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नज़्म
अक़ल्लीयत कहीं की हो तह-ए-ख़ंजर ही रहती है
हलाकत-ख़ेज़ हाथों के हज़ारों जब्र सहती है
ओवेस अहमद दौराँ
नज़्म
इक़बाल सुहैल
नज़्म
गुलू-ए-कुश्ता से बेहिस ज़बान-ए-ख़ंजर से
सदा लपकती है हर सम्त हर्फ़-ए-हक़ की तरह
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
फिर इत्तिसाल-ए-गर्दन-ओ-ख़ंजर है क्या कहूँ
फिर इख़्तिलात-ए-ज़ख़्म-ओ-नमक-दाँ है क्या करूँ
जोश मलीहाबादी
नज़्म
गई ये चीन-ओ-जापान और गई यूरोप के मुल्कों में
रहा जो चंद दिन हिन्द में हुई उस की ज़बाँ उर्दू
निसार कुबरा अज़ीमाबादी
नज़्म
भरोसा क्या करें अहल-ए-गुलिस्ताँ लाला-ओ-गुल पर
अनादिल की ज़बान-ए-पुर-बयाँ कुछ और कहती है
रज़ी बदायुनी
नज़्म
न सुर्ख़ी-ए-लब-ए-खंजर न रंग-ए-नोक-ए-सिनाँ
न ख़ाक पर कोई धब्बा न बाम पर कोई दाग़
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
सबा उस से ये कह जो उस तरफ़ हो कर गुज़रता हो
क़दम ओ जाने वाले रोक मेरा हाल सुनता जा
अज़ीमुद्दीन अहमद
नज़्म
यही दस बीस अगर हैं कुश्तागान-ए-ख़ंजर-अंदाज़ी
तो मुझ को सुस्ती-ए-बाज़ू-ए-क़ातिल की शिकायत है