aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "zarf"
उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेक़ल्ब-ए-माहौल में लर्ज़ां शरर-ए-जंग हैं आजहौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक-रंग हैं आजआबगीनों में तपाँ वलवला-ए-संग हैं आजहुस्न और इश्क़ हम-आवाज़ ओ हम-आहंग हैं आजजिस में जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतेरे क़दमों में है फ़िरदौस-ए-तमद्दुन की बहारतेरी नज़रों पे है तहज़ीब ओ तरक़्क़ी का मदारतेरी आग़ोश है गहवारा-ए-नफ़्स-ओ-किरदारता-ब-कै गिर्द तिरे वहम ओ तअ'य्युन का हिसारकौंद कर मज्लिस-ए-ख़ल्वत से निकलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतू कि बे-जान खिलौनों से बहल जाती हैतपती साँसों की हरारत से पिघल जाती हैपाँव जिस राह में रखती है फिसल जाती हैबन के सीमाब हर इक ज़र्फ़ में ढल जाती हैज़ीस्त के आहनी साँचे में भी ढलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेज़िंदगी जेहद में है सब्र के क़ाबू में नहींनब्ज़-ए-हस्ती का लहू काँपते आँसू में नहींउड़ने खुलने में है निकहत ख़म-ए-गेसू में नहींजन्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहींउस की आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेगोशे गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिएफ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिएक़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिएज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिएरुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेक़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहींतुझ में शो'ले भी हैं बस अश्क-फ़िशानी ही नहींतू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहींतेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहींअपनी तारीख़ का उन्वान बदलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतोड़ कर रस्म का बुत बंद-ए-क़दामत से निकलज़ोफ़-ए-इशरत से निकल वहम-ए-नज़ाकत से निकलनफ़्स के खींचे हुए हल्क़ा-ए-अज़्मत से निकलक़ैद बन जाए मोहब्बत तो मोहब्बत से निकलराह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतोड़ ये अज़्म-शिकन दग़दग़ा-ए-पंद भी तोड़तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वो सौगंद भी तोड़तौक़ ये भी है ज़मुर्रद का गुलू-बंद भी तोड़तोड़ पैमाना-ए-मर्दान-ए-ख़िरद-मंद भी तोड़बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतू फ़लातून ओ अरस्तू है तू ज़हरा परवींतेरे क़ब्ज़े में है गर्दूं तिरी ठोकर में ज़मींहाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से जबींमैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहींलड़खड़ाएगी कहाँ तक कि सँभलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
