aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "zafar"
मईशत दूसरों के हाथ में है मेरे क़ब्ज़े मेंजुज़ इक ज़ेहन-ए-रसा कुछ भी नहीं फिर भी मगर मुझ कोख़रोश-ए-उम्र के इत्माम तक इक बार उठाना हैअनासिर मुंतशिर हो जाने नब्ज़ें डूब जाने तकनवा-ए-सुब्ह हो या नाला-ए-शब कुछ भी गाना हैज़फ़र-मंदों के आगे रिज़्क़ की तहसील की ख़ातिरकभी अपना ही नग़्मा उन का कह कर मुस्कुराना हैवो ख़ामा-सोज़ी शब-बेदारियों का जो नतीजा होउसे इक खोटे सिक्के की तरह सब को दिखाना हैकभी जब सोचता हूँ अपने बारे में तो कहता हूँकि तू इक आबला है जिस को आख़िर फूट जाना हैग़रज़ गर्दां हूँ बाद-ए-सुब्ह-गाही की तरह लेकिनसहर की आरज़ू में शब का दामन थामता हूँ जबये लड़का पूछता है अख़्तर-उल-ईमान तुम ही होये लड़का पूछता है जब तो मैं झल्ला के कहता हूँवो आशुफ़्ता-मिज़ाज अंदोह-परवर इज़्तिराब-आसाजिसे तुम पूछते रहते हो कब का मर चुका ज़ालिमउसे ख़ुद अपने हाथों से कफ़न दे कर फ़रेबों काइसी की आरज़ूओं की लहद में फेंक आया हूँमैं उस लड़के से कहता हूँ वो शोला मर चुका जिस नेकभी चाहा था इक ख़ाशाक-ए-आलम फूँक डालेगाये लड़का मुस्कुराता है ये आहिस्ता से कहता हैये किज़्ब-ओ-इफ़्तिरा है झूट है देखो मैं ज़िंदा हूँ
ख़ुदा-ए-बर्तर तिरी ज़मीं पर ज़मीं की ख़ातिर ये जंग क्यूँ हैहर एक फ़त्ह-ओ-ज़फ़र के दामन पे ख़ून-ए-इंसान का रंग क्यूँ है
किस ज़बाँ से कह रहे हो आज तुम सौदागरोदहर में इंसानियत के नाम को ऊँचा करोजिस को सब कहते हैं हिटलर भेड़िया है भेड़ियाभेड़िये को मार दो गोली पए-अम्न-ओ-बक़ाबाग़-ए-इंसानी में चलने ही पे है बाद-ए-ख़िज़ाँआदमिय्यत ले रही है हिचकियों पर हिचकियाँहाथ है हिटलर का रख़्श-ए-ख़ुद-सरी की बाग परतेग़ का पानी छिड़क दो जर्मनी की आग परसख़्त हैराँ हूँ कि महफ़िल में तुम्हारी और ये ज़िक्रनौ-ए-इंसानी के मुस्तक़बिल की अब करते हो फ़िक्रजब यहाँ आए थे तुम सौदागरी के वास्तेनौ-इंसानी के मुस्तक़बिल से किया वाक़िफ़ न थेहिन्दियों के जिस्म में क्या रूह-ए-आज़ादी न थीसच बताओ क्या वो इंसानों की आबादी न थीअपने ज़ुल्म-ए-बे-निहायत का फ़साना याद हैकंपनी का फिर वो दौर-ए-मुजरिमाना याद हैलूटते फिरते थे जब तुम कारवाँ-दर-कारवाँसर-बरहना फिर रही थी दौलत-ए-हिन्दोस्ताँदस्त-कारों के अंगूठे काटते फिरते थे तुमसर्द लाशों से गढों को पाटते फिरते थे तुमसनअत-ए-हिन्दोस्ताँ पर मौत थी छाई हुईमौत भी कैसी तुम्हारे हात की लाई हुईअल्लाह अल्लाह किस क़दर इंसाफ़ के तालिब हो आजमीर-जाफ़र की क़सम क्या दुश्मन-ए-हक़ था 'सिराज'क्या अवध की बेगमों का भी सताना याद हैयाद है झाँसी की रानी का ज़माना याद हैहिजरत-ए-सुल्तान-ए-देहली