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नज़्म
ये ज़ेहन में बनती और बिगड़ती हुई फ़ज़ाएँ
वो फ़िक्र में आए ज़लज़ले हों कि दिल की हलचल
जावेद अख़्तर
नज़्म
ज़लज़ले हैं बिजलियाँ हैं क़हत हैं आलाम हैं
कैसी कैसी दुख़्तरान-ए-मादर-ए-अय्याम हैं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
वो ज़लज़ले कि पहाड़ों के पैर उखड़ जाएँ
बुलूग़ियत की वो टीसें वो कर्ब-ए-नश्व-ओ-नुमा
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
जोश मलीहाबादी
नज़्म
चपेटें जिन की सरकशों की गर्दनें मरोड़ दें
अभी तो सीना-ए-बशर में सोते हैं वो ज़लज़ले
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
बिजलियाँ जिस की कनीज़ें ज़लज़ले जिस के सफ़ीर
जिस का दिल ख़ैबर-शिकन जिस की नज़र अर्जुन का तीर
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
ये ज़लज़ले ये आँधियाँ ये बर्क़ ओ आतिश ओ शरर मिरे मिज़ाज ही सही
मगर सुकून पा के जब भी शादमाँ हुआ हूँ
कमाल अहमद सिद्दीक़ी
नज़्म
मोहम्मद हनीफ़ रामे
नज़्म
ज़लज़ले तुम से हैं वाबस्ता तुम्हें क्या मालूम
आज हलचल सी मची है दिल-ए-सौदाई में