वो एक तर्ज़-ए-सुख़न की ख़ुश्बूवो एक महका हुआ तकल्लुमलबों से जैसे गुलों की बारिशकि जैसे झरना सा गिर रहा होकि जैसे ख़ुश्बू बिखर रही होकि जैसे रेशम उलझ रहा होअजब बलाग़त थी गुफ़्तुगू मेंरवाँ था दरिया फ़साहतों कावो एक मकतब था आगही कावो इल्म-ओ-दानिश का मय-कदा थावो क़ल्ब और ज़ेहन का तसादुमजो गुफ़्तुगू में रवाँ-दवाँ थावो उस के अल्फ़ाज़ की रवानीवो उस का रुक रुक के बात करनावो शो'ला-ए-लफ़्ज़ और मआ'नीकहीं लपकना कहीं ठहरनाठहर के फिर वो कलाम करनाबहुत से जज़्बों की पर्दा-दारीबहुत से जज़्बों को आम करनाजो मैं ने पूछागुज़िश्ता शब के मुशाएरे में बहुत से शैदाई मुंतज़िर थेमुझे भी ये ही पता चला था कि आप तशरीफ़ ला रहे हैंमगर हुआ क्याज़रा तवक़्क़ुफ़ के बा'द बोले नहीं गया मैंन जा सका मैंसुनो हुआ क्यामैं ख़ुद को माइल ही कर न पायाये मेरी हालत मेरी तबीअ'तफिर उस पे मेरी ये बद-मिज़ाजी-ओ-बद-हवासीये वहशत-ए-दिलमियाँ हक़ीक़त है ये भी सुन लो कि अब हमारे मुशाएरे भीनहीं हैं उन वहशतों के हामिलजो मेरी तक़दीर बन चुकी हैंजो मेरी तस्वीर बन चुकी हैंजो मेरी तक़्सीर बन चुकी हैंफिर इक तवक़्क़ुफ़कि जिस तवक़्क़ुफ़ की कैफ़ियत पर गराँ समाअ'त गुज़र रही थीउस एक साअ'त का हाथ थामे ये इक वज़ाहत गुज़र रही थीअदब-फ़रोशों ने जाहिलों ने मुशाएरे को भी इक तमाशा बना दिया हैग़ज़ल की तक़्दीस लूट ली है अदब को मुजरा बना दिया हैसुख़न-वरों ने भी जाने क्या क्या हमारे हिस्से में रख दिया हैसितम तो ये है कि चीख़ को भी सुख़न के ज़ुमरे में रख दिया हैइलाही तौबासमाअ'तों में ख़राशें आने लगी हैं अब और शिगाफ़ ज़ेहनों में पड़ गए हैंमियाँ हमारे क़दम तो कब के ज़मीं में ख़िफ़्फ़त से गड़ गए हैंख़मोशियों के दबीज़ कोहरे से चंद लम्हों का फिर गुज़रनावो जैसे ख़ुद को उदासियों के समुंदरों में तलाश करनावो जैसे फिर सुरमई उफ़ुक़ पर सितारे अल्फ़ाज़ के उभरनाये ज़िंदगी से जो बे-नियाज़ी है किस लिए हैये रोज़-ओ-शब की जो बद-हवासी है किस लिए हैबस इतना समझोकि ख़ुद को बरबाद कर चुका हूँसुख़न तो आबाद ख़ैर क्या होमगर जहाँ दिल धड़क रहे हों वो शहर आबाद कर चुका हूँबचा ही क्या हैथा जिस के आने का ख़ौफ़ मुझ को वो एक साअ'त गुज़र चुकी हैवो एक सफ़हा कि जिस पे लिक्खा था ज़िंदगी को वो खो चुका हैकिताब-ए-हस्ती बिखर चुकी हैपढ़ा था मैं ने भी ज़िंदगी कोमगर तसलसुल नहीं था उस मेंइधर-उधर से यहाँ वहाँ से अजब कहानी गढ़ी गई थीसमझ में आई न इस लिए भी के दरमियाँ से पढ़ी गई थीसमझता कैसेन फ़लसफ़ी मैं न कोई आलिमउक़ूबतों के सफ़र पे निकला मैं इक सितारा हूँ आगही काअजल के हाथों में हाथ डाले इक इस्तिआ'रा हूँ ज़िंदगी काइ'ताब नाज़िल हुआ है जिस पर मैं वो ही मा'तूब आदमी हूँसितमगरों को तलब है जिस की मैं वो ही मतलूब आदमी हूँकभी मोहब्बत ने ये कहा था मैं एक महबूब आदमी हूँमगर वो ज़र्ब-ए-जफ़ा पड़ी है कि एक मज़रूब आदमी हूँमैं एक बेकल सा आदमी हूँ बहुत ही बोझल सा आदमी हूँसमझ रही है ये दुनिया मुझ को मैं एक पागल सा आदमी हूँमगर ये पागल ये नीम-वहशी ख़िरद के मारों से मुख़्तलिफ़ हैजो कहना चाहा था कह न पायाकहा गया जो उसे ये दुनिया समझ न पाईन बात अब तक कही गई हैन बात अब तक सुनी गई हैशराब-ओ-शेर-ओ-शुऊ'र का जो इक तअ'ल्लुक़ है उस के बारे में राय क्या हैसुना है हम ने कि आप पर भी बहुत से फ़तवे लगे हैं लेकिनशराब-नोशी हराम है तोये मसअला भी बड़ा अजब हैमैं एक मय-कश हूँ ये तो सच हैमगर ये मय-कश कभी किसी के लहू से सैराब कब हुआ हैहमेशा आँसू पिए हैं उस ने हमेशा अपना लहू पिया हैये बहस छोड़ो हराम क्या है हलाल क्या है अज़ाब क्या है सवाब क्या हैशराब क्या हैअज़िय्यतों से नजात है ये हयात है येशराब-ओ-शब और शाइ'री ने बड़ा सहारा दिया है मुझ कोसँभाल रक्खा शराब ने और रही है मोहसिन ये रात मेरीइसी ने मुझ को दिए दिलासे सुनी है इस ने ही बात मेरीहमेशा मेरे ही साथ जागी हमेशा मेरे ही साथ सोईमैं ख़ुश हुआ तो ये मुस्कुराई मैं रो दिया तो ये साथ रोईये शेर-गोई है ख़ुद-कलामी का इक ज़रीयाइसी ज़रीये इसी वसीले से मैं ने ख़ुद से वो बातें की हैंजो दूसरों से मैं कह न पायाहराम क्या है हलाल क्या है ये सब तमाशे हैं मुफ़्तियों केये सारे फ़ित्ने हैं मौलवी केहराम कर दी थी ख़ुद-कुशी भी कि अपनी मर्ज़ी से मर न पाएये मय-कशी भी हराम ठहरी कि हम को अपना लहू भी पीने का हक़ नहीं हैकि अपनी मर्ज़ी से हम को जीने का हक़ नहीं हैकिसे बताएँज़मीर-ओ-ज़र्फ-ए-बशर पे मौक़ूफ़ हैं मसाइलसमुंदरों में उंडेल जितनी शराब चाहेन हर्फ़ पानी पे आएगा और न उस की तक़्दीस ख़त्म होगीतो मय-कशी को हराम कहने से पहले देखोकि पीने वाले का ज़र्फ़ क्या है हैं किस के हाथों में जाम-ओ-मीनाये नुक्ता-संजी ये नुक्ता-दानी जो मौलवी की समझ में आती तो बात बनतीन दीन-ओ-मज़हब को जिस ने समझा न जिस ने समझा है ज़िंदगी कोतहूरा पीने की बात कर के हराम कहता है मय-कशी कोजो दीन-ओ-मज़हब का ज़िक्र आया तो मैं ने पूछाकि इस हवाले से राय क्या हैये ख़ुद-परस्ती ख़ुदा-परस्ती के दरमियाँ का जो फ़ासला हैजो इक ख़ला है ये क्या बला हैये दीन-ओ-मज़हब फ़क़त किताबेंब-जुज़ किताबों के और क्या हैकिताबें ऐसी जिन्हें समझने की कोशिशें कम हैं और ज़ियादा पढ़ा गया हैकिताबें ऐसी कि आम इंसाँ को इन के पढ़ने का हक़ है लेकिनइन्हें समझने का हक़ न हरगिज़ दिया गया हैकि इन किताबों पे दीन-ओ-मज़हब के ठेकेदार इजारा-दारों की दस्तरस हैइसी लिए तो ये दीन-ओ-मज़हब फ़साद-ओ-फ़ित्ना बने हुए हैंये दीन-ओ-मज़हबजो इल्म-ओ-हिकमत के साथ हो तो सुकून होगाजो दस्तरस में हो जाहिलों की जुनून होगाये इश्क़ क्या है ये हुस्न क्या हैये ज़िंदगी का जवाज़ क्या हैये तुम हो जी जी के मर रहे हो ये मैं हूँ मर मर के जी रहा हूँये राज़ क्या हैहै क्या हक़ीक़त मजाज़ क्या हैसिवाए ख़्वाबों के कुछ नहीं हैब-जुज़ सराबों के कुछ नहीं हैये इक सफ़र है तबाहियों का उदासियों की ये रहगुज़र