का समाँ भी याद हैशेर-दिल 'टीपू' की ख़ूनीं दास्ताँ भी याद हैतीसरे फ़ाक़े में इक गिरते हुए को थामनेकस के तुम लाए थे सर शाह-ए-ज़फ़र के सामनेयाद तो होगी वो मटिया-बुर्ज की भी दास्ताँअब भी जिस की ख़ाक से उठता है रह रह कर धुआँतुम ने क़ैसर-बाग़ को देखा तो होगा बारहाआज भी आती है जिस से हाए 'अख़्तर' की सदासच कहो क्या हाफ़िज़े में है वो ज़ुल्म-ए-बे-पनाहआज तक रंगून में इक क़ब्र है जिस की गवाहज़ेहन में होगा ये ताज़ा हिन्दियों का दाग़ भीयाद तो होगा तुम्हें जलियानवाला-बाग़ भीपूछ लो इस से तुम्हारा नाम क्यूँ ताबिंदा है'डायर'-ए-गुर्ग-ए-दहन-आलूद अब भी ज़िंदा हैवो 'भगत-सिंह' अब भी जिस के ग़म में दिल नाशाद हैउस की गर्दन में जो डाला था वो फंदा याद हैअहल-ए-आज़ादी रहा करते थे किस हंजार सेपूछ लो ये क़ैद-ख़ानों के दर-ओ-दीवार सेअब भी है महफ़ूज़ जिस पर तनतना सरकार काआज भी गूँजी हुई है जिन में कोड़ों की सदाआज कश्ती अम्न के अमवाज पर खेते हो क्यूँसख़्त हैराँ हूँ कि अब तुम दर्स-ए-हक़ देते हो क्यूँअहल-ए-क़ुव्वत दाम-ए-हक़ में तो कभी आते नहीं''बैंकी'' अख़्लाक़ को ख़तरे में भी लाते नहींलेकिन आज अख़्लाक़ की तल्क़ीन फ़रमाते हो तुमहो न हो अपने में अब क़ुव्वत नहीं पाते हो तुमअहल-ए-हक़ रोशन-नज़र हैं अहल-ए-बातिन कोर हैंये तो हैं अक़वाल उन क़ौमों के जो कमज़ोर हैंआज शायद मंज़िल-ए-क़ुव्वत में तुम रहते नहींजिस की लाठी उस की भैंस अब किस लिए कहते नहींक्या कहा इंसाफ़ है इंसाँ का फ़र्ज़-ए-अव्वलींक्या फ़साद-ओ-ज़ुल्म का अब तुम में कस बाक़ी नहींदेर से बैठे हो नख़्ल-ए-रास्ती की छाँव मेंक्या ख़ुदा-ना-कर्दा कुछ मोच आ गई है पाँव मेंगूँज टापों की न आबादी न वीराने में हैख़ैर तो है अस्प-ए-ताज़ी क्या शिफ़ा-ख़ाने में हैआज कल तो हर नज़र में रहम का अंदाज़ हैकुछ तबीअत क्या नसीब-ए-दुश्मनाँ ना-साज़ हैसाँस क्या उखड़ी कि हक़ के नाम पर मरने लगेनौ-ए-इंसाँ की हवा-ख़्वाही का दम भरने लगेज़ुल्म भूले रागनी इंसाफ़ की गाने लगेलग गई है आग क्या घर में कि चिल्लाने लगेमुजरिमों के वास्ते ज़ेबा नहीं ये शोर-ओ-शैनकल 'यज़ीद' ओ 'शिम्र' थे और आज बनते हो 'हुसैन'ख़ैर ऐ सौदागरो अब है तो बस इस बात मेंवक़्त के फ़रमान के आगे झुका दो गर्दनेंइक कहानी वक़्त लिक्खेगा नए मज़मून कीजिस की सुर्ख़ी को ज़रूरत है तुम्हारे ख़ून कीवक़्त का फ़रमान अपना रुख़ बदल सकता नहींमौत टल सकती है अब फ़रमान टल सकता नहीं
होगा भला तुम्हारा सुन लो 'ज़फ़र' की बातेंखेलो ज़रूर लेकिन पढ़ने में दिल लगाना
