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नज़्म
ये हंगाम-ए-विदा-ए-शब है ऐ ज़ुल्मत के फ़रज़ंदो
सहर के दोश पर गुलनार परचम हम भी देखेंगे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
दिल से बस होगी यही हर्फ़-ए-विदाअ की सूरत
लिल्लाहिल-हम्द ब-अनजाम-ए-दिल-ए-दिल-ज़दगाँ
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
विदा-ए-रोज़-ए-रौशन है गजर शाम-ए-ग़रीबाँ का
चरा-गाहों से पलटे क़ाफ़िले वो बे-ज़बानों के
नज़्म तबातबाई
नज़्म
मचलती हुई मस्त लहरों को साहिल से छुटने का ग़म ही नहीं है
विदा-ए-सुकूँ जैसे कोई सितम ही नहीं है
बशर नवाज़
नज़्म
तुम्हीं ने जिस को विदाअ किया था वो दूर जा कर इक ऐसी बस्ती में बस गई है
जहाँ कोई हम-ज़बाँ नहीं है