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नज़्म
कभी जो चंद सानिए ज़मान-ए-बे-ज़मान में आ के रुक गए
तो वक़्त का ये बार मेरे सर से भी उतर गया
नून मीम राशिद
नज़्म
ज़मीन नश्शा, ज़मान नश्शा, जहान नश्शा, मकान नश्शा
मकान क्या? ला-मकान नश्शा, डुबो रहे हैं पिला रहे हैं
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
मैं सारे ज़माने से यकसर जुदा हूँ
मुझे ज़ेब देता है मैं अपनी दीवार में इस तरह से मुक़य्यद रहूँ
सोहैब मुग़ीरा सिद्दीक़ी
नज़्म
न वो राज़ की बात होंटों पे लाते हैं
जिस ने मुग़न्नी को दौर-ए-ज़माँ-ओ-मकाँ से निकाला था,
नून मीम राशिद
नज़्म
वही ज़मीं, वहीं ज़माँ, वही मकीं, वही मकाँ
मगर सुरूर-ए-यक-दिली, मगर नशात-ए-अंजुमन
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
मुझे समझ में आ गया है ये जहाँ
ख़ला मकाँ ज़माँ के चंद तार से बना हुआ सितार है