aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "zamaa.n"
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमाराहम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमाराग़ुर्बत में हों अगर हम रहता है दिल वतन मेंसमझो वहीं हमें भी दिल हो जहाँ हमारापर्बत वो सब से ऊँचा हम-साया आसमाँ कावो संतरी हमारा वो पासबाँ हमारागोदी में खेलती हैं इस की हज़ारों नदियाँगुलशन है जिन के दम से रश्क-ए-जिनाँ हमाराऐ आब-रूद-ए-गंगा वो दिन है याद तुझ कोउतरा तिरे किनारे जब कारवाँ हमारामज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखनाहिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारायूनान ओ मिस्र ओ रूमा सब मिट गए जहाँ सेअब तक मगर है बाक़ी नाम-ओ-निशाँ हमाराकुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारीसदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा'इक़बाल' कोई महरम अपना नहीं जहाँ मेंमालूम क्या किसी को दर्द-ए-निहाँ हमारा
ख़ुदी का सिर्र-ए-निहाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाहख़ुदी है तेग़ फ़साँ ला-इलाहा-इल्लल्लाहये दौर अपने बराहीम की तलाश में हैसनम-कदा है जहाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाहकिया है तू ने मता-ए-ग़ुरूर का सौदाफ़रेब-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाहये माल-ओ-दौलत-ए-दुनिया ये रिश्ता ओ पैवंदबुतान-ए-वहम-ओ-गुमाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाहख़िरद हुई है ज़मान ओ मकाँ की ज़ुन्नारीन है ज़माँ न मकाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाहये नग़्मा फ़स्ल-ए-गुल-ओ-लाला का नहीं पाबंदबहार हो कि ख़िज़ाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाहअगरचे बुत हैं जमाअत की आस्तीनों मेंमुझे है हुक्म-ए-अज़ाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाह
हुआ ख़ेमा-ज़न कारवान-ए-बहारइरम बन गया दामन-ए-कोह-सारगुल ओ नर्गिस ओ सोसन ओ नस्तरनशहीद-ए-अज़ल लाला-ख़ूनीं कफ़नजहाँ छुप गया पर्दा-ए-रंग मेंलहू की है गर्दिश रग-ए-संग मेंफ़ज़ा नीली नीली हवा में सुरूरठहरते नहीं आशियाँ में तुयूरवो जू-ए-कोहिस्ताँ उचकती हुईअटकती लचकती सरकती हुईउछलती फिसलती सँभलती हुईबड़े पेच खा कर निकलती हुईरुके जब तो सिल चीर देती है येपहाड़ों के दिल चीर देती है येज़रा देख ऐ साक़ी-ए-लाला-फ़ामसुनाती है ये ज़िंदगी का पयामपिला दे मुझे वो मय-ए-पर्दा-सोज़कि आती नहीं फ़स्ल-ए-गुल रोज़ रोज़वो मय जिस से रौशन ज़मीर-ए-हयातवो मय जिस से है मस्ती-ए-काएनातवो मय जिस में है सोज़-ओ-साज़-ए-अज़लवो मय जिस से खुलता है राज़-ए-अज़लउठा साक़िया पर्दा इस राज़ सेलड़ा दे ममूले को शहबाज़ सेज़माने के अंदाज़ बदले गएनया राग है साज़ बदले गएहुआ इस तरह फ़ाश राज़-ए-फ़रंगकि हैरत में है शीशा-बाज़-ए-फ़रंगपुरानी सियासत-गरी ख़्वार हैज़मीं मीर ओ सुल्ताँ से बे-ज़ार हैगया दौर-ए-सरमाया-दारी गयातमाशा दिखा कर मदारी गयागिराँ ख़्वाब चीनी सँभलने लगेहिमाला के चश्मे उबलने लगेदिल-ए-तूर-ए-सीना-ओ-फ़ारान दो-नीमतजल्ली का फिर मुंतज़िर है कलीममुसलमाँ है तौहीद में गरम-जोशमगर दिल अभी तक है ज़ुन्नार-पोशतमद्दुन तसव्वुफ़ शरीअत-ए-कलामबुतान-ए-अजम के पुजारी तमामहक़ीक़त ख़ुराफ़ात में खो गईये उम्मत रिवायात में खो गईलुभाता है दिल को कलाम-ए-ख़तीबमगर लज़्ज़त-ए-शौक़ से बे-नसीबबयाँ इस का मंतिक़ से सुलझा हुआलुग़त के बखेड़ों में उलझा हुआवो सूफ़ी कि था ख़िदमत-ए-हक़ में मर्दमोहब्बत में यकता हमीयत में फ़र्दअजम के ख़यालात में खो गयाये सालिक मक़ामात में खो गयाबुझी इश्क़ की आग अंधेर हैमुसलमाँ नहीं राख का ढेर हैशराब-ए-कुहन फिर पिला साक़ियावही जाम गर्दिश में ला साक़ियामुझे इश्क़ के पर लगा कर उड़ामिरी ख़ाक जुगनू बना कर उड़ाख़िरद को ग़ुलामी से आज़ाद करजवानों को पीरों का उस्ताद करहरी शाख़-ए-मिल्लत तिरे नम से हैनफ़स इस बदन में तिरे दम से हैतड़पने फड़कने की तौफ़ीक़ देदिल-ए-मुर्तज़ा सोज़-ए-सिद्दीक़ देजिगर से वही तीर फिर पार करतमन्ना को सीनों में बेदार करतिरे आसमानों के तारों की ख़ैरज़मीनों के शब ज़िंदा-दारों की ख़ैरजवानों को सोज़-ए-जिगर बख़्श देमिरा इश्क़ मेरी नज़र बख़्श देमिरी नाव गिर्दाब से पार करये साबित है तो इस को सय्यार करबता मुझ को असरार-ए-मर्ग-ओ-हयातकि तेरी निगाहों में है काएनातमिरे दीदा-ए-तर की बे-ख़्वाबियाँमिरे दिल की पोशीदा बेताबियाँमिरे नाला-ए-नीम-शब का नियाज़मिरी ख़ल्वत ओ अंजुमन का गुदाज़उमंगें मिरी आरज़ूएँ मिरीउम्मीदें मिरी जुस्तुजुएँ मिरीमिरी