हैन इस को दुनिया का इल्म कोई न इस को अपनी कोई ख़बर हैकभी कहीं पर नज़र न आए कभी हर इक शय में जल्वा-गर हैकभी ज़ियाँ है कभी ज़रर हैन ख़ौफ़ इस को न कुछ ख़तर हैकभी ख़ुदा है कभी बशर हैहुआ हक़ीक़त से आश्ना तो ये सू-ए-दार-ओ-रसन गया हैकभी हँसा है ये ज़ेर-ए-ख़ंजर कभी ये सूली पे हँस दिया हैकभी ये गुलनार हो गया है सिनाँ पे गुफ़्तार हो गया हैकभी हुआ है ये ग़र्क़-ए-दरियाकभी ये तक़्दीर-ए-दश्त-ओ-सेहरारक़म हुआ है ये आंसुओं मेंकभी लहू ने है इस को लिक्खाहिकायत-ए-दिल हिकायत-ए-जाँ हिकायत-ए-ज़िन्दगी यही हैअगर सलीक़े से लिक्खी जाए इबारत-ए-ज़िन्दगी यही हैये हुस्न है उस धनक की सूरतकि जिस के रंगों का फ़ल्सफ़ा ही कभी किसी पर नहीं खुला हैये फ़ल्सफ़ा जो फ़रेब-ए-पैहम का सिलसिला हैकि इस के रंगों में इक इशारा है बे-रुख़ी काइक इस्तिआ'रा है ज़िंदगी काकभी अलामत है शोख़ियों कीकभी किनाया है सादगी काबदलते मौसम की कैफ़ियत के हैं रंग पिन्हाँ इसी धनक मेंकशिश शरारत-ओ-जाज़बिय्यत के शोख़ रंगों ने इस धनक को अजीब पैकर अता किया है इक ऐसा मंज़र अता किया हैकि जिस के सेहर-ओ-असर में आ करलहू बहुत आँखें रो चुकी हैं बहुत तो बीनाई खो चुकी हैंबसारतें क्या बसीरतें भी तो अक़्ल-ओ-दानाई खो चुकी हैंन जाने कितने ही रंग मख़्फ़ी हैं इस धनक मेंबस एक रंग-ए-वफ़ा नहीं हैंइस एक रंगत की आरज़ू ने लहू रुलाया है आदमी कोयही बताया है आगही कोये इक छलावा है ज़िंदगी काहसीन धोका है ज़िंदगी कामगर मुक़द्दर है आदमी काफ़रेब-ए-गंदुम समझ में आया तो मैं ने जानाये इश्क़ क्या है ये हुस्न क्या हैये एक लग़्ज़िश है जिस के दम से हयात-ए-नौ का भरम खुला है
अपनी दीवानगी-ए-शौक़ पे हँसता भी हूँ मैंऔर फिर अपने ख़यालात में खो जाता हूँतुझ को अपनाने की हिम्मत है न खो देने का ज़र्फ़कभी हँसते कभी रोते हुए सो जाता हूँ मैं
वो सर्द रात जबकि सफ़र कर रहा था मैंरंगीनियों से जर्फ़-ए-नज़र भर रहा था मैंतेज़ी से जंगलों में उड़ी जा रही थी रेलख़्वाबीदा काएनात को चौंका रही थी रेलमुड़ती उछलती काँपती चिंघाड़ती हुईकोहरे की वो दबीज़ रिदा फ़ाड़ती हुईपहियों की गर्दिशों में मचलती थी रागनीआहन से आग बन के निकलती थी रागनीपहुँची जिधर ज़मीं का कलेजा हिला दियादामन में तीरगी के गरेबाँ बना दियाझोंके हवा के बर्फ़ बिछाते थे राह मेंजल्वे समा रहे थे लरज़ कर निगाह मेंधोके से छू गईं जो कहीं सर्द उँगलियाँबिच्छू सा डंक मारने लगती थीं खिड़कियाँपिछले पहर का नर्म धुँदलका था पुर-फ़िशाँमायूसियों में जैसे उमीदों का कारवाँबे-नूर हो के डूबने वाला था माहताबकोहरे में खुप गई थी सितारों की आब-ओ-ताबक़ब्ज़े से तीरगी के सहर छूटने को थीमशरिक़ के हाशिए में किरन फूटने को थीकोहरे में था ढके हुए बाग़ों का ये समाँजिस तरह ज़ेर-ए-आब झलकती हों बस्तियाँभीगी हुई ज़मीं थी नमी सी फ़ज़ा में थीइक किश्त-ए-बर्फ़ थी कि मुअल्लक़ हवा में थीजादू के फ़र्श सेहर के सब