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नज़्म
वो ख़ाक हो कि जिस में मिलें रेज़ा-हा-ए-ज़र
वो संग बन कि जिस से निकलते हैं लाल-ए-नाब
सय्यद वहीदुद्दीन सलीम
नज़्म
पा-प्यादा और फिर सदा ज़बाँ में
सोज़-हा-ए-अंदरूँ के क़िस्सा-ए-पारीना की तफ़्सील में ता'बीर में
इकराम ख़ावर
नज़्म
सब्ज़ा ओ बर्ग ओ लाला ओ सर्व-ओ-समन को क्या हुआ
सारा चमन उदास है हाए चमन को क्या हुआ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
वो झुकते रहते हैं लब-हा-ए-इक़तिदार की सम्त
वो सुनते रहते हैं बस हुक्म-ए-हाकिमान-ए-जहाँ
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
इक मुकम्मल ज़िंदगी है शाइ'र-ए-शीरीं-बयाँ
महरम-ए-राज़-ए-फ़ना है और बक़ा का तर्जुमाँ