फ़ितरत आईना-ए-रोज़गारग़ज़ालान-ए-अफ़्कार का मुर्ग़-ज़ारमिरा दिल मिरी रज़्म-गाह-ए-हयातगुमानों के लश्कर यक़ीं का सबातयही कुछ है साक़ी मता-ए-फ़क़ीरइसी से फ़क़ीरी में हूँ मैं अमीरमिरे क़ाफ़िले में लुटा दे इसेलुटा दे ठिकाने लगा दे इसेदमा-दम रवाँ है यम-ए-ज़िंदगीहर इक शय से पैदा रम-ए-ज़िंदगीइसी से हुई है बदन की नुमूदकि शो'ले में पोशीदा है मौज-ए-दूदगिराँ गरचे है सोहबत-ए-आब-ओ-गिलख़ुश आई इसे मेहनत-ए-आब-ओ-गिलये साबित भी है और सय्यार भीअनासिर के फंदों से बे-ज़ार भीये वहदत है कसरत में हर दम असीरमगर हर कहीं बे-चुगों बे-नज़ीरये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-शश-जिहातइसी ने तराशा है ये सोमनातपसंद इस को तकरार की ख़ू नहींकि तू मैं नहीं और मैं तू नहींमन ओ तू से है अंजुमन-आफ़रींमगर ऐन-ए-महफ़िल में ख़ल्वत-नशींचमक उस की बिजली में तारे में हैये चाँदी में सोने में पारे में हैउसी के बयाबाँ उसी के बबूलउसी के हैं काँटे उसी के हैं फूलकहीं उस की ताक़त से कोहसार चूरकहीं उस के फंदे में जिब्रील ओ हूरकहीं जज़ा है शाहीन सीमाब रंगलहू से चकोरों के आलूदा चंगकबूतर कहीं आशियाने से दूरफड़कता हुआ जाल में ना-सुबूरफ़रेब-ए-नज़र है सुकून ओ सबाततड़पता है हर ज़र्रा-ए-काएनातठहरता नहीं कारवान-ए-वजूदकि हर लहज़ है ताज़ा शान-ए-वजूदसमझता है तू राज़ है ज़िंदगीफ़क़त ज़ौक़-ए-परवाज़ है ज़िंदगीबहुत उस ने देखे हैं पस्त ओ बुलंदसफ़र उस को मंज़िल से बढ़ कर पसंदसफ़र ज़िंदगी के लिए बर्ग ओ साज़सफ़र है हक़ीक़त हज़र है मजाज़उलझ कर सुलझने में लज़्ज़त उसेतड़पने फड़कने में राहत उसेहुआ जब उसे सामना मौत काकठिन था बड़ा थामना मौत काउतर कर जहान-ए-मकाफ़ात मेंरही ज़िंदगी मौत की घात मेंमज़ाक़-ए-दुई से बनी ज़ौज ज़ौजउठी दश्त ओ कोहसार से फ़ौज फ़ौजगुल इस शाख़ से टूटते भी रहेइसी शाख़ से फूटते भी रहेसमझते हैं नादाँ उसे बे-सबातउभरता है मिट मिट के नक़्श-ए-हयातबड़ी तेज़ जौलाँ बड़ी ज़ूद-रसअज़ल से अबद तक रम-ए-यक-नफ़सज़माना कि ज़ंजीर-ए-अय्याम हैदमों के उलट-फेर का नाम हैये मौज-ए-नफ़स क्या है तलवार हैख़ुदी क्या है तलवार की धार हैख़ुदी क्या है राज़-दरून-हयातख़ुदी क्या है बेदारी-ए-काएनातख़ुदी जल्वा बदमस्त ओ ख़ल्वत-पसंदसमुंदर है इक बूँद पानी में बंदअँधेरे उजाले में है ताबनाकमन ओ तू में पैदा मन ओ तू से पाकअज़ल उस के पीछे अबद सामनेन हद उस के पीछे न हद सामनेज़माने के दरिया में बहती हुईसितम उस की मौजों के सहती हुईतजस्सुस की राहें बदलती हुईदमा-दम निगाहें बदलती हुईसुबुक उस के हाथों में संग-ए-गिराँपहाड़ उस की ज़र्बों से रेग-ए-रवाँसफ़र उस का अंजाम ओ आग़ाज़ हैयही उस की तक़्वीम का राज़ हैकिरन चाँद में है शरर संग मेंये बे-रंग है डूब कर रंग मेंइसे वास्ता क्या कम-ओ-बेश सेनशेब ओ फ़राज़ ओ पस-ओ-पेश सेअज़ल से है ये कशमकश में असीरहुई ख़ाक-ए-आदम में सूरत-पज़ीरख़ुदी का नशेमन तिरे दिल में हैफ़लक जिस तरह आँख के तिल में हैख़ुदी के निगहबाँ को है ज़हर-नाबवो नाँ जिस से जाती रहे उस की आबवही नाँ है उस के लिए अर्जुमंदरहे जिस से दुनिया में गर्दन बुलंदख़ुदी फ़ाल-ए-महमूद से दरगुज़रख़ुदी पर निगह रख अयाज़ी न करवही सज्दा है लाइक़-ए-एहतिमामकि हो जिस से हर सज्दा तुझ पर हरामये आलम ये हंगामा-ए-रंग-ओ-सौतये आलम कि है ज़ेर-ए-फ़रमान-ए-मौतये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-चश्म-ओ-गोशजहाँ ज़िंदगी है फ़क़त ख़ुर्द ओ नोशख़ुदी की ये है मंज़िल-ए-अव्वलींमुसाफ़िर ये तेरा नशेमन नहींतिरी आग इस ख़ाक-दाँ से नहींजहाँ तुझ से है तू जहाँ से नहींबढ़े जा ये कोह-ए-गिराँ तोड़ करतिलिस्म-ए-ज़मान-ओ-मकाँ तोड़ करख़ुदी शेर-ए-मौला जहाँ उस का सैदज़मीं उस की सैद आसमाँ उस का सैदजहाँ और भी हैं अभी बे-नुमूदकि ख़ाली नहीं है ज़मीर-ए-वजूदहर इक मुंतज़िर तेरी यलग़ार कातिरी शौख़ी-ए-फ़िक्र-ओ-किरदार काये है मक़्सद गर्दिश-ए-रोज़गारकि तेरी ख़ुदी तुझ पे हो आश्कारतू है फ़ातह-ए-आलम-ए-ख़ूब-ओ-ज़िश्ततुझे क्या बताऊँ तिरी सरनविश्तहक़ीक़त पे है जामा-ए-हर्फ़-ए-तंगहक़ीक़त है आईना-ए-गुफ़्तार-ए-ज़ंगफ़रोज़ाँ है सीने में शम-ए-नफ़समगर ताब-ए-गुफ़्तार रखती है बसअगर यक-सर-ए-मू-ए-बरतर परमफ़रोग़-ए-तजल्ली ब-सोज़द परम
सिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब नक़्श-गर-ए-हादसातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब अस्ल-ए-हयात-ओ-ममातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब तार-ए-हरीर-ए-दो-रंगजिस से बनाती है ज़ात अपनी क़बा-ए-सिफ़ातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब साज़-ए-अज़ल की फ़ुग़ाँजिस से दिखाती है ज़ात ज़ेर-ओ-बम-ए-मुम्किनाततुझ को परखता है ये मुझ को परखता है येसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब सैरफ़ी-ए-काएनाततू हो अगर कम अयार मैं हूँ अगर कम अयारमौत है तेरी बरात मौत है मेरी बराततेरे शब-ओ-रोज़ की और हक़ीक़त है क्याएक ज़माने की रौ जिस में न दिन है न रातआनी-ओ-फ़ानी तमाम मोजज़ा-हा-ए-हुनरकार-ए-जहाँ बे-सबात कार-ए-जहाँ बे-सबातअव्वल ओ आख़िर फ़ना बातिन ओ ज़ाहिर फ़नानक़्श-ए-कुहन हो कि नौ मंज़िल-ए-आख़िर फ़नाहै मगर इस नक़्श में रंग-ए-सबात-ए-दवामजिस को किया हो किसी मर्द-ए-ख़ुदा ने तमाममर्द-ए-ख़ुदा का अमल इश्क़ से साहब फ़रोग़इश्क़ है अस्ल-ए-हयात मौत है उस पर हरामतुंद ओ सुबुक-सैर है गरचे ज़माने की रौइश्क़ ख़ुद इक सैल है सैल को लेता है थामइश्क़ की तक़्वीम में अस्र-ए-रवाँ के सिवाऔर ज़माने भी हैं जिन का नहीं कोई नामइश्क़ दम-ए-जिब्रईल इश्क़ दिल-ए-मुस्तफ़ाइश्क़ ख़ुदा का रसूल इश्क़ ख़ुदा का कलामइश्क़ की मस्ती से है पैकर-ए-गिल ताबनाकइश्क़ है सहबा-ए-ख़ाम इश्क़ है कास-उल-किरामइश्क़ फ़क़ीह-ए-हराम इश्क़ अमीर-ए-जुनूदइश्क़ है इब्नुस-सबील इस के हज़ारों मक़ामइश्क़ के मिज़राब से नग़्मा-ए-तार-ए-हयातइश्क़ से नूर-ए-हयात इश्क़ से नार-ए-हयातऐ हरम-ए-क़ुर्तुबा इश्क़ से तेरा वजूदइश्क़ सरापा दवाम जिस में नहीं रफ़्त ओ बूदरंग हो या ख़िश्त ओ संग चंग हो या हर्फ़ ओ सौतमोजज़ा-ए-फ़न की है ख़ून-ए-जिगर से नुमूदक़तरा-ए-ख़ून-ए-जिगर सिल को बनाता है दिलख़ून-ए-जिगर से सदा सोज़ ओ सुरूर ओ सुरूदतेरी फ़ज़ा दिल-फ़रोज़ मेरी नवा सीना-सोज़तुझ से दिलों का हुज़ूर मुझ से दिलों की कुशूदअर्श-ए-मोअल्ला से कम सीना-ए-आदम नहींगरचे कफ़-ए-ख़ाक की हद है सिपहर-ए-कबूदपैकर-ए-नूरी को है सज्दा मयस्सर तो क्याउस को मयस्सर नहीं सोज़-ओ-गुदाज़-ए-सजूदकाफ़िर-ए-हिन्दी हूँ मैं देख मिरा ज़ौक़ ओ शौक़दिल में सलात ओ दुरूद लब पे सलात ओ दुरूदशौक़ मिरी लय में है शौक़ मिरी नय में हैनग़्मा-ए-अल्लाह-हू मेरे रग-ओ-पय में हैतेरा जलाल ओ जमाल मर्द-ए-ख़ुदा की दलीलवो भी जलील ओ जमील तू भी जलील ओ जमीलतेरी बिना पाएदार तेरे सुतूँ बे-शुमारशाम के सहरा में हो जैसे हुजूम-ए-नुख़ीलतेरे दर-ओ-बाम पर वादी-ए-ऐमन का नूरतेरा मिनार-ए-बुलंद जल्वा-गह-ए-जिब्रीलमिट नहीं सकता कभी मर्द-ए-मुसलमाँ कि हैउस की अज़ानों से फ़ाश सिर्र-ए-कलीम-ओ-ख़लीलउस की ज़मीं बे-हुदूद उस का उफ़ुक़ बे-सग़ूरउस के समुंदर की मौज दजला ओ दनयूब ओ नीलउस के ज़माने अजीब उस के फ़साने ग़रीबअहद-ए-कुहन को दिया उस ने पयाम-ए-रहीलसाक़ी-ए-रबाब-ए-ज़ौक़ फ़ारस-ए-मैदान-ए-शौक़बादा है उस का रहीक़ तेग़ है उस की असीलमर्द-ए-सिपाही है वो उस की ज़िरह ला-इलाहसाया-ए-शमशीर में उस की पनह ला-इलाहतुझ से हुआ आश्कार बंदा-ए-मोमिन का राज़उस के दिनों की तपिश उस की शबों का गुदाज़उस का मक़ाम-ए-बुलंद उस का ख़याल-ए-अज़ीमउस का सुरूर उस का शौक़ उस का नियाज़ उस का नाज़हाथ है अल्लाह का बंदा-ए-मोमिन का हाथग़ालिब ओ कार-आफ़रीं कार-कुशा कारसाज़ख़ाकी ओ नूरी-निहाद बंदा-ए-मौला-सिफ़ातहर दो-जहाँ से ग़नी उस का दिल-ए-बे-नियाज़उस की उमीदें क़लील उस के मक़ासिद जलीलउस की अदा दिल-फ़रेब उस की निगह दिल-नवाज़आज भी इस देस में आम है चश्म-ए-ग़ज़ालऔर निगाहों के तीर आज भी हैं दिल-नशींबू-ए-यमन आज भी उस की हवाओं में हैरंग-ए-हिजाज़ आज भी उस की नवाओं में हैदीदा-ए-अंजुम में है तेरी ज़मीं आसमाँआह कि सदियों से है तेरी फ़ज़ा बे-अज़ाँकौन सी वादी में है कौन सी मंज़िल में हैइश्क़-ए-बला-ख़ेज़ का क़ाफ़िला-ए-सख़्त-जाँदेख चुका अल्मनी शोरिश-ए-इस्लाह-ए-दींजिस ने न छोड़े कहीं नक़्श-ए-कुहन के निशाँहर्फ़-ए-ग़लत बन गई इस्मत-ए-पीर-ए-कुनिश्तऔर हुई फ़िक्र की कश्ती-ए-नाज़ुक रवाँचश्म-ए-फ़िराँसिस भी देख चुकी इंक़लाबजिस से दिगर-गूँ हुआ मग़रबियों का जहाँमिल्लत-ए-रूमी-निज़ाद कोहना-परस्ती से पीरलज़्ज़त-ए-तज्दीदा से वो भी हुई फिर जवाँरूह-ए-मुसलमाँ में है आज वही इज़्तिराबराज़-ए-ख़ुदाई है ये कह नहीं सकती ज़बाँनर्म दम-ए-गुफ़्तुगू गर्म दम-ए-जुस्तुजूरज़्म हो या बज़्म हो पाक-दिल ओ पाक-बाज़नुक़्ता-ए-परकार-ए-हक़ मर्द-ए-ख़ुदा का यक़ींऔर ये आलम तमाम वहम ओ तिलिस्म ओ मजाज़अक़्ल की मंज़िल है वो इश्क़ का हासिल है वोहल्क़ा-ए-आफ़ाक़ में गर्मी-ए-महफ़िल है वोकाबा-ए-अरबाब-ए-फ़न सतवत-ए-दीन-ए-मुबींतुझ से हरम मर्तबत उंदुलुसियों की ज़मींहै तह-ए-गर्दूं अगर हुस्न में तेरी नज़ीरक़ल्ब-ए-मुसलमाँ में है और नहीं है कहींआह वो मरदान-ए-हक़ वो अरबी शहसवारहामिल-ए-ख़ल्क़-ए-अज़ीम साहब-ए-सिद्क-ओ-यक़ींजिन की हुकूमत से है फ़ाश ये रम्ज़-ए-ग़रीबसल्तनत-ए-अहल-ए-दिल फ़क़्र है शाही नहींजिन की निगाहों ने की तर्बियत-ए-शर्क़-ओ-ग़र्बज़ुल्मत-ए-यूरोप में थी जिन की ख़िरद-राह-बींजिन के लहू के तुफ़ैल आज भी हैं उंदुलुसीख़ुश-दिल ओ गर्म-इख़्तिलात सादा ओ रौशन-जबींदेखिए इस बहर की तह से उछलता है क्यागुम्बद-ए-नीलोफ़री रंग बदलता है क्यावादी-ए-कोह-सार में ग़र्क़-ए-शफ़क़ है सहाबलाल-ए-बदख़्शाँ के ढेर छोड़ गया आफ़्ताबसादा ओ पुर-सोज़ है दुख़्तर-ए-दहक़ाँ का गीतकश्ती-ए-दिल के लिए सैल है अहद-ए-शबाबआब-ए-रवान-ए-कबीर तेरे किनारे कोईदेख रहा है किसी और ज़माने का ख़्वाबआलम-ए-नौ है अभी पर्दा-ए-तक़दीर मेंमेरी निगाहों में है उस की सहर बे-हिजाबपर्दा उठा दूँ अगर चेहरा-ए-अफ़्कार सेला न सकेगा फ़रंग मेरी नवाओं की ताबजिस में न हो इंक़लाब मौत है वो ज़िंदगीरूह-ए-उमम की हयात कश्मकश-ए-इंक़िलाबसूरत-ए-शमशीर है दस्त-ए-क़ज़ा में वो क़ौमकरती है जो हर ज़माँ अपने अमल का हिसाबनक़्श हैं सब ना-तमाम ख़ून-ए-जिगर के बग़ैरनग़्मा है सौदा-ए-ख़ाम ख़ून-ए-जिगर के बग़ैर
बरतर अज़ अंदेशा-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ है ज़िंदगीहै कभी जाँ और कभी तस्लीम-ए-जाँ है ज़िंदगीतू इसे पैमाना-ए-इमरोज़-ओ-फ़र्दा से न नापजावेदाँ पैहम दवाँ हर-दम जवाँ है ज़िंदगीअपनी दुनिया आप पैदा कर अगर ज़िंदों में हैसिर्र-ए-आदम है ज़मीर-ए-कुन-फ़काँ है ज़िंदगीज़िंदगानी की हक़ीक़त कोहकन के दिल से पूछजू-ए-शीर-ओ-तेशा-ओ-संग-ए-गराँ है ज़िंदगीबंदगी में घट के रह जाती है इक जू-ए-कम-आबऔर आज़ादी में बहर-ए-बे-कराँ है ज़िंदगीआश्कारा है ये अपनी क़ुव्वत-ए-तस्ख़ीर सेगरचे इक मिट्टी के पैकर में निहाँ है ज़िंदगीक़ुल्ज़ुम-ए-हस्ती से तो उभरा है मानिंद-ए-हबाबइस ज़ियाँ-ख़ाने में तेरा इम्तिहाँ है ज़िंदगीख़ाम है जब तक तू है मिट्टी का इक अम्बार तूपुख़्ता हो जाए तू है शमशेर-ए-बे-ज़िन्हार तूहो सदाक़त के लिए जिस दिल में मरने की तड़पपहले अपने पैकर-ए-ख़ाकी में जाँ पैदा करेफूँक डाले ये ज़मीन-ओ-आसमान-ए-मुस्त'आरऔर ख़ाकिस्तर से आप अपना जहाँ पैदा करेज़िंदगी की क़ूव्वत-ए-पिन्हाँ को कर दे आश्कारता ये चिंगारी फ़रोग़-ए-जावेदाँ पैदा करेख़ाक-ए-मशरिक पर चमक जाए मिसाल-ए-आफ्ताबता-बदख़्शाँ फिर वही ला'ल-ए-गिराँ पैदा करेसू-ए-गर्दूं नाला-ए-शब-गीर का भेजे सफ़ीररात के तारों में अपने राज़-दाँ पैदा करेये घड़ी महशर की है तू अर्सा-ए-महशर में हैपेश कर ग़ाफ़िल ‘अमल कोई अगर दफ़्तर में हैसल्तनत
जहाँ-ज़ादइंतिज़ार आज भी मुझे है क्यूँ वही मगरजो नौ बरस के दौर-ए-ना-सज़ा में था?अब इंतिज़ार आँसुओं के दजला कान गुमरही की रात काशब-ए-गुनाह की लज़्ज़तों का इतना ज़िक्र कर चुकावो ख़ुद गुनाह बन गईं!हलब की कारवाँ-सारा के हौज़ का, न मौत कान अपनी इस शिकस्त-खुर्दा ज़ात काइक इंतिज़ार-ए-बे-अमाँ का तार है बंधा हुआ!कभी जो चंद सानिए ज़मान-ए-बे-ज़मान में आ के रुक गएतो वक़्त का ये बार मेरे सर से भी उतर गयातमाम रफ़्ता ओ गुज़िश्ता सूरतों, तमाम हादसोंके सुस्त क़ाफ़िलेमिरे दरूँ में जाग उठेमेरे दरूँ में इक जहान-ए-बाज़-याफ़्ता की रेल-पेल जाग उठीबहिश्त जैसे जाग उठे ख़ुदा के ला-शुऊर में!मैं जाग उठा ग़ुनूदगी की रेत पर पड़ा हुआग़ुनूदगी की रेत पर पड़े हुए वो कूज़े जोमिरे वजूद से बरूँतमाम रेज़ा रेज़ा हो के रह गए थेमेरे अपने-आप से फ़िराक़ मेंवो फिर से एक कुल बने (किसी नवा-ए-साज़-गार की तरह)वो फिर से एक रक़्स-ए-बे-ज़मान बनेवो रूयत-ए-अज़ल बने!
जहाँ-ज़ाद कैसे हज़ारों बरस बादइक शहर-ए-मदफ़ून की हर गली मेंमेरे जाम ओ मीना ओ गुल-दाँ के रेज़े मिले हैंकि जैसे वो इस शहर-ए-बर्बाद का हाफ़िज़ा होंहसन नाम का इक जवाँ कूज़ा-गर इक नए शहर मेंअपने कूज़े बनाता हुआ इश्क़ करता हुआअपने माज़ी के तारों में हम से पिरोया गया हैहमीं में कि जैसे हमीं हों समोया गया हैकि हम तुम वो बारिश के क़तरे थे जो रात भर सेहज़ारों बरस रेंगती रात भरइक दरीचे के शीशों पे गिरते हुए साँप लहरेंबनाते रहे हैंऔर अब इस जगह वक़्त की सुब्ह होने से पहलेये हम और ये नौजवाँ कूज़ा-गरएक रूया में फिर से पिरोए गए हैंजहाँ-ज़ादये कैसा कोहना-परस्तों का अम्बोहकूज़ों की लाशों में उतरा हैदेखोये वो लोग हैं जिन की आँखेंकभी जाम ओ मीना की लिम तक न पहुँचींयही आज इस रंग ओ रोग़न की मख़्लूक़-ए-बे-जाँको फिर से उलटने पलटने लगे हैंये उन के तले ग़म की चिंगारियाँ पा सकेंगेजो तारीख़ को खा गई थींवो तूफ़ान वो आँधियाँ पा सकेंगेजो हर चीख़ को खा गई थींउन्हें