सक़्फ़-ओ-बाम थेदोश-ए-हवा पे परियों के सीमीं ख़ियाम थेथी ठंडे ठंडे नूर में खोई हुई निगाहढल कर फ़ज़ा में आई थी हूरों की ख़्वाब-गाहबन बन के फेन सू-ए-फ़लक देखता हुआदरिया चला था छोड़ के दामन ज़मीन काइस शबनमी धुँदलके में बगुले थे यूँ रवाँमौजों पे मस्त हो के चलें जैसे मछलियाँडाला कभी फ़ज़ाओं में ख़त खो गए कभीझलके कभी उफ़ुक़ में निहाँ हो गए कभीइंजन से उड़ के काँपता फिरता था यूँ धुआँलेता था लहर खेत में कोहरे के आसमाँउस वक़्त क्या था रूह पे सदमा न पूछिएयाद आ रहा था किस से बिछड़ना न पूछिएदिल में कुछ ऐसे घाव थे तीर-ए-मलाल केरो रो दिया था खिड़की से गर्दन निकाल के
तबीअत जब्रिया तस्कीन से घबराई जाती हैहँसूँ कैसे हँसी कम-बख़्त तू मुरझाई जाती हैबहुत चमका रहा हूँ ख़ाल-ओ-ख़त को सई-ए-रंगीं सेमगर पज़मुर्दगी सी ख़ाल-ओ-ख़त पर छाई जाती हैउमीदों की तजल्ली ख़ूब बरसी शीशा-ए-दिल परमगर जो गर्द थी तह में वो अब तक पाई जाती हैजवानी छेड़ती है लाख ख़्वाबीदा तमन्ना कोतमन्ना है कि उस को नींद ही सी आई जाती हैमोहब्बत की निगूँ-सारी से दिल डूबा सा रहता हैमोहब्बत दिल की इज़्मेहलाल से शर्माई जाती हैफ़ज़ा का सोग उतरा आ रहा है ज़र्फ़-ए-हस्ती मेंनिगाह-ए-शौक़ रूह-ए-आरज़ू कजलाई जाती हैये रंग-ए-मय नहीं साक़ी झलक है ख़ूँ-शूदा दिल कीजो इक धुँदली सी सुर्ख़ी अँखड़ियों में पाई जाती हैमिरे मुतरिब न दे लिल्लाह मुझ को दावत-ए-नग़्माकहीं साज़-ए-ग़ुलामी पर ग़ज़ल भी गाई जाती है
मोहब्बत ज़िंदगी हैमोहब्बत दिल की तीरा साअ'तों में रौशनी हैये वीरानों में ख़ुद-रौ नग़्मगी हैमोहब्बत जुरअत-ए-इज़हार है किरदार हैमोहब्बत दीदा-ए-बेदार है पिंदार हैईसार हैमोहब्बत जान देती हैमोहब्बत मान देती हैमोहब्बत बे-निशाँ रिश्तों को भी पहचान देती हैमोहब्बत अक़्ल भी हैमोहब्बत मावरा-ए-अक़्ल भी हैमोहब्बत हिज्र भी है वस्ल भी हैमोहब्बत पेश-रफ़्त-ए-नस्ल भी हैमोहब्बत ज़ख़्म पर मरहममोहब्बत सर-बसर तरह्हुममोहब्बत मोहतरम सच का इल्म ज़ोर-ए-क़लममोहब्बत काविश-ए-पैहममोहब्बत राज़ यज़्दाँ खोलती हैमोहब्बत ज़र्फ़-ए-आदम तोलती हैमोहब्बत ख़ामुशी में बोलती हैमोहब्बत आरज़ू है जुस्तुजू है रंग-ओ-बू हैमोहब्बत जीत कर मिटने की ख़ू हैमोहब्बत हार कर भी सुर्ख़-रू हैमोहब्बत इब्तिदा है इंतिहा हैमोहब्बत बाइ'स-ए-अर्ज़-ओ-समा हैमोहब्बत में ख़ुदा भी मुब्तला है
मुकद्दर है फ़ज़ा-ए-आलम-ए-इम्काँ सियासत सेबहुत बे-आबरू है आज-कल इंसाँ सियासत सेज़मीर-ओ-ज़र्फ़ की उस के यहाँ क़ीमत नहीं कोईजहाँ में दर-ब-दर हैं साहब-ए-ईमाँ सियासत सेये एहसासात-ए-तहज़ीब-ओ-तमद्दुन को मिटाती हैसियासत आज-कल की कैसे कैसे गुल खिलाती हैनहीं शेवा सियासत का मोहब्बत और रवादारीसिखाती है परस्तारों को अपने ये रिया-कारीन इस का कोई मस्लक है न इस का कोई मज़हब हैदिल-ए-हर्स-ओ-हवस में बन के रहती है ये चिंगारीकिसी का घर गिराती है किसी का घर सजाती हैसियासत आज-कल की कैसे कैसे गुल