंगल बन गयालफ़्ज़ किताब से निकलाऔर आलिम बन गयामैं उस की निय्यत के अँधेरे से निकलाऔर आज़ादी क्यूँ न बन सकाहवा बादबान से गिरीऔर मल्लाह का गीत बन गईबोसा होंटों से गिराऔर मोहब्बत का परिंदा बन गयादिन उक़ाब की चोंच से गिराऔर सूरज-मुखी का बाग़ क्यूँ न बन सका
मुझ से मिलो तुमअजनबी मुल्कों की सैर-ओ-सियाहत मेंप्यार के रस्म-ओ-रिवाज मेंहल्क़ा-ए-याराँ मेंतूफ़ान-ए-बाद-ओ-बाराँ मेंसेंटौरस के अक़ब मेंछप्पर होटल के टूटे हुए टेबल परचाँद पे बैठी हुई बुढ़िया के नूरानी चर्ख़े मेंअस्सी की दहाई की फ़िल्मों के ज़िक्र मेंपुरानी किताबों की दूकान परनिस्वानी ख़ुशबुओं के चौक परबोसों की तकरार मेंमुझ से मिलो तुम
जब पढ़ाई करते करते बोर हो जाता हूँ मैंदाब कर बल्ला बग़ल में फ़ील्ड पर आता हूँ मैंफिर नहीं दुनिया-ओ-मा-फ़ीहा का कुछ रहता ख़यालखेलता जाता हूँ मैं बस खेलता जाता हूँ मैंडेड पिच हो या स्लो बॉलर तो मेरे ऐश हैंफ़ासट पिच और तेज़ बॉलर हो तो घबराता हूँ मैंइन कटर आउट कटर से हो के बिल्कुल बे-नियाज़बंद कर के आँख बस बल्ला घुमा जाता हूँ मैंजब मैं छक्का मारता हूँ और वो हो जाता है कैचअपनी इस दीवानगी पर झेंप सा जाता हूँ मैंˈफ़ॉवड् जाता हूँ मैं गुगली उठाने के लिएअक़ब में अपने मगर विकटें गिरी पाता हूँ मैंसैंचरी का गरचे ले कर दिल में जाता हूँ ख़याललेकिन अक्सर ले कर अंडा ही पलट आता हूँ मैंहो के अब मोहतात मैं खेलूँगा अगले मैच मेंहर दफ़ा ये कह के अपने दिल को समझता हूँ मैं
इक जंगल में हुए इकट्ठेसारे जानवरों के बच्चेभेड़ ने अपना लल्ला भेजागाय ने भी बछड़ा भेजाकुत्ते का पिल्ला भी आयाउल्लू का पट्ठा भी आयाबकरी ने भी मेमने भेजेऔर बिल्ली ने बिलाैटे भेजेमुर्ग़ी के चूज़े भी आएबतख़ के बच्चे भी आएघोड़े का चालाक बछेराभैंस के कड़े के साथ आयाबाज़ कबूतर कव्वा चिड़ियाहाथी ऊँट उक़ाब और शिकराबंदर शेर हिरन और कछवातीतर मोर बटेर और बगुलातोता मैना फ़ाख़्ता सब नेअपने अपने बच्चे भेजेकहीं थीं चीं चीं कहीं च्याउँकहीं थी में में कहीं म्याऊँसब ने मिल कर शोर मचायाइक ख़िख़्याया इक मिम्यायाकोई चीख़ा कोई भौंकाउल्लू भी सोते में चौंकाख़ूब ये जल्सा चमका या'नीबात न समझा कोई किसी की
हुजूम जिस की ठोकरों की ज़र्ब सेहवा में हाँफता हुआ ग़ुबार छट नहीं रहाग़ुबार में जो ख़ाक है ज़मीन से उड़ी है याकिसी के सर्द जिस्म से ख़बर नहींख़बर भी हो तो क्या बिगाड़ ले कोईहुजूम हट नहीं रहाअबद की शाख़-ए-सब्ज़ पर खिला हुआशबाब का गुलाब पत्तियों में बट नहीं रहाहुजूम बे-सुकून है सवाल मर नहीं रहासवाल का ज़बान से जुड़ा हुआ जो तार हैवो तार कट नहीं रहाहुजूम हट नहीं रहावो मर गयाहुजूम उस की माँ की बद-दु'आ से डर नहीं रहाहुजूम उसे चटख़ती पसलियों के बल घसीटता चला गयाकिसी ने उस के ज़ख़्म को लुआब का कफ़न दियाकोई बदन को लाठियों से पीटता चला गयाक़रीब चंद लोग 'अक्स-बंद कर रहे हैंकैमरों में