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नज़्म
न दर्द-मंद इश्क़ हैं न चारा-साज़-ए-दर्द हैं
उठे तो क्या रहे तो क्या कि रहगुज़र की गर्द हैं
क़ैसर अमरावतवी
नज़्म
फैज़ तबस्सुम तोंसवी
नज़्म
वो साहिरा थी या किसी ख़याल का वजूद थी
ख़ुदी में एक ख़्वाब थी या ख़्वाब की नुमूद थी
अशफ़ाक़ अहमद साइम
नज़्म
मैं हूँ 'मजाज़' आज भी ज़मज़मा-ए-संज-ओ-नग़्मा-ख़्वाँ
शाइर-ए-महफ़िल-ए-वफ़ा मुतरिब-ए-बज़्म-ए-दिलबराँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
फोड़ कर सर जेल में बे-चारा मजनूँ मर गया
और सदाएँ हर तरफ़ हैं यार ज़िंदाबाद की
इस्मतुल्लाह इस्मत बेग
नज़्म
किस बला की तीरगी ऐ चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम है
कुछ पता चलता नहीं ये सुब्ह है या शाम है