क्या ख़बर किस धनक से मेरे रंग आएमेरे और इस नौजवाँ कूज़ा-गर केउन्हें क्या ख़बर कौन सी तितलियों के परों सेउन्हें क्या ख़बर कौन से हुस्न सेकौन सी ज़ात से किस ख़द्द-ओ-ख़ाल सेमैं ने कूजों के चेहरे उतारेये सब लोग अपने असीरों में हैंज़माना जहाँ-ज़ाद अफ़्सूँ-ज़दा बुर्ज हैऔर ये लोग उस के असीरों में हैंजवाँ कूज़ा-गर हँस रहा हैये मासूम वहशी कि अपने ही क़ामत से ज़ोलीदा-दामनहैं जूया किसी अज़्मत-ए-ना-रसा केउन्हें क्या ख़बर कैसा आसेब-ए-मुबरम मेरे ग़ार सीने पे थाजिस ने मुझ से और उस कूज़ा-गर से कहाऐ हसन कूज़ा-गर जागदर्द-ए-रिसालत का रोज़-ए-बशारत तिरे जाम ओ मीनाकी तिश्ना-लबी तक पहुँचने लगा हैयही वो निदा के पीछे हसन नाम काये जवाँ कूज़ा-गर भीप्यापे रवाँ है ज़माँ से ज़माँ तकख़िज़ाँ से ख़िज़ाँ तक
'अक़्ल ने एक दिन ये दिल से कहाभूले-भटके की रहनुमा हूँ मैंहूँ ज़मीं पर गुज़र फ़लक पे मिरादेख तू किस क़दर रसा हूँ मैंकाम दुनिया में रहबरी है मिरामिस्ल-ए-ख़िज़्र-ए-ख़जिस्ता-पा हूँ मेंहूँ मुफ़स्सिर किताब-ए-हस्ती कीमज़हर-ए-शान-ए-किब्रिया हूँ मैंबूँद इक ख़ून की है तू लेकिनग़ैरत-ए-ला'ल-ए-बे-बहा हूँ मैंदिल ने सुन कर कहा ये सब सच हैपर मुझे भी तो देख क्या हूँ मैंराज़-ए-हस्ती को तू समझती हैऔर आँखों से देखता हूँ मैंहै तुझे वास्ता मज़ाहिर सेऔर बातिन से आश्ना हूँ मैं'इल्म तुझ से तो मा'रिफ़त मुझ सेतू ख़ुदा जो ख़ुदा-नुमा हूँ मैं'इल्म की इंतिहा है बेताबीउस मरज़ की मगर दवा हूँ मैंशम' तू महफ़िल-ए-सदाक़त कीहुस्न की बज़्म का दिया हूँ मैंतू ज़मान-ओ-मकाँ से रिश्ता बपाताइर-ए-सिदरा-आश्ना हूँ मैंकिस बुलंदी पे है मक़ाम मिरा'अर्श रब्ब-ए-जलील का हूँ मैं
मेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजयारे वतनहर आँख के तारे वतनगुल-पोश तेरी वादियाँफ़रहत-निशाँ राहत-रसाँतेरे चमन-ज़ारों पे हैगुलज़ार-ए-जन्नत का गुमाँहर शाख़ फूलों की छड़ीहर नख़्ल-ए-तूबा है यहाँकौसर के चश्मे जा-ब-जातसनीम हर आब-ए-रवाँहर बर्ग रूह-ए-ताज़गीहर फूल जान-ए-गुल्सिताँहर बाग़ बाग़-ए-दिल-कशीहर बाग़ बाग़-ए-बे-ख़िज़ाँदिलकश चरागाहें तिरीढोरों के जिन में कारवाँअंजुम-सिफ़त गुलहा-ए-नौहर तख़्ता-ए-गुल आसमाँनक़्श-ए-सुरय्या जा-ब-जाहर हर रविश इक कहकशाँतेरी बहारें दाइमीतेरी बहारें जावेदाँतुझ में है रूह-ए-ज़िंदगीपैहम रवाँ पैहम दवाँदरिया वो तेरे तुंद-ख़ूझीलें वो तेरी बे-कराँशाम-ए-अवध के लब पे हैहुस्न-ए-अज़ल की दास्ताँकहती है राज़-ए-सरमदीसुब्ह-ए-बनारस की ज़बाँउड़ता है हफ़्त-अफ़्लाक परउन कार-ख़ानों का धुआँजिन में हैं लाखों मेहनतीसनअत-गरी के पासबाँतेरी बनारस की ज़रीरश्क-ए-हरीर-ओ-परनियाँबीदर की फ़नकारी में हैंसनअत की सब बारीकियाँअज़्मत तिरे इक़बाल कीतेरे पहाड़ों से अयाँदरियाओं का पानी, तरीतक़्दीस का अंदाज़ा-दाँक्या 'भारतेंदु' ने कियागंगा की लहरों का बयाँ'इक़बाल' और चकबस्त हैंअज़्मत के तेरी नग़्मा-ख़्वाँ'जोश' ओ 'फ़िराक़' ओ 'पंत' हैंतेरे अदब के तर्जुमाँ'तुलसी' ओ 'ख़ुसरव' हैं तेरीतारीफ़ में रत्ब-उल-लिसाँगाते हैं नग़्मा मिल के सबऊँचा रहे तेरा निशाँमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजियारे वतनहर आँख के तारे वतनतेरे नज़ारों के नगींदुनिया की ख़ातम में नहींसारे जहाँ में मुंतख़बकश्मीर की अर्ज़-ए-हसींफ़ितरत का रंगीं मोजज़ाफ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मींफ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मींहाँ हाँ हमीं अस्त ओ हमींसरसब्ज़ जिस के दश्त हैंजिस के जबल हैं सुर्मगींमेवे ब-कसरत हैं जहाँशीरीं मिसाल-ए-अंग्बींहर ज़ाफ़राँ के फूल मेंअक्स-ए-जमाल-ए-हूरईंवो मालवे की चाँदनीगुम जिस में हों दुनिया-ओ-दींइस ख़ित्ता-ए-नैरंग मेंहर इक फ़ज़ा हुस्न-आफ़रींहर शय में हुस्न-ए-ज़िंदगीदिलकश मकाँ दिलकश ज़मींहर मर्द मर्द-ए-ख़ूब-रूहर एक औरत नाज़नींवो ताज की ख़ुश-पैकरीहर ज़ाविए से दिल-नशींसनअत-गरों के दौर कीइक यादगार-ए-मरमरींहोती है जो हर शाम कोफ़ैज़-ए-शफ़क़ से अहमरींदरिया की मौजों से अलगया इक बत-ए-नज़्ज़ारा-बींया ताएर-ए-नूरी कोईपर्वाज़ करने के क़रींया अहल-ए-दुनिया से अलगइक आबिद-ए-उज़्लत-गुज़ीनक़्श-ए-अजंता की क़समजचता नहीं अर्ज़ंग-ए-चींशान-ए-एलोरा देख करझुकती है आज़र की जबींचित्तौड़ हो या आगराऐसे नहीं क़िलए कहींबुत-गर हो या नक़्क़ाश होतू सब की अज़्मत का अमींमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनदिलकश तिरे दश्त ओ चमनरंगीं तिरे शहर ओ चमनतेरे जवाँ राना जवाँतेरे हसीं गुल पैरहनइक अंजुमन दुनिया है येतू इस में सद्र-ए-अंजुमनतेरे