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नज़्म
फ़र्दा महज़ फ़ुसूँ का पर्दा, हम तो आज के बंदे हैं
हिज्र ओ वस्ल, वफ़ा और धोका सब कुछ आज पे रक्खा है
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
दुश्नाम और बलवों के और दू-ब-दू के बीच
जैसे कि कोई बैठा हो बज़्म-ए-अदू के बीच
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
हल्का फुल्का जिस्म-ए-नाज़ुक पर दुपट्टा सुर्ख़ सुर्ख़
वस्ल-ए-रूहानी की शादी से वो चेहरा सुर्ख़ सुर्ख़
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
ख़ाक-ओ-ख़ूँ की चाशनी में कौन अब लाएगा वस्ल-ओ-हिज्र के मौसम यहाँ
अब वो गुम-गश्ता ख़ज़ीनों की ख़बर
ग़ालिब अहमद
नज़्म
ख़िज़्र की बेजा ख़ुशामद ही मुक़द्दम है यहाँ
वस्ल-ए-मंज़िल के लिए पा-ए-जुनूँ शर्त नहीं