aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "vasvasaa"
ये सच है मुसलमान तबाही से घिरा हैइक वसवसा-ए-ला-मुतनाही से घिरा है
कभी ख़ुद अपनी क़बा का ख़याल आता हैज़रा सा वसवसा-ए-माह-ओ-साल आता है?
हक़ीक़तन इस दफ़'अ जो तुम ने लगाया सीने से रो न दूँ मैंये वसवसा है कि तुम को मैं ने जो दिल से चाहा तो खो न दूँ मैं
किसी खोए ख़्वाब का वसवसाकिसी गहरी शब की सरिश्त में
न कोई वसवसा जागे
हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक-रंग हैं आजआबगीनों में तपाँ वलवला-ए-संग हैं आज
हुज़ूर ख़ैरियत तो है हुज़ूर क्यूँ ख़मोश हैंहुज़ूर बोलिए कि वसवसे वबाल-ए-होश हैं
बदल दें ज़माने को वो हौसला थाहर इक दिल में पैदा नया वलवला था
हज़ार चश्मे उबल रहे थेन वसवसे थे न रंज-ओ-ग़म थे
मैं एक सहरा सही मगर मुझ पे घिर के बरसोमुझे महकने का वलवला दो
वो नग़्मा कि इक वलवला-ए-शोला-ज़नी हैक्या गुल-बदनी गुल-बदनी गुल-बदनी है
लम्हा लम्हा ख़ौफ़ के मारे हुएरात दिन के वसवसों में
हर हादसे में अहल-ए-वतन मुस्तइद रहेंवो वलवला जगाओ कि पंद्रह अगस्त है
मगर ये ख़दशे, ये वसवसे तो तकल्लुफ़न हैंजो बे-इरादा सफ़र पे निकलें
दिलों में वलवला-ए-इंक़लाब है पैदाक़रीब आ गई शायद जहान-ए-पीर की मौत
लहू में ख़ौफ़ सही दिल में वसवसे ही सहीवबा से जंग के ये रोज़-ओ-शब बुरे ही सही
दयार-ए-हू में बैठा हूँ न कुछ आगे न कुछ पीछेसिवा कुछ वसवसों के कुछ ख़सारों के कमर-बस्ता
दिलों में है जो वलवलातो डाल दोगे ज़लज़ला
न हम-नशीं न वलवला कि लौ कहीं लगाएँ हमन हौसला कि सख़्तियाँ फ़िराक़ की उठाएँ हम
वसवसों के संपोलिए कुलबुला रहे थेअचानक आवाज़ आई
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