ऐसे खेल कोकि जिस में सब खिलाड़ियों की आस्तीं पे ख़ून हैहुजूम को जुनून है हुजूम हट नहीं रहामैं मुंतज़िर हूँ इक तरफ़मिरे अक़ब में चुप खड़ी है इक मुहाफ़िज़ों की सफ़हुजूम हट नहीं रहाहुजूम से कहो हटे ग़ुबार जाने कब छटेमैं उस के दर्द से भिंचे शिकस्ता हाथ की गिरफ़्त सेज़रा सी नज़्म खींच लूँमुहाफ़िज़ों का तर्जुमाँ दु'आ-ए-ख़ैर में मगननहीं नहीं वो पहले से रटा हुआ बयान रट नहीं रहामशाल ख़ान ख़ैर होतमाशा-गाह से तो राएगाँ पलट नहीं रहाहुजूम हट नहीं रहा
मैं आज दफ़्तर में सुब्ह पहुँचातो इक नया ज़र्द ज़र्द चेहरा नज़र पड़ाजिस को देखते हीमअन मिरे दिल में इक दरीचा खुलाऔर उस के अक़ब सेउस ज़र्द शक्ल की हम-शबीहइक सुर्ख़ शक्ल उभरीशरीर गुस्ताख़ बे-तकल्लुफ़उभर के मेरे क़रीब आई
हैरान हूँये कौन सा शहर है'मीर'-ओ-'ग़ालिब' की दिल्ली कभी ऐसी तो न थीहर गली हर नुक्कड़ पर साँप कुंडली मारे बैठे हैं यहाँपैदा होते ही कोई भी सँपोलाडसने के लिए पर तोलने लगता हैजिधर देखिएहर जगह साँप ही साँप हैंकहीं ख़ूनी दरवाज़े के अक़ब सेतो कहीं धौला-कुआँ के फ़्लाई ओवर परहर जगह कुंडली मारे हुए यहाँहज़ार-हा साँप ऐसे हैंजो हर दम तय्यार बैठे हैंमौक़ा मिलते हीवो किसी भी नर्म-ओ-गुदाज़ बदन कोनिशाना अपना बना लेते हैंअपने ज़हरीले दाँत गाड़ ने के लिएजब वो फनफना कर बाहर आते हैंकिसी भी राहगीर का रस्ता रोकेएक दमतन के खड़े हो जाते हैंहत्ता किबूढ़ा नाग भी अब यहाँअपने खंडर में तन के खड़ा हैउसे भी इंतिज़ार हैबरसात की उस काली अँधेरी रात का हैजब वो बुल-हवसअपने कोहना-मश्क़ दाँतों कोकिसी नर्म-ओ-नाज़ुक ग़ज़ाला परतेज़ कर सके हमला-ए-ख़ूँ-रेज़ कर सकेअपनी उम्र के इस आख़िरी पड़ाव में वो बुल-हवसकोई वारदात-ए-जुनूँ-अंगेज़ क़यामत-ख़ेज़ कर सकेया ख़ुदाये कौन सा मक़ाम हैक्या ये तेरा क़हर नहीं हैक्या ये वही पुराना शहर नहीं हैसोचता हूँ'मीर'-ओ-'ग़ालिब' की दिल्ली कभी ऐसी तो न थी
उलझती साँसों की सख़्त गिर्हेंबदन के अंदर खींची हुई हैंनिढाल सदियों के फ़ासलों का सफ़र कि पाँव में पल रहा हैधड़ों के नीचे हमारा सायाहमारे जिस्मों को रेज़ा रेज़ा निगल रहा है(२)समुंदरों से हवा लिपट कर नई रुतों का विसाल माँगेज़मीं की ख़ुश्बू सहर की आहट के धुँदले ख़्वाबों का अक्स फैलेहमें यक़ीं है हवा के गदले सफ़र से आगेचमकते लम्हों की रहगुज़र हैनए गुलाबों की सरज़मीं हैहमारे पाँव में आने वाले सफ़र की ख़्वाहिश तड़प रही हैहमारी आँखों में बावले ख़्वाब का नशा हैहम अपने अपने धड़ों के ताबूत से निकल करबढ़े कि सूरज का जिस्म छीनेंज़मीं की ख़ुश्बू का खोज पाएँहम एक मुद्दत से सोचते हैंकि आसमाँ के सियाह पत्थर में अब किरन का शिगाफ़ उतरेज़मीं की पाताल से कशिश होनए गुलाबों की मस्त ख़ुश्बू बदन में फैलेमगर वही धुंद का सफ़र हैकटी-फटी सर्द उँगलियों पर लहू के जुगनू चमक चमक कर बिखर चुके हैंरगों के रेशों में