नाक़ूस से ग़रज़ है न मतलब अज़ाँ से हैमुझ को अगर है इश्क़ तो हिन्दोस्ताँ से हैतहज़ीब-ए-हिन्द का नहीं चश्मा अगर अज़लये मौज-ए-रंग-रंग फिर आई कहाँ से हैज़र्रे में गर तड़प है तो इस अर्ज़-ए-पाक सेसूरज में रौशनी है तो इस आसमाँ से हैहै इस के दम से गर्मी-ए-हंगामा-ए-जहाँमग़रिब की सारी रौनक़ इसी इक दुकाँ से है
समझता है इसे सारा ज़मानाकिताबें इल्म-ओ-हिकमत का ख़ज़ानादिलों का नूर हैं अच्छी किताबेंचराग़-ए-तूर हैं अच्छी किताबेंहमारी मूनिस ओ ग़म-ख़्वार हैं येजिहाद-ए-इल्म की ललकार हैं येकिताबें क्या हैं रूहानी ख़ुदा हैंसकूँ दिल का दवाओं की दवा हैंहमारी क्यूँ न हो मंज़िल किताबेंरसूलों पर हुईं नाज़िल किताबेंकिताबों से है जिस की आश्नाईबड़ी दौलत जहाँ में उस ने पाईकिताबें कामयाबी का हैं ज़ीनारखें आबाद ये दिल का मदीनाकिताबों की रिफ़ाक़त भी अजब हैतअल्लुक़ तोड़ना इन से ग़ज़ब हैसदाक़त का यही रस्ता दिखाएँबुरों को भी यही अच्छा बनाएँसिखाती हैं ये जीने का तरीक़ाबताती हैं हमें क्या है सलीक़ाकिसी ने मुँह किताबों से जो फेरायक़ीनन उस को ज़िल्लत ने है घेराकिताबों से अगर ख़ाली मकाँ हैवो है भूतों का मस्कन घर कहाँ हैकिताबों से हलावत गुफ़्तुगू मेंशराफ़त का असर बाक़ी लहू मेंकिताबों से जहाँ में नाम ज़िंदाहमारी सुब्ह ज़िंदा शाम ज़िंदाकिताबों से सदा रिश्ता बढ़ाओइसी में ज़िंदगी अपनी लगाओ
आज का दिन ये इल्म-ओ-हुनर का फ़िक्र-ओ-अमल की फ़त्ह-ओ-ज़फ़र काआज शिकस्त-ए-ज़ुल्मत-ए-शब है आज फ़रोग़-ए-नूर का दिन है
बारहा देखा है तू ने आसमाँ का इंक़लाबखोल आँख और देख अब हिन्दोस्ताँ का इंक़लाबमग़रिब ओ मशरिक़ नज़र आने लगे ज़ेर-ओ-ज़बरइंक़लाब-ए-हिन्द है सारे जहाँ का इंक़लाबकर रहा है क़स्र-आज़ादी की बुनियाद उस्तुवारफ़ितरत-ए-तिफ़्ल-ओ-ज़न-ओ-पीर-ओ-जवाँ का इंक़लाबसब्र वाले छा रहे हैं जब्र की अक़्लीम परहो गया फ़र्सूदा शमशीर-ओ-सिनाँ का इंक़लाब
जहाँ में हर तरफ़ है इल्म ही की गर्म-बाज़ारीज़मीं से आसमाँ तक बस इसी का फ़ैज़ है जारीयही सरचश्मा-ए-असली है तहज़ीब-ओ-तमद्दुन काबग़ैर इस के बशर होना भी है इक सख़्त बीमारीबनाता है यही इंसान को कामिल-तरीन इंसाँसिखाता है यही अख़्लाक़ ओ ईसार ओ रवा-दारीयही क़ौमों को पहुँचाता है बाम-ए-औज-ओ-रिफ़अत परयही मुल्कों के अंदर फूँकता है रूह-ए-बेदारीइसी के नाम का चलता है सिक्का सारे आलम मेंइसी के सर पे रहता है हमेशा ताज-ए-सरदारीइसी के सब करिश्मे ये नज़र आते हैं दुनिया मेंइसी के दम से रौनक़ आलम-ए-इम्काँ की है सारीये ला-सिलकी, ये टेलीफ़ोन ये रेलें, ये तय्यारेये ज़ेर-ए-आब ओ बाला-ए-फ़लक इंसाँ की तर्रारीहुदूद-ए-इस्तवा क़ुतबैन से यूँ हो गए मुदग़मकि है अब रुबअ मस्कों जैसे घर की चार-दीवारीसमुंदर हो गए पायाब सहरा बिन गए गुलशनकिया साइंस ने भी ए'तराफ़-ए-इज्ज़-ओ-नाचारीबुख़ार ओ बर्क़ का जर्रार लश्कर है अब आमादाउगलवा ले ज़मीन ओ आसमाँ की दौलतें सारीग़रज़ चारों तरफ़ अब इल्म ही की बादशाही हैकि उस के बाज़ूओं में क़ुव्वत-ए-दस्त-ए-इलाही हैनिगाह-ए-ग़ौर से देखो अगर हालात-ए-इंसानीतो हो सकता है हल ये उक़्दा-ए-मुश्किल ब-आसानीवही क़ौमें तरक़्क़ी के मदारिज पर हैं फाएक़-तरकि है जिन में तमद्दुन और सियासत की फ़रावानीइसी के ज़ोम में है जर्मनी चर्ख़-ए-तफ़ाख़ुर परइसी के ज़ोर पर मिर्रीख़ का हम-सर है जापानीइसी की क़ुव्वत-ए-बाज़ू पे है मग़रूर अमरीकाइसी के बिल पर लड़की हो रही है रुस्तम-ए-सानीइशारे पर इसी के नक़्ल-ओ-हरकत है सब इटली कीइसी के ताबा-ए-फ़रमान हैं रूसी ओ ईरानीइसी के जुम्बिश-ए-अबरू पे है इंग्लैण्ड का ग़र्राइसी के हैं सब आवुर्दे फ़्रांसीसी ओ एल्बानीकोई मुल्क अब नहीं जिन में ये जौहर हो न रख़्शंदान ग़ाफ़िल इस से चीनी हैं न शामी हैं न अफ़्ग़ानीबग़ैर इस के जो रहना चाहते हैं इस ज़माने मेंसमझ रक्खें फ़ना उन के लिए है हुक्म-ए-रब्बानीज़माना फेंक देगा ख़ुद उन्हें क़अ'र-ए-हलाकत मेंवो अपने हाथ से होंगे ख़ुद अपनी क़ब्र के बानीज़माने में जिसे हो साहिब-ए-फ़तह-ओ-ज़फ़र होनाज़रूरी है उसे इल्म-ओ-हुनर से बहरा-वर होनातरक़्क़ी की खुली हैं शाहराहें दहर में हर सूनज़र आता है तहज़ीब-ओ-तमद्दुन से जहाँ ममलूचले जाते हैं उड़ते शहसवारान-ए-फ़लक-पैमाख़िराज-ए-तहनियत लेते हुए करते हुए जादूगुज़रते जा रहे हैं दूसरों को छोड़ते पीछेकभी होता है सहरा मुस्तक़र उन का कभी टापूकमर बाँधे हुए दिन रात चलने पर हैं आमादादिमाग़ अफ़्कार से और दिल वुफ़ूर-ए-शौक़ से मलूलअलग रह कर ख़याल-ए-ज़हमत ओ एहसास-ए-राहत सेलगे हैं अपनी अपनी फ़िक्र में बा-ख़ातिर-ए-यकसूमगर हम हैं कि असलन हिस नहीं हम को कोई इस कीहमारे पा-ए-हिम्मत इन मराहिल में हैं बे-क़ाबूजहाँ पहला क़दम रक्खा था रोज़-ए-अव्वलीं हम नेनहीं सरके इस अपने असली मरकज़ से ब-क़द्र-ए-मूये हालत है कि हम पर बंद है हर एक दरवाज़ानज़र आता नहीं हरगिज़ कोई उम्मीद का पहलूमगर वा-हसरता फिर भी हम अपने ज़ोम-ए-बातिल मेंसमझते हैं ज़माने भर से आगे ख़ुद को मंज़िल मेंज़रूरत है कि हम में रौशनी हो इल्म की पैदानज़र आए हमें भी ताकि अस्ल-ए-हालत-ए-दुनियाहमें मालूम हो हालात अब क्या हैं ज़माने केहमारे साथ का जो क़ाफ़िला था वो कहाँ पहुँचाजो पस्ती में थे अब वो जल्वा-गर हैं बाम-ए-रिफ़अत परजो बालक बे-निशाँ थे आज है इन का अलम बरपाहमारी ख़ूबियाँ सब दूसरों ने छीन लीं हम सेज़माने ने हमें इतना झिंझोड़ा कर दिया नंगारवा-दारी, उख़ुव्वत, दोस्ती, ईसार, हमदर्दीख़्याल-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत, दर्द-ए-क़ौम, अंदेशा-ए-फ़र्दाये