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नज़्म
दरस-ए-सुकून-ओ-सब्र ब-ईं एहतिमाम-ए-नाज़
निश्तर-ज़नी-ए-जुम्बिश-ए-मिज़्गाँ लिए हुए
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
अमजद नजमी
नज़्म
तो संग-ज़नी का अंदेशा होता है
क्यूँकि अधूरे ख़्वाब-ओ-ख़याल कुफ़्र की मानिंद होते हैं
साइरा इक़बाल
नज़्म
उस की करामतों में जिस और भी ज़ुल-जलाल दे
उस से अगर है बद-ज़नी दिल में तो अब निकाल दे
अली मंज़ूर हैदराबादी
नज़्म
न बद-ज़नी की हो कुल्फ़त न डर सज़ा का हो
न इल्तिजा-ए-करम से करूँ मैं ख़ुद को हक़ीर