ताज़ा ख़्वाहिश की कश्मकश सर्द पड़ चुकी हैधोएँ के फंदे में मरने वालों के नाम ज़ेहनों की तख़्तियों सेउतर रहे हैंसरों पे कर्ब-ओ-बला के मौसम का सख़्त ख़ेमा खींचा हुआ हैहवा पे लिक्खे हुए हैं नौहेफ़ज़ा में लटके हुए हैं चेहरेउफ़ुक़ पे टूटी हुई लकीरेंज़मीं पे फैले हुए हैं साएसमुंदरों से लिपटने वाली हवा की अन-देखी डोरियों काकोई सिरा हाथ में नहीं हैहमारी पलकें उधड़ चुकी हैंतमाम ख़्वाबों की धुँदली रूहें मुहीब जंगल के रास्तों परभटक रही हैंउलझती साँसों की सख़्त गिर्हेंअभी तलक जिस्म पर खींची हैंहमारे नीचे किसी ज़मीं की कशिश हो शायदयहीं कहीं धुंद के अक़ब में हो कोई सूरज निकलने वालाहवा के गदले सफ़र से आगे चमकते लम्हों की रहगुज़र होनए गुलाबों की सर-ज़मीं होमगर पिघलते बदन को तहलील करने वाली अजीब साअ'त सदा अटल हैहमारी ख़्वाहिश ये नेक साअ'त हमारी आँखों में घुल के फैलेहमारे जिस्मों का दर्द पिघलेहमारी ख़्वाहिश ये नेक साअ'त सुकूत बन कर तड़पते जिस्मों में आ के ठहरेउलझती साँसों की गिर्हें खोलेहम उस की ख़ुश्बू के पुर-सुकूँ मल्गजे अंधेरे की गहरी लज़्ज़त के मुंतज़िर हैंहम उस की ख़्वाहिश में अपने अपने धड़ों के ताबूत में बंधे हैं
शैख़-ज़मन-शादानीआओख़्वाब देखते हैंयाद नगर में साए फिरते हैंतन्हाई सिसकारी भरती हैअपनी दुनिया तारीकी में डूब चलीबाहर चल कर महताब देखते हैंशैख़-ज़मन-शादानीआओख़्वाब देखते हैंहम से पहले कौन कौन से लोग हुएजो साहिल पर खड़े रहेजिन की नज़रें पानी से टकरा टकरा करटूट टूट कर बिखर गई हैंबिखर गई हैं और पानी का सब्ज़ा हैंइस सब्ज़े के पीछे क्या हैआज अक़ब मेंछुपे हुए गिर्दाब देखते हैंशैख़ ज़मन शादानीआओख़्वाब देखते हैं
इस ख़याबाँ के अक़ब मेंवो जो पुर-असरार दुनियाएँ बसी हैंवो हमें क्यूँ खींचती हैं?
बारिश के बअ'दजब धरती अपने मैले कपड़े उतारती हैमैं हर शाम, राज़ों के तआ'क़ुब मेंउस के दाऊदी बदन पर फैल जाता हूँऔर दीवारें फलांगता, ख़ुदा के शिकस्ता सहन मेंनक़ब लगाता हूँमेरे वजूद में एक अंधा ख़ला फैलने लगता हैमैं देखता हूँआसमान में कोई उक़ाब छपा हैजो हमारी ज़िंदगियों के चूज़े उचक रहा हैमैं उन दरख़्तों से मुख़ातब होता हूँजिन की जड़ों में च्यूंटियाँअपनी मौत पर सोगवार रहती हैंभीगी शाख़ों पर सहमे कव्वे रात भर काँपते रहते हैंकितनी बे-रहम लगती है ज़िंदगी!जहाँ मौत बरसती हैऔर लाखों साँसें बे-वक़'अत आवारा कुत्तों की तरहमर जाती हैंवहाँ फिर मुस्कुराता घना जंगल उग आता हैइस ला-मुतनाही वुसअत में हम साबुन पर चिमटे बाल सेज़्यादा कुछ नहीं रहतेवक़्त जिसे, एड़ी पर जमे मेल की तरह धो डालता है
Devoted to the preservation & promotion of Urdu
A Trilingual Treasure of Urdu Words
Online Treasure of Sufi and Sant Poetry
World of Hindi language and literature
The best way to learn Urdu online
Best of Urdu & Hindi Books