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नज़्म
वो जिन की फ़िक्र में रहती थी मैं 'वफ़ा' बेचैन
ग़म-ओ-ख़ुशी के मिरे तर्जुमान हो गए हैं
अमतुल हई वफ़ा
नज़्म
ऐ वफ़ा खुलते हैं तुझ पर आज क्या क्या राज़ देख
चल चमन में बुलबुल-ओ-गुल के नियाज़-ओ-नाज़ देख
मेला राम वफ़ा
नज़्म
फ़र्ज़ करो हम अहल-ए-वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों
फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूटी हों अफ़्साने हों
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
आज तो हम बिकने को आए, आज हमारे दाम लगा
यूसुफ़ तो बाज़ार-ए-वफ़ा में, एक टिके को बिकता है
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
अपनी मन-मानी ही आख़िर में करेंगे अब तो
दहर को वादा-ए-पुर-कैफ़ से मिन्नत-कश-ए-एहसान करो
मख़मूर जालंधरी
नज़्म
रोज़ मुझ को वा'दा-ए-फ़र्दा पे जो टरख़ाए है
मैं तिरी चालों को समझूँ हूँ मुझे बहलाए है
ज़रीफ़ जबलपूरी
नज़्म
सब्र का फल लोग कहते हैं मिलेगा एक दिन
आह कब तक इंतिज़ार-ए-वा'दा-ए-फ़र्दा करूँ