सब जौहर हमारे थे कभी ऐ वाए-महरूमीबने हैं ख़ूबी-ए-क़िस्मत से जो अब ग़ैर का हिस्साअगर हो जाएँ राग़िब अब भी हम तालीम की जानिबतो कर सकते हैं अब भी मुल्क में हम ज़िंदगी पैदाबहुत कुछ वक़्त हम ने खो दिया है लेकिन इस पर भीअगर चाहें तो कर दें पेश-रौ को अपने हम पसपानिकम्मा कर दिया है काहिली ने गो हमें लेकिनरगों में है हमारी ख़ून अभी तक दौड़ता फिरताकोई मख़्फ़ी हरारत गर हमारे दिल को गरमा देहमारे जिस्म में फिर ज़िंदगी की रूह दौड़ा देवतन वालो बहुत ग़ाफ़िल रहे अब होश में आओउठो बे-दार हो अक़्ल-ओ-ख़िरद को काम में लाओतुम्हारे क़ौम के बच्चों में है तालीम का फ़ुक़्दाँये गुत्थी सख़्त पेचीदा है इस को जल्द सुलझाओयही बच्चे बिल-आख़िर तुम सभों के जा-नशीं होंगेतुम अपने सामने जैसा उन्हें चाहो बना जाओबहुत ही रंज-दह हो जाएगी उस वक़्त की ग़फ़लतकहीं ऐसा न हो मौक़ा निकल जाने पे पछताओये है कार-ए-अहम दो चार इस को कर नहीं सकतेख़ुदा-रा तुम भी अपने फ़र्ज़ का एहसास फ़रमाओये बोझ ऐसा नहीं जिस को उठा लें चार छे मिल करसहारा दो, सहारा दूसरों से इस में दिलवाओजो ज़ी-एहसास हैं हासिल करो तुम ख़िदमतें उन कीजो ज़ी-परवा हैं उन को जिस तरह हो उस तरफ़ लाओग़रज़ जैसे भी हो जिस शक्ल से भी हो ये लाज़िम हैतुम अपने क़ौम के बच्चों को अब तालीम दिलवाओअगर तुम मुस्तइ'द्दी को बना लोगे शिआर अपनायक़ीं जानो कि मुस्तक़बिल है बेहद शानदार अपनाख़ुदावंदा! दुआओं में हमारी हो असर पैदाशब-ए-ग़फ़लत हमारी फिर करे नूर-ए-सहर पैदाहमारे सारे ख़्वाबीदा क़वा बे-दार हो जाएँसर-ए-नौ हो फिर इन में ज़िंदगी की कर्र-ओ-फ़र्र पैदाहमें एहसास हो हम कौन थे और आज हम क्या हैंकरें माहौल-ए-मुल्की के लिए गहरी नज़र पैदामिला रक्खा है अपने जौहर-ए-कामिल को मिट्टी मेंहम अब भी ख़ाक से कर सकते हैं लाल-ओ-गुहर पैदाअगर चाहें तो हम मुश्किल वतन की दम में हल कर देंहज़ारों सूरतें कर सकते हैं हम कारगर पैदाब-ज़ाहिर गो हम इक तूदा हैं बिल्कुल राख का लेकिनअगर चाहें तो ख़ाकिस्तर से कर दें सौ शरर पैदावतन का नक्बत ओ अफ़्लास खो दें हम इशारे मेंजहाँ ठोकर लगा दें हो वहीं से कान-ए-ज़र पैदाहम इस मंज़िल के आख़िर पर पहुँच कर बिल-यक़ीं दम लेंअगर कुछ ताज़ा-दम हो जाएँ अपने हम-सफ़र पैदाजो कोशिश मुत्तहिद हो कर कहीं इक बार हो जाएयक़ीं है मुल्क की क़िस्मत का बेड़ा पार हो जाए
गोपी-नाथ और ज़फ़र-शाह के जैसे किरदारकितनी गुमनामी में जी लेते हैं मर जाते हैंकिस ने उन आँखों में वो ख़्वाब लहकते देखेजो इस इंसानों के जंगल में बिखर जाते हैंकिस का आईना है मोज़ेल की उस रूह का अक्सजिस में मर्यम के हसीं नक़्श निखर जाते हैं
