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नज़्म
अपना हर ख़्वाब-ए-जवाँ सौंप चला हूँ तुझ को
अपना सरमाया-ए-जाँ सौंप चला हूँ तुझ को
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
दो शम्ओं' की लौ पेचाँ जैसे इक शो'ला-ए-नौ बन जाने की
दो धारें जैसे मदिरा की भरती हुइ किसी पैमाने की
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
जब भी महताब-ए-ज़र-अफ़्शाँ के हो चेहरे पे नक़ाब
जान हम रख के हथेली पर उलट देते हैं
नूर-ए-शमा नूर
नज़्म
कैसे कैसे अक़्ल को दे कर दिलासे जान-ए-जाँ
रूह को तस्कीन दी है दिल को समझाया भी है
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
उखड़ी-उखड़ी बात करे है भूल के अगला याराना
कौन हो तुम किस काम से आए? हम ने न तुम को पहचाना
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
इस के दम से हम पे वाज़ेह उक़्दा-ए-मर्ग-ओ-हयात
इस के दम से हम पे रौशन है जहान-ए-काएनात
अता आबिदी
नज़्म
लाख सर मारा मगर उक़्दा-ए-मा'नी न खुला
कौन हूँ क्या हूँ मैं सद-हैफ़ न समझा असलन