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नज़्म
और कभी जब दिन निकला तो बीत गए जुग हुई न रात
हर-सू मह-वश सादा क़ातिल लुत्फ़-ओ-इनायत की सौग़ात
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
ले अर्श ता-ब-फ़र्श चमकता है जिस का नूर
गुज़रे है उन की क़ब्र पे जब वहश और तुयूर
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
तेरे पहलू में है ये किस हूर-वश की यादगार
जिस से रातों को उठा करते हैं आहों के शरार
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
हज़ारों ज़ुल्फ़-ए-परी-वश के याँ थे सौदाई
हज़ारों मय-कश-ओ-मय-ख़्वार-ओ-मस्त-ओ-सहबाई