पहुँचता है हर इक मय-कश के आगे दौर-ए-जाम उस काकिसी को तिश्ना-लब रखता नहीं है लुत्फ़-ए-आम उस कागवाही दे रही है उस की यकताई पे ज़ात उस कीदुई के नक़्श सब झूटे हैं सच्चा एक नाम उस काहर इक ज़र्रा फ़ज़ा का दास्तान उस की सुनाता हैहर इक झोंका हवा का आ के देता है पयाम उस कामैं उस को का'बा-ओ-बुत-ख़ाना में क्यूँ ढूँडने निकलूँमिरे टूटे हुए दिल ही के अंदर है क़याम उस कामिरी उफ़्ताद की भी मेरे हक़ में उस की रहमत थीकि गिरते गिरते भी मैं ने लिया दामन है थाम उस कावो ख़ुद भी बे-निशाँ है ज़ख़्म भी हैं बे-निशाँ उस केदिया है इस ने जो चरका नहीं है इल्तियाम उस कान जा उस के तहम्मुल पर कि है अब ढब गिरफ़्त उस कीडर उस की देर-गीरी से कि है सख़्त इंतिक़ाम उस का
मुँह पे तलवार की चढ़ते हैं सिपर की सूरततेग़ के फल को ये खाते हैं समर की सूरतहौसले और बढ़ाती है ख़तर की सूरतमौत में भी नज़र आती है ज़फ़र की सूरतछलनी हो जाता है ज़ख़्मों से अगर तन उन कातेग़ के साया में बन जाता है मदफ़न उन का
ये मौसम है उमंगों का तरंगों का ज़माना हैचमन के फूल हैं हम काम अपना मुस्कुराना हैक़दम जो भी उठाना है तरक़्क़ी का उठाना हैसितारों की तरह इक दिन फ़लक पर जगमगाना हैगले में डाल कर बाँहें ख़ुशी के गीत गाना हैहमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना हैमिले आधी अगर रोटी तो हम उतनी ही खाएँगेमुसीबत जो पड़े सर पर ख़ुशी से झेल जाएँगेजो पढ़ना सीख जाएँगे तो औरों को पढ़ाएँगेजो रस्ते में भटकते हैं उन्हें मंज़िल दिखाएँगेमोहब्बत का दिया हर मोड़ पर हम को जलाना हैहमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना हैनहीं है इल्म से बढ़ कर जहाँ में कोई भी दौलतयही है नूर आँखों का दिलों की है यही राहतये वो शय है लगा सकता नहीं जिस की कोई क़ीमतबग़ैर इस के न मिल पाएगी दुनिया में कोई इज़्ज़तउठो जल्दी अगर ता'लीम का दरिया बहाना हैहमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना हैजहालत का अंधेरा अक़्ल से मा'ज़ूर करता हैजो दिल की आँख है उस को यही बे-नूर करता हैबना देता है ये शैताँ ख़ुदा से दूर करता हैहमें दर दर भटकने के लिए मजबूर करता हैजिसे ता'लीम कहते हैं कि वो हिकमत का ख़ज़ाना हैहमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना है
अब तो इल्म की परवाज़ेंऔर ही क़िस्से कहती हैंबाजी अब तो मत बोलोचाँद में परियाँ रहती हैंचाँद न अपना मामूँ हैऔर न देस वो परियों काचाँद में कोई बुढ़िया हैऔर न बुढ़िया का चरख़ासदियों सदियों खोज के बा'दअब हम ने ये जाना हैचाँद कोई अफ़्साना नहींएक हक़ीक़ी दुनिया हैसर्दी गर्मी दोनों तेज़ऑक्सीजन का नाम नहींचट्टानें हैं खाइयाँ हैंधरती सा आराम नहींहो जाएगा पर इक रोज़जी लेना आसान वहाँअपने जीने का सामाँकर लेगा इंसान वहाँइल्म-ओ-हुनर की धाराएँपीछे को कब बहती हैंबाजी अब तो मत बोलोचाँद में परियाँ रहती हैं