मुग़न्नी ख़ुश-नवाशाएर तिरे शीरीं-सुख़नहर ज़र्रा इक माह-ए-मुबींहर ख़ार रश्क-ए-नस्तरींग़ुंचा तिरे सहरा का हैइक नाफ़ा-ए-मुश्क-ए-ख़ुतनकंकर हैं तेरे बे-बहापत्थर तिरे लाल-ए-यमनबस्ती से जंगल ख़ूब-तरबाग़ों से हुस्न अफ़रोज़ बनवो मोर वो कब्क-ए-दरीवो चौकड़ी भरते हिरनरंगीं-अदा वो तितलियाँबाँबी में वो नागों के फनवो शेर जिन के नाम सेलरज़े में आए अहरमनखेतों की बरकत से अयाँफ़ैज़ान-ए-रब्ब-ए-ज़ुल-मिननचश्मों के शीरीं आब सेलज़्ज़त-कशाँ काम-ओ-दहनताबिंदा तेरा अहद-ए-नौरौशन तिरा अहद-ए-कुहनकितनों ने तुझ पर कर दियाक़ुर्बान अपना माल धनकितने शहीदों को मिलेतेरे लिए दार-ओ-रसनकितनों को तेरा इश्क़ थाकितनों को थी तेरी लगनतेरे जफ़ा-कश मेहनतीरखते हैं अज़्म-ए-कोहकनतेरे सिपाही सूरमाबे-मिस्ल यक्ता-ए-ज़मन'भीषम' सा जिन में हौसला'अर्जुन' सा जिन में बाँकपनआलिम जो फ़ख़्र-ए-इल्म हैंफ़नकार नाज़ाँ जिन पे फ़न'राय' ओ 'बोस' ओ 'शेरगिल''दिनकर', 'जिगर' 'मैथली-शरण''वलाठोल', 'माहिर', भारती'बच्चन', 'महादेवी', 'सुमन''कृष्णन', 'निराला', 'प्रेम-चंद''टैगोर' ओ 'आज़ाद' ओ 'रमन'मेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनखेती तिरी हर इक हरीदिलकश तिरी ख़ुश-मंज़रीतेरी बिसात-ए-ख़ाक केज़र्रे हैं महर-ओ-मुश्तरीझेलम कावेरी नाग वोगंगा की वो गंगोत्रीवो नर्बदा की तमकनतवो शौकत-ए-गोदावरीपाकीज़गी सरजू की वोजमुना की वो ख़ुश-गाैहरीदुल्लर्बा आब-ए-नील-गूँकश्मीर की नीलम-परीदिलकश पपीहे की सदाकोयल की तानें मद-भरीतीतर का वो हक़ सिर्रहुतूती का वो विर्द-ए-हरीसूफ़ी तिरे हर दौर मेंकरते रहे पैग़म्बरी'चिश्ती' ओ 'नानक' से मिलीफ़क़्र-ओ-ग़िना को बरतरीअदल-ए-जहाँगीरी में थीमुज़्मर रेआया-पर्वरीवो नव-रतन जिन से हुईतहज़ीब-ए-दौर-ए-अकबरीरखते थे अफ़्ग़ान-ओ-मुग़लइक सौलत-ए-अस्कंदरीरानाओं के इक़बाल कीहोती है किस से हम-सरीसावंत वो योद्धा तिरेतेरे जियाले वो जरीनीती विदुर की आज तककरती है तेरी रहबरीअब तक है मशहूर-ए-ज़माँ'चाणक्य' की दानिश-वरीवयास और विश्वामित्र सेमुनियों की शान-ए-क़ैसरीपातंजलि ओ साँख सेऋषियों की हिकमत-पर्वरीबख़्शे तुझे इनआम-ए-नौहर दौर चर्ख़-ए-चम्बरीख़ुश-गाैहरी दे आब कोऔर ख़ाक को ख़ुश-जौहरीज़र्रों को महर-अफ़्शानियाँक़तरों को दरिया-गुस्तरीमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनतू रहबर-ए-नौ-ए-बशरतू अम्न का पैग़ाम-बरपाले हैं तू ने गोद मेंसाहिब-ख़िरद साहिब-ए-नज़रअफ़ज़ल-तरीं इन सब में हैबापू का नाम-ए-मो'तबरहर लफ़्ज़ जिस का दिल-नशींहर बात जिस की पुर-असरजिस ने लगाया दहर मेंनारा ये बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तरबे-कार हैं तीर-ओ-सिनाँबे-सूद हैं तेग़-ओ-तबरहिंसा का रस्ता झूट हैहक़ है अहिंसा की डगरदरमाँ है ये हर दर्द काये हर मरज़ का चारा-गरजंगाह-ए-आलम में कोईइस से नहीं बेहतर सिपरकरता हूँ मैं तेरे लिएअब ये दुआ-ए-मुख़्तसररौनक़ पे हों तेरे चमनसरसब्ज़ हों तेरे शजरनख़्ल-ए-उमीद-ए-बेहतरीहर फ़स्ल में हो बारवरकोशिश हो दुनिया में कोईख़ित्ता न हो ज़ेर-ओ-ज़बरतेरा हर इक बासी रहेनेको-सिफ़त नेको-सियरहर ज़न सलीक़ा-मंद होहर मर्द हो साहिब-हुनरजब तक हैं ये अर्ज़ ओ फ़लकजब तक हैं ये शम्स ओ क़मरमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजयारे वतनहर आँख के तारे वतन
वो कब के आए भी और गए भी नज़र में अब तक समा रहे हैंये चल रहे हैं, वो फिर रहे हैं, ये आ रहे हैं वो जा रहे हैंवही क़यामत है कद्द-ए-बाला वही है सूरत, वही सरापालबों को जुम्बिश, निगह को लर्ज़िश, खड़े हैं और मुस्कुरा रहे हैंवही लताफ़त, वही नज़ाकत, वही तबस्सुम, वही तरन्नुममैं नक़्श-ए-हिरमाँ बना हुआ था वो नक़्श-ए-हैरत बना रहे हैंख़िराम रंगीं, निज़ाम रंगीं, कलाम रंगीं, पयाम रंगींक़दम क़दम पर, रविश रविश पर नए नए गुल खिला रहे हैंशबाब रंगीं, जमाल रंगीं, वो सर से पा तक तमाम रंगींतमाम रंगीं बने हुए हैं, तमाम रंगीं बना रहे हैंतमाम रानाइयों के मज़हर, तमाम रंगीनियों के मंज़रसँभल सँभल कर सिमट सिमट कर सब एक मरकज़ पर आ रहे हैंबहार-ए-रंग-ओ-शबाब ही क्या सितारा ओ माहताब ही क्यातमाम हस्ती झुकी हुई है, जिधर वो नज़रें झुका रहे हैंतुयूर सरशार-ए-साग़र-ए-मुल हलाक-ए-तनवीर-ए-लाला-ओ-गुलसब अपनी अपनी धुनों में मिल कर अजब अजब गीत गा रहे हैंशराब आँखों से ढल रही है, नज़र से मस्ती उबल रही हैछलक रही है उछल रही है, पिए हुए हैं पिला रहे हैंख़ुद अपने नश्शे में झूमते हैं, वो अपना मुँह आप चूमते हैंख़राब-ए-मस्ती बने हुए हैं, हलाक-ए-मस्ती बना रहे हैंफ़ज़ा से नश्शा बरस रहा है, दिमाग़ फूलों