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नज़्म
अभी तहज़ीब-ए-अदल-ओ-हक़ की कश्ती खे नहीं सकती
अभी ये ज़िंदगी दाद-ए-सदाक़त दे नहीं सकती
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मोहम्मद इज़हारुल हक़
नज़्म
रख भी दे अब इस किताब-ए-ख़ुश्क को बाला-ए-ताक़
उड़ रहा है रंग-ओ-बू की बज़्म में तेरा मज़ाक़
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
सुना है हो भी चुका है फ़िराक़-ए-ज़ुल्मत-ओ-नूर
सुना है हो भी चुका है विसाल-ए-मंज़िल-ओ-गाम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
फिर लहू बहने लगा आँखों से क्या फिर छिड़ गया
हल्क़ा-ए-अहबाब में ज़िक्र-ए-विसाल-ए-'आरज़ू'
मासूम शर्क़ी
नज़्म
तमाम कूज़े बनते बनते 'तू' ही बन के रह गए
नशात इस विसाल-ए-रह-गुज़र की ना-गहाँ मुझे निगल गई
नून मीम राशिद
नज़्म
वो शिद्दत-ए-बयाँ हो कि हो जुरअत-ए-बयान-ए-हक़
गुस्ताख़ इतनी हो गई मेरी ज़बाँ कभी कभी
अशरफ़ बाक़री
नज़्म
विसाल ओ हिज्राँ की दास्तानों का नौहागर हूँ
जिन्हें ये दुनिया हज़ार-हा बार सुन चुकी है
असअ'द बदायुनी
नज़्म
फ़ज़ा-ए-क़ुदरत-ए-हक़ में सदा आबाद होता है
ख़ुदा की क़ुदरतों को देख कर दिल शाद होता है