ज़िंदा-बाश ऐ इंक़लाब ऐ शोला-ए-फ़ानूस-ए-हिन्दगर्मियाँ जिस की फ़रोग़-ए-मंक़ल-ए-जाँ हो गईंबस्तियों पर छा रही थीं मौत की ख़ामोशियाँतू ने सूर अपना जो फूँका महशरिस्ताँ हो गईंजितनी बूँदें थीं शहीदान-ए-वतन के ख़ून कीक़स्र-आज़ादी की आराइश का सामाँ हो गईंमर्हबा ऐ नौ-गिरफ़्तारान-ए-बेदाद-ए-फ़रंगजिन की ज़ंजीरें ख़रोश-अफ़ज़ा-ए-ज़िंदाँ हो गईंज़िंदगी उन की है दीन उन का है दुनिया उन की हैजिन की जानें क़ौम की इज़्ज़त पे क़ुर्बां हो गईं
हम को है फ़ख़्र इस पर हम हैं शरीर बच्चेमाहिर हैं अपने फ़न में हम बे-नज़ीर बच्चे
इक यहाँ बादशाह था बच्चोमुल्क का ख़ैर-ख़्वाह था बच्चोसब को भाती थी नेक ख़ू उस कीख़ूब लगती थी गुफ़्तुगू उस कीवो कि शेर-ओ-अदब का माहिर थादर-हक़ीक़त अज़ीम शाइ'र थानाम उस ने अबू ज़फ़र पायाआख़िरी ताजदार कहलायाउस की अज़्मत पे दिल है फ़र्श-ए-राहउस को कहते थे सब बहादुर शाहतख़्त-ए-दिल्ली पे हुक्मराँ था वोमुग़्लिया दौर का निशाँ था वोअहल-ए-हिन्दोस्ताँ का क़ाइद थावो मुहिब्ब-ए-वतन मुजाहिद थारास उस को न तख्त-ए-शाही थावो कि इस बा-वफ़ा सिपाही थाउस के अपने ही एक रिश्ता-दारनंग-ए-हिन्दोस्ताँ हुए ग़द्दारकर के अंग्रेज़ बे-बस-ओ-मजबूरले गए फिर उसे वतन से दूरज़ुल्म अंग्रेज़ का सहा बरसोंक़ैद रंगून में रहा बरसों
जब्र का दौर है आहों में असर पैदा करज़ुल्मत-ए-शब से ही आसार-ए-सहर पैदा करजौर-ए-मग़रिब से न अंदाज़-ए-हज़र पैदा करतख़्त-ए-बातिल जो उलट दें वो बशर पैदा करग़ैर को अपना बना ले वो नज़र पैदा करसंग-रेज़ों से गुहर-पाश गुहर पैदा करइक नज़र देख के तू भाँप ले मक़्सद दिल काचश्म-ए-बीना में तफ़क्कुर का असर पैदा करअपनी दुनिया तुझे दुनिया से बनानी है अलगआसमाँ तारे ज़मीं शम्स-ओ-क़मर पैदा करहै तिरा ख़्वाब-ए-गिराँ दूरी-ए-मंज़िल का सबबख़िज़्र हमदर्द है उठ अज़्म-ए-सफ़र पैदा करक्यों ज़माने के ख़म-ओ-पेच में उलझा है तूदिल में एहसास-ए-तबाही-ओ-ज़रर पैदा करग़म-ए-शमशीर है क्या दस्त-तही उठ नादाँतू बहादुर है तो बे तेग़ ज़फ़र पैदा करआरज़ू जिस की तुझे है वो निहाँ है तुझ मेंदेखना हो तो सदाक़त की नज़र पैदा करक़ुव्वतें अर्ज़-ओ-समा की हैं तिरी फ़ितरत मेंशाख़-ए-उम्मीद पे मक़्सद का समर पैदा करअपने ईसार का ले संग-दिलों से बदलाबात तो जब है कि पत्थर से गुहर पैदा करक्यों है मायूसी-ए-पैहम से तिरा दिल मायूसबे-ख़बर अपनी दुआओं में असर पैदा करक़ैद ख़ुर्शीद-ए-फ़लक-ताब की किरनें कर लेमुस्तक़िल अपनी शब-ए-ग़म में सहर पैदा करजिंस-ए-उल्फ़त की जो दरकार ख़रीदारी हैमीठा मीठा सा ज़रा दर्द-ए-जिगर पैदा करअज़्म-ए-रासिख़ हो उलुल-अज़्म हो पहले ग़ाफ़िलफिर अगर चाहे तो पत्थर से शरर पैदा करहै तसर्रुफ़ में तिरे दहर की हर चीज़ 'रज़ी'उठ और उठ कर इन्हीं ज़र्रों से क़मर पैदा कर