में बस रहा हैवो कौन है जो तरस रहा है? सभी को मय-कश पिला रहे हैंज़मीन नश्शा, ज़मान नश्शा, जहान नश्शा, मकान नश्शामकान क्या? ला-मकान नश्शा, डुबो रहे हैं पिला रहे हैंवो रू-ए-रंगीं ओ माैजा-ए-यम, कि जैसे दामान-ए-गुल पे शबनमये गरमी-ए-हुस्न का है आलम, अरक़ अरक़ में नहा रहे हैंये मस्त बुलबुल बहक रहे हैं, क़रीब-ए-आरिज़ चहक रहे हैगुलों की छाती धड़क रही है, वो दस्त-ए-रंगीं बढ़ा रहे हैंये मौज-ओ-दरिया, ये रेग-ओ-सहरा ये ग़ुंचा-ओ-गुल, ये माह-ओ-अंजुमज़रा जो वो मुस्कुरा दिए हैं वो सब के सब मुस्कुरा रहे हैंफ़ज़ा ये नग़्मों से भर गई है कि मौज-ए-दरिया ठहर गई हैसुकूत-ए-नग़्मा बना हुआ है, वो जैसे कुछ गुनगुना रहे हैंअब आगे जो कुछ भी हो मुक़द्दर, रहेगा लेकिन ये नक़्श दिल परहम उन का दामन पकड़ रहे हैं, वो अपना दामन छुड़ा रहे हैंये अश्क जो बह रहे हैं पैहम, अगरचे सब हैं ये हासिल-ए-ग़ममगर ये मालूम हो रहा है, कि ये भी कुछ मुस्कुरा रहे हैंज़रा जो दम भर को आँख झपकी, ये देखता हूँ नई तजल्लीतिलिस्म सूरत मिटा रहे हैं, जमाल मअनी बना रहे हैंख़ुशी से लबरेज़ शश-जिहत है, ज़बान पर शोर-ए-तहनियत हैये वक़्त वो है 'जिगर' के दिल को वो अपने दिल से मिला रहे हैं
दिल ज़िंदा-ओ-बे-दार अगर हो तो ब-तदरीजबंदे को 'अता करते हैं चश्म-ए-निगराँ औरअहवाल-ओ-मक़ामात पे मौक़ूफ़ है सब कुछहर लहज़ा है सालिक का ज़माँ और मकाँ औरअल्फ़ाज़-ओ-म'आनी में तफ़ावुत नहीं लेकिनमुल्ला की अज़ाँ और मुजाहिद की अज़ाँ औरपरवाज़ है दोनों की इसी एक फ़ज़ा मेंकर्गस का जहाँ और है शाहीं का जहाँ और
मैं इक देवता-ए-अनानर्गिसिय्यत का मारा हुआऔर अज़ल से तकब्बुर में डूबा हुआकाफ़ी ख़ुद-सर हूँज़िद्दी हूँ मग़रूर हूँमेरे चारों तरफ़ मेरी अंधी अना की वो दीवार हैजिस में आने की और मुझ से मिलने की घुलने की कोई इजाज़त किसी को नहीं हैतुम्हें भी नहीं हैउसे भी नहीं हैमुझे भी नहीं हैमैं अपनी अना की दीवारों में तुम से अलग हो रहूँमुझ पे सजता भी है येमैं शाइ'र हूँ जो कि फ़ऊलुन फ़ऊलुन से बहर-ए-रमल तकहर इक नग़मगी का मुकम्मल ख़ुदा हूँमैं लफ़्ज़ों का आक़ातख़य्युल का ख़ालिक़मैं सारे ज़माने से यकसर जुदा हूँमुझे ज़ेब देता है मैं अपनी दीवार में इस तरह से मुक़य्यद रहूँयूँही सय्यद रहूँमुझ पे सजता है ये।पर जो कल शब तिरे शबनमी से तबस्सुम में लिपटी हुईइक नज़र बे-नियाज़ी से मुझ पर पड़ीतेरी पहली नज़र से मिरी जान-ए-जाँमेरी दीवार में इक गढ़ा पर पड़ गयाऔर ये ही नहीं मुझ पे वो ही नज़रजब दोबारा दोबारा दोबारा पड़ीमेरी दीवार में ज़लज़ले आ गएऔर रख़्ने शिगाफ़ों में ढलने लगेमेरे अंदर तलातुम वो आतिश-फ़िशाँवो बगूले वो तूफ़ाँ वो महशर बपा थाकि मैं वो कि जिस के तहम्मुल की हिकमत कीफ़हम-ओ-लताफ़त की तमसील शायद कहीं भी नहीं थीसुलगने लगाअपनी हिद्दत से ख़ुद ही पिघलने लगातुझ से कहना था ये कि मिरी जान-ए-जाँहर सितारे की अपनी कशिश होगी लेकिनख़लाओं में मुर्दा सितारों की क़िस्मतवो हॉकिंग की थ्योरी के काले गढ़ेवो वही वो कि जिन में है इतनी कशिश कि मकाँ तो मकाँवो ज़माँ को भी अपने लपेटे में ले लेंवो हॉकिंग की थ्योरी के काले गढ़ों की ग्रेविटी भीतेरी अंखों की गहरी कशिश के मुक़ाबिल में कुछ भी नहींऔर ये तो फ़क़त एक दीवार थीइस को गिरना ही थातेरी नज़रों से हारी है बिखरी पड़ी हैकि दीवार का रेज़ा-रेज़ा तिरी इक नज़र से मिरी जानउजड़ा पड़ा हैमैं जो देवता-ए-अना नर्गिसिय्यत का मारा हुआ वो जो ख़ुद-सर थाज़िद्दी था मग़रूर थाजो फ़ऊलुन फ़ऊलुन से बहर-ए-रमल तक हर इक नग़मगी का मुकम्मल ख़ुदा थातिरी इक नज़र से अनाओं के अर्श-ए-मुअ'ल्ला से सीधा तिरे पाँव में आ केबिखरा पड़ा है
जब वो ख़ाली बोतल फेंक के कहता है''दुनिया! तेरा हुस्न, यही बद-सूरती है''दुनिया उस को घूरती हैशोर-ए-सलासिल बन कर गूँजने लगता हैअँगारों भरी आँखों में ये तुंद सवालकौन है ये जिस ने अपनी बहकी बहकी साँसों का जालबाम-ए-ज़माँ पर फेंका हैकौन है जो बल खाते ज़मीरों के पुर-पेच धुँदलकों मेंरूहों के इफ़्रीत-कदों के ज़हर-अंदोज़ महलकों मेंले आया है यूँ बिन पूछे अपने आपऐनक के बर्फ़ीले शीशों से छनती नज़रों की चापकौन है ये गुस्ताख़ताख़ तड़ाख़!
मुझे मौत आएगी, मर जाऊँगा मैं,तुझे मौत आएगी, मर जाएगी तू,वो पहली शब-ए-मह शब-ए-माह-ए-दो-नीम बन जाएगीजिस तरह साज़-कोहना के तार-ए-शिकस्ता के दोनों सिरेदूर उफ़ुक़ के किनारों के मानिंदबस दूर ही दूर से थरथराते हैं और पास आते नहीं हैंन वो राज़ की बात होंटों पे लाते हैंजिस ने मुग़न्नी को दौर-ए-ज़माँ-ओ-मकाँ से निकाला था,बख़्शी थी ख़्वाब-ए-अबद से रिहाई!