खिलाती हैलड़ाती है यही इक दूसरे को ज़ात-ओ-मज़हब परइसी की शह पे क़त्ल-ए-आम होता है यहाँ अक्सररऊनत ये सिखाती है मुनाफ़िक़ हुक्मरानों कोइसी के बत्न से होते हैं पैदा जब्र-ओ-ज़ुलम-ओ-शरये अपने मुहसिनों का ख़ून पी कर मुस्कुराती हैसियासत आज-कल की कैसे कैसे गुल खिलाती हैसदा ये इत्तिहाद-ए-बाहमी पर वार करती हैतअ'स्सुब को हवा देती है दिल बेज़ार करती हैकहीं ता'मीर करती है इबादत-गाह फ़ित्नों सेकहीं ख़ुद ही इबादत-गाह को मिस्मार करती हैफ़रेब-ओ-मक्र से अपने ये हर-सू क़हर ढाती हैसियासत आज-कल की कैसे कैसे गुल खिलाती हैइसी के दम से फ़स्लें लहलहाती हैं फ़सादों कीयही तकमील करती है हुकूमत के इरादों कीइसी की मस्लहत से बुग़्ज़ के पौदे पनपते हैंगिरा देती है ये दीवार बाहम एतिमादों कीहवा दे कर ये बद-उनवानियों की लौ बढ़ाती हैसियासत आज-कल की कैसे कैसे गुल खिलाती हैइशारे पर इसी के शहर क़स्बे गाँव जलते हैंइसी की आस्तीं में साज़िशों के नाग पलते हैंसितमगारों पे करती है ये साया अपने आँचल काइसी की आड़ में अशरार-ओ-क़ातिल बच निकलते हैंये क़ानून-ओ-अदालत को भी अब आँखें दिखाती हैसियासत आज-कल की कैसे कैसे गुल खिलाती हैजसारत को यही दहशत-गरी का नाम देती हैये हम-साए को ख़ुद ही जंग का पैग़ाम देती हैबदलती है यही तक़दीर अर्बाब-ए-क़यादत कीये अपने वारिसों को सरख़ुशी का जाम देती हैये वा'दों के घरौंदे रेगज़ारों में बनाती हैसियासत आज-कल की कैसे कैसे गुल खिलाती है
नग़मा-ए-तकल्लुम मेंज़ेर-ओ-बम कई ग़लताँज़र्फ़ और ज़राफ़त केज़ेर-ए-लब तबस्सुम सेखुल के मुस्कुराने तकपेच-ओ-ख़म कई लर्ज़ांइख़तियार-ओ-आदत के
ज़र्फ़ बाक़ी न कोई अज़्म-ए-निहाँ बाक़ी हैसिर्फ़ एहसास के चेहरे पे धुआँ बाक़ी हैकोई साया है न साथी है न महफ़िल कोईदिलकशी ख़त्म है फिर क्यूँ ये जहाँ बाक़ी है
मैं ने इंटरव्यू किया कल एक रोज़ा-ख़ोर सेमैं ज़बाँ से बोलता था वो शिकम के ज़ोर सेमैं ने पूछा आप ने रोज़ा ये क्यूँ रक्खा नहींपेट दिखलाने लगा बोला कि यूँ रखा नहींरोज़ा यूँ रक्खा नहीं चलती नहीं बाद-ए-सबामौसम-ए-गर्मा में रोज़े आए हैं इस मर्तबाजॉब करनी है ज़रूरी काम करना है मुझेकोक पिज़्ज़ा के सहारे शाम करना है मुझेमैं ने लस्सी के गिलासों में पिया कुछ और हैदोपहर में मुर्ग़ खाने का मज़ा कुछ और हैदिन में खाने के लिए इक़रार कर लेता हूँ मैंशाम को मस्जिद में भी इफ़्तार कर लेता हूँ मैंकोई शय खाते हुए मैं ने छुपाई ही नहींआज तक मेरी हुई रोज़ा-कुशाई ही नहींरोज़ा-ख़ोरी पर मिरी दुनिया को हैरानी नहींरोज़ा यूँ रक्खा नहीं बिजली नहीं पानी नहींमैं जो बे-रोज़ा हूँ ये भी ताजिरों का ज़र्फ़ हैसौ रूपे उजरत है मेरी सौ रूपे का बर्फ़ हैरूह-अफ़्ज़ा के बिना दुनिया की हूरें रह गईंरोज़ा-दारों के लिए सूखी खजूरें रह गईंरोज़ा यूँ रक्खा नहीं हो जाएगा खाना ख़राबलंच पर आएगी कल होटल में रश्क-ए-माहताबमैं हूँ शायर मेहरबाँ है मुझ पे ख़ल्लाक़-ए-अज़लपेश करनी है मुझे महफ़िल में इक ताज़ा ग़ज़लअज्र-ए-रोज़ा क्या है ये शेरों में बतलाऊँगा मैंलंच मैं इफ़्तार की तशरीह बन जाऊँगा मैंभूक और शायर का चूँ-कि चोली-दामन का है साथमुझ से बढ़ के जानता है कौन रोज़ा की सिफ़ातपंद्रह घंटे का रोज़ा हर जवान ओ पीर काशाम करना सुब्ह का लाना है जू-ए-शीर का