आओ बच्चो सैर कराएँभारत का दिल तुम को दिखाएँभारत का दिल क्या है बोलोदुनिया देखो आँखें खोलोहर लब पर है जिस का फ़सानादेहली है वो शहर पुरानाशहर कि जिस में 'मीर' ने गाएरंज-ओ-ख़ुशी के दिलकश नग़्मेशहर कि जिस में 'ग़ालिब' ने भीछेड़ीं शीरीं ग़ज़लें अपनीशहर कि जिस में शाह 'ज़फ़र' नेग़ज़लें लिक्खीं लिक्खे नौहेदेहली जो है शहर पुरानाबच्चो वो है दिल भारत कावो सँभला तो हम भी सँभलेवो बिगड़ा तो हम भी बिगड़ेशहर नहीं तहज़ीब है देहलीशान-ए-वतन है इस से बाक़ीआओ इस का रूप दिखाएँबच्चो तुम को सैर कराएँलाल क़िलअ' है सामने देखोमुग़लों की तारीख़ को समझोमाज़ी की तस्वीर है इस मेंख़्वाबों की ता'बीर है इस मेंवक़्त का इक आईना समझोशाम-ओ-सहर का रूप भी देखोअकबर की तलवार यहाँ हैनूर-जहाँ का हार यहाँ हैआलमगीर की मस्जिद देखोफ़न का नमूना उस को जानोदुनिया में इक जन्नत है येअपने वतन की दौलत है येलाल क़िलए' से बाहर आओमस्जिद है इक सामने देखोहै ये निशानी शाह-जहाँ कीदिल का सुकूँ दौलत है यहाँ कीआओ चलें अब बिरला मंदिरबस्ती देखें प्रेम की जा करये है देखो जंतर-मंतरदेख के इस को अक़्ल है शश्दरचाहो तुम तो वक़्त बताएग्रहन का भी रूप दिखाएसद्र का ऐवाँ है ये देखोएक गुलिस्ताँ है ये देखोबाग़-ए-मुग़ल है इस के अंदरअपना गुज़र है इस से बाहरये है समाधी गाँधी जी कीदूर नहीं है शांती-वन भीरूह-ए-चमन ख़ामोश यहाँ हैख़ाक-ए-वतन गुल-पोश यहाँ हैबच्चो चलें अब मेहरौली भीदेख आएँ हम लाट क़ुतुब कीउस के चारों और खंडर हैंपहले वक़्तों के ये नगर हैंअम्बर इस से अपनी ज़मीं हैहम को भी कम फ़ख़्र नहीं हैमाना देहली देख ली तुम नेसैर भी कर ली काफ़ी तुम नेमिल लो खिलौने से भी चल करसामने है वो उस का दफ़्तरभाई जो इल्यास हैं अपनेकर लो तुम सब दर्शन उन केयूँ तो चीज़ें और हैं लेकिनदेखना उन का कब है मुमकिनबच्चो तुम तो थक भी गए होवक़्त भी कम है अब घर लौटो
वज़ीर-चंद ने पूछा ज़फ़र-अली-ख़ाँ सेश्री-कृष्ण से क्या तुम को भी इरादत हैकहा ये उस ने वो थे अपने वक़्त के हादीइसी लिए अदब उन का मिरी सआ'दत हैफ़साद से उन्हें नफ़रत थी जो है मुझ को भीऔर उस पे दे रही फ़ितरत मिरी शहादत हैहै इस वतन में इक ऐसा गिरोह भी मौजूदश्री-कृष्ण की जो कर रहा इबादत हैमगर फ़साद है उस की सरिश्त में दाख़िलबिचारे क्या करें पड़ ही चुकी ये आदत है
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