वही है शोर-ए-हाए-ओ-हू, वही हुजूम-ए-मर्द-ओ-ज़नमगर वो हुस्न-ए-ज़िंदगी, मगर वो जन्नत-ए-वतनवही ज़मीं, वहीं ज़माँ, वही मकीं, वही मकाँमगर सुरूर-ए-यक-दिली, मगर नशात-ए-अंजुमनवही है शौक़-ए-नौ-ब-नौ, वही जमाल-ए-रंग-रंगमगर वो इस्मत-ए-नज़र, तहारत-ए-लब-ओ-दहनतरक़्क़ियों पे गरचे हैं, तमद्दुन-ओ-मुआशरतमगर वो हुस्न-ए-सादगी, वो सादगी का बाँकपनशराब-ए-नौ की मस्तियाँ, कि अल-हफ़ीज़-ओ-अल-अमाँमगर वो इक लतीफ़ सा सुरूर-ए-बादा-ए-कुहनये नग़्मा-ए-हयात है कि है अजल तराना-संजये दौर-ए-काएनात है कि रक़्स में है अहरमनहज़ार-दर-हज़ार हैं अगरचे रहबरान-ए-मुल्कमगर वो पीर-ए-नौजवाँ, वो एक मर्द-ए-सफ़-शिकनवही महात्मा वही शहीद-ए-अम्न-ओ-आश्तीप्रेम जिस की ज़िंदगी, ख़ुलूस जिस का पैरहनवही सितारे हैं, मगर कहाँ वो माहताब-ए-हिन्दवही है अंजुमन, मगर कहाँ वो सद्र-ए-अंजुमन
जहाँ में इज़्तिराब हैनहीं नहींजहाँ ही इज़्तिराब हैहज़ार-हा कवाकिब-ओ-नुजूम-हा-ए-कहकशाँ सेऐटमों की कोख तकमदार-दर-मदार हर वजूद बे-क़रार हैये मेहर-ओ-माह ओ मुश्तरी से हर इलेक्ट्रॉन तकये झूम झूम घूमने में जिस तरह का रक़्स हैमुझे समझ में आ गयाजहान तेरा अक्स हैवो अक्स जो जगह जगह क़दम क़दम रिधम पे हैजहान ऐन सुर में है जहान ऐन सम पे हैजहाँ तरन्नुमों की लिस्ट में से इंतिख़ाब हैजो तुझ हसीं दिमाग़ के हसीन ला-शुऊ'र में बना होऐसा ख़्वाब हैजहान इज़्तिराब हैमुझे समझ में आ गया है ये जहाँख़ला मकाँ ज़माँ के चंद तार से बना हुआ सितार हैउसे कहो किसी तरह सितार छेड़ती रहेउसे कहो कि थोड़ी देर और बोलती रहे
ऐ हसन काश तू जान सकताकि इस सहन ख़ाना से दहलीज़ तक के सफ़र मेंजहाँ ज़ाद को क्यूँ ज़माने लगे हैंहसन इस सफ़र में जहाँ ज़ाद कोएक इक गाम पर वक़्त के ताज़ियाने लगे हैं
तज़्किरा देहली-ए-मरहूम का ऐ दोस्त न छेड़न सुना जाएगा हम से ये फ़साना हरगिज़दास्ताँ गुल की ख़िज़ाँ में न सुना ऐ बुलबुलहँसते हँसते हमें ज़ालिम न रुलाना हरगिज़ढूँढता है दिल-ए-शोरीदा बहाने मुतरिबदर्द-अंगेज़ ग़ज़ल कोई न गाना हरगिज़सोहबतें अगली मुसव्वर हमें याद आएँगीकोई दिलचस्प मुरक़्क़ा न दिखाना हरगिज़ले के दाग़ आएगा सीने पे बहुत ऐ सय्याहदेख इस शहर के खंडरों में न जाना हरगिज़चप्पा चप्पा पे हैं याँ गौहर-ए-यकता तह-ए-ख़ाकदफ़्न होगा न कहीं इतना ख़ज़ाना हरगिज़मिट गए तेरे मिटाने के निशाँ भी अब तोऐ फ़लक इस से ज़्यादा न मिटाना हरगिज़वो तो भूले थे हमें हम भी उन्हें भूल गएऐसा बदला है न बदलेगा ज़माना हरगिज़जिस को ज़ख़्मों से हवादिस के अछूता समझेंनज़र आता नहीं इक ऐसा घराना हरगिज़हम को गर तू ने रुलाया तो रुलाया ऐ चर्ख़हम पे ग़ैरों को तो ज़ालिम न हँसाना हरगिज़आख़िरी दौर में भी तुझ को क़सम है साक़ीभर के इक जाम न प्यासों को पिलाना हरगिज़बख़्त सोए हैं बहुत जाग के ऐ दौर-ए-ज़माँन अभी नींद के मातों को जगाना हरगिज़कभी ऐ इल्म-ओ-हुनर घर था तुम्हारा दिल्लीहम को भूले हो तो घर भूल न जाना हरगिज़'ग़ालिब' ओ 'शेफ़्ता' ओ 'नय्यर' ओ 'आज़ुर्दा' ओ 'ज़ौक़'अब दिखाएगा न शक्लों को ज़माना हरगिज़'मोमिन' ओ 'अल्वी' ओ 'सहबाई' ओ 'ममनून' के ब'अदशेर का नाम न लेगा कोई दाना हरगिज़'दाग़' ओ 'मजरूह' को सुन लो कि फिर इस गुलशन मेंन सुनेगा कोई बुलबुल का तराना हरगिज़रात आख़िर हुई और बज़्म हुई ज़ेर-ओ-ज़बरअब न देखोगे कभी लुत्फ़-ए-शबाना हरगिज़बज़्म-ए-मातम तो नहीं बज़्म-ए-सुख़न है 'हाली'याँ मुनासिब नहीं रो रो के रुलाना हरगिज़
ख़ुदाया अब के ये कैसी बहार आई''ख़ुदा से क्या गिला भाईख़ुदा तो ख़ैर किस ने उस का अक्स-ए-नक़्श-ए-पा देखान देखा तो भी देखा और देखा भी तो क्या देखामगर तौबा मिरी तौबा ये इंसाँ भी तो आख़िर इक तमाशा हैये जिस ने पिछली टाँगों पर खड़ा होना बड़े जतनों से सीखा हैअभी कल तक जब उस के अब्रूओं तक मू-ए-पेचाँ थेअभी कल तक जब उस के होंट महरूम-ए-ज़नख़दाँ थेरिदा-ए-सद-ज़माँ ओढ़े लरज़ता काँपता बैठाज़मीर-ए-संग से बस एक चिंगारी का तालिब थामगर अब तो ये ऊँची ममटियों वाले जिलौ-ख़ानों में बस्ता हैहमारे ही लबों से मुस्कुराहट छीन कर अब हम पे हँसता हैख़ुदा उस का ख़ुदाई उस की हर शय उस की हम क्या हैंचमकती मोटरों से उड़ने वाली धूल का नाचीज़ ज़र्रा हैंहमारी ही तरह जो पाएमाल-ए-सतवत-ए-मीरी-ए-ओ-ए-शाही मेंलिखोखा आबदीदा पा-पियादा दिल-ज़दा वामाँदा राही हैंजिन्हें नज़रों से गुम होते हुए रस्तों की गुम-पैमा लकीरों मेंदिखाई दे रही हैं आने वाली मंज़िलों की धुँदली तस्वीरेंज़रूर इक रोज़ बदलेगा निज़ाम-ए-क़िस्मत-ए-आदमबसेगी इक नई दुनिया सजेगा इक नया आलमशबिस्ताँ में नई शमएँ गुलिस्ताँ में नया मौसम''वो रुत ऐ हम-नफ़स जाने कब आएगीवो फ़स्ल-ए-देर-रस जाने कब आएगीये नौ नंबर की बस जाने कब आएगी
तावीज़-ए-लहद है ज़बर ओ ज़ेर ये अंधेरये दौर-ए-ज़माना के उलट फेर ये अंधेरआँगन में पड़े गर्द के हैं ढेर ये अंधेरऐ गर्दिश-ए-अय्याम ये अंधेर! ये अंधेर
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