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नज़्म
रोज़ ओ शब बैन करती हैं दहलीज़ पर और ज़ंजीर-ए-दर मुझ से खुलती नहीं
फ़र्श-ए-हमवार पर पाँव चलता नहीं
अख़्तर हुसैन जाफ़री
नज़्म
मगर वो फ़ाहिशा ज़ंजीर-ए-दर की नींद उड़ाए जा रही है
वो आँखें ख़ूबसूरत बन गई हैं!
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
नज़्म
दर्द-ए-तिफ़ली में अगर कोई रुलाता था मुझे
शोरिश-ए-ज़ंजीर-ए-दर में लुत्फ़ आता था मुझे
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मुक़द्दरात की घटस है अब तो ज़ीक़-ए-नफ़स
शिकस्ता करना है ज़ंजीर-ए-हल्क़ा-हा-ए-नविश्त