सारा आलम भीग रहा था बारिश मेंअपने अपने ज़र्फ़ में, अपनी ख़्वाहिश मेंशराबोर थे हम दोनों रफ़्ता रफ़्ताअंदर बाहर भीग गए जस्ता जस्ताजज़्बों का साबुन, एहसास का पानी था
हर्फ़ के तार में जितने आँसू पिरोए गएदर्द उन से फ़ुज़ूँ थासुनो तो कहूँतुम कहो तो कहूँ ज़र्फ़ की दास्ताँखेतियों को गिला बादलों से नहीं सूरजों से भी थाबाज़ूओं से भी था हल पकड़ने से पहले ही जो थक गएकिश्त-ए-ज़र-ख़ेज़ पर आब-ए-नमकीन जम सा गयारक़्स थम सा गयाएड़ियाँ घूमते घूमते रुक गईंअश्क रुख़्सार की घाटियों से गिरा मुंजमिद हो गयारंग ख़ुश्बू बना तो हवा चल पड़ीख़्वाब नाता बना तो खुली खिड़कियों में सलाख़ें उगींहाथ ज़ख़्मी हुएकिस के कश्कोल से कितने सिक्के गिरेहिज्र कैसा परिंदे की आँखों में थाघाव कैसे पहाड़ों के सीने पे थेआइना गुंग थाफ़र्श पर अक्स धम से गिराकिर्चियाँ हो गयातुम कहो तो गिनूँतुम कहो तो चुनूँतुम कहो तो सुनूँ इन खुले फूल की धड़कनेंगुम-शुदा तितलियों की सदाज़र्द टहनी के होंटों पे रक्खी हुई बद-दुआ'आसमानों की दहलीज़ पर फेंक दूँतुम कहो तो दिखाऊँ तुम्हेंइक तमाशा कि जो मेरी मुट्ठी में हैएक गर्दन कि जो ग़म के फंदे में हैसाँस चलती भी है और चलती नहींजाँ निकलती नहीं
बहुत छोटी सी इक तक़रीब रखी हैये दुनिया हैलिहाज़ा हस्ब-ए-ख़्वाहिश कुछ यहाँ हो कर नहीं देतासो ये तक़रीब जाने हो न होपर तुम ज़रूर आनातुम आनाआरज़ू की बात होगीज़िंदगी पर तब्सिरे होंगेवहाँ रुकनाजहाँ फूलों की संगत में रविश पर दिल धरे होंगेक़बा-ए-चाक पहने कुछ कुशादा-ज़र्फ़ इस्तिक़बाल को बाहर खड़े होंगेतुम्हें जो रंग भी भाए पहन आनातुम्हें जो भेस ख़ुश आएदबे पाँवहवा के दोष परया चाँद की किरनों पे चल करपा-पियादा हर्फ़ हाथों में उठाए या तही-दामाँकिसी सूरत भी आनाबस चले आनाबहुत छोटी सी इक तक़रीब रखी हैन अब शब-ज़ादगी से कोई शिकवान ज़माने के तग़ाफ़ुल से शिकायत हैज़रूर आना मिरे ग़म की निहायत है
ये जो बौने ख़ुदा बने हैं अजीब शय से जो लग रहे हैंहैं दर-हक़ीक़त ये आदमी ही बस उन की ख़सलत जुदा है थोड़ीअना जो उन की कुचल चुकी है ज़मीर उन का जो मर गया हैये सच है ज़ेहनी ग़ुलाम हैं अब ख़बासतों के इमाम हैं येहमेशा झुक कर मिले दनी से सना में रतब-उल-लिसान हो करगुनह को उन के सवाब जाना फ़रेब को ला-जवाब कह करउन्ही को आक़ा उन्ही को मालिक उन्ही को अपना ख़ुदा भी मानाउन्ही के हाथों जिस्म-ओ-जाँ को ख़ुदी को ईमाँ को बेच डालाबनाम-ए-इल्म-ओ-अदब जो पायाअबदुल्लाह-इब्न-ए-उबय की दौलत अबू-जहल की वो ख़ासियत हैजो चाहें उन को कुछ और कह लें जो चाहें इंसाँ फिर भी