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नज़्म
दलील से वरा है सारी गुफ़्तुगू का सानेहा
ज़रा ज़रा सी ज़िंदगी बड़ा बड़ा सा ख़ौफ़ है
इलियास बाबर आवान
नज़्म
किसी बाब-ए-आतिश-ज़दा पर खड़ा मुस्कुराने लगा है
कहीं हिज्र की साअतें गिनते गिनते मुझे नींद आई हुई है
अहमद ज़फ़र
नज़्म
मुझे ऐ वतन तू ज़रा बता किधर अब हैं वो तिरी सन’अतें
जो हर एक मुल्क से लाई थीं तिरे पास खींच के दौलतें
सय्यद वहीदुद्दीन सलीम
नज़्म
फिर फ़क़त एक मंज़र से बे-कार सा सिलसिला हो गया
ज़र्द लड़की का चेहरा ख़ुदा से बड़ा ख़्वाब था
बलराज कोमल
नज़्म
क्यों पकड़ लेते हैं क़दमों को तिरे ये सब्ज़ा-ज़ार
आब-ए-लर्ज़ीदा में तेरे क्या लिखा है ये बता
ज़िया फ़ारूक़ी
नज़्म
किसी तन्नूर के हैज़म की ख़ाकिस्तर ही बनना था
उसे शोला-ज़दा बूदश का इक बिस्तर ही बनना था
जौन एलिया
नज़्म
फेंकू राम को ख़ूब आता है तिल को ताड़ बनाना
रस्सी को वो साँप बना दें और ज़र्रे को तारा