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नज़्म
अंधेरा हर तरफ़ छाया हुआ है
अंधेरा ही अज़ल है और अंधेरा ही अबद की जोत है शायद
ज़किया सुल्ताना नय्यर
नज़्म
हमेशा से बपा इक जंग है हम उस में क़ाएम हैं
हमारी जंग ख़ैर ओ शर के बिस्तर की है ज़ाईदा