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नज़्म
जिसे पढ़ने से उस की सर्द-मेहरी सर्द पड़ जाए
जो उस के दिल का ज़ंगी क़ुफ़्ल खोले और वो मुझ को
शहनाज़ परवीन शाज़ी
नज़्म
ये सारी लूट-मार जाल-साज़ी हराम-ज़दगी बे-सब्री ना-शुक्र-गुज़ारी
ये सारा झूट फ़रेब लालच फ़ित्ना फ़साद
मोहम्मद हनीफ़ रामे
नज़्म
दुनिया को ग़रज़ क्या है मिरी ग़म-ज़दगी से
क्यों सारा ज़माना मिरी जानिब निगराँ है