समझेंमगर ये सच है लईन हैं येकम-ज़र्फ़ और हक़ीर हैं येये दानाओं के हक़ को यकसर ग़बी को मोहमल को बेचते हैंये क़ौम-ओ-मिल्लत का नाम ले कर उसूल-ओ-मज़हब की बात कह करनस्लें कितनी तबाह कर के खेतियाँ अपनी सींचते हैंऔर हबाब दिल में बैठामैं देखता हूँ ये सोचता हूँहै कौन मुजरिम इन में आख़िरजो आक़ा मालिक बना हुआ थाया वो जो बौना ख़ुदा बना हैया फिर वो दाना शिकस्त खा करइधर उधर जो भटक रहे हैंया वो ग़बी जो हक़ चुरा करख़ुदा के ख़ित्ते में आ बसे हैंया मैंकि तन्हा मुहीत-ए-दिल मेंमहज़ तमाशा-बीं बना हूँ
मैं आज तुम से मुख़ातिब हूँ मेरे हम-वतनोकि तब'-ए-शिकवा-ए-ग़म आज कुछ ज़ियादा हैमिज़ाज अपना तुनुक-ज़र्फ़ तो नहीं लेकिनवतन में ज़ोर-ओ-सितम आज कुछ ज़ियादा है
कौन ज़ंजीर तोड़ सकता हैकिस में हिम्मत है तुम से लड़ने कीकिस में जुरअत है सर उठाने कीकौन बाग़ी तुम्हारी ज़ात से होकिस सितमगर को जान प्यारी नहींजान है तो जहान है प्यारेलोग ज़िंदा रहेंगे लालच मेंकि किसी रोज़ वक़्त आएगाएक लश्कर मसर्रतों का लिएऔर तह-ए-तेग़ कर के रख देगाग़म की फ़ौजों को क़हर के दिल कोऔर ये बे-निशान क़ैदी भीइसी झूले में छूट जाएँगेसिलसिले दुख के टूट जाएँगेतुम मगर फ़िक्र मत करो जानाँये तो लालच है ज़िंदा रहने काख़्वाब है मुर्दा ज़र्फ़ लोगों कावक़्त मज़लूम का नहीं होतातुम परेशान मत हो जान-ए-जाँतुम से मुँह कौन मोड़ सकता हैकौन ज़ंजीर तोड़ सकता है
हम अजनबी थे मुसाफ़िर थे ख़ाना-वीराँ थेऔर इस अलाव के रक़्साँ हिनाई बातों नेबुला लिया हमें अपने हसीं इशारों सेतो इस की रौशनी-ए-अहमरीं की ताबिश मेंख़ुद अपने आप को इक दूसरे से पहचानाकि हम वो ख़ाना-बदोशान-ए-ज़ीस्त हैं जिन कोअज़ल से अपने ही जैसे मुसाफ़िरों की तलाशकिए हुए है इन्ही दश्त-ओ-दर में सर-गरदाँहमारी अपनी सदा अजनबी थी अपने लिएदिलों ने पहले-पहल ज़ेर-ए-लब कहा हम सेकि अहल-ए-ज़र्फ़-ओ-ग़रीबान-ए-शहर-ए-एहसासाततरस रहे हैं सुख़न-हा-ए-ग़ुफ़्तनी के लिएऔर इस अलाव के शो'लों ने हम से बातें कींहमारी गुंग ज़बानों को फिर ज़बानें दींऔर अपनी अपनी सुनाईं कहानियाँ हम नेकहानियाँ जो हक़ीक़त में एक जैसी थीं
पत्थर के सरापाउन कीपत्थर ख़ामोशीइक चकना-चूर छनाकाशीशे का ज़र्फ़ था कोई
हर रोज़ कर रहे हैं शरारत नई नईवो लोग जिन से शर्म-ए-रसूल-ए-ख़ुदा गईजिन के ज़मीर-ओ-ज़र्फ़ पे तख़्लीक़ शर्मसारजिन के दिल-ओ-दिमाग़ का साँचा है सुरमईक्या पूछते हो उम्मत-ए-अहमद-रज़ा का हालअंदर से दाग़-दार तो बाहर से चम्पईरीश-ए-दराज़ ज़ुल्फ़-ए-चलीपा से फ़ैज़याबउस लोबत-ए-फ़रंग के शौहर कई कईमस्लक में उन के आनरेरी मुख़बिरी हलालमज़हब है इस ज़लील घरौंदे का नुक़रईमाथे पे फ़र्श-ए-बोस-ए-रिवायात का ग़ुबारचेहरा ब-फ़ैज़-ए-हल्क़ा-ए-उश्शाक़ अगरईहम ऐसे कुश्तगान-ए-वफ़ा के ख़िलाफ़ हैं'असरार' ख़ानदान-ए-कलायू के मुजरई
दिल है पहलू में तो पैदा शेवा-ए-तुरकाना करजौर हफ़्त-अफ़्लाक के होते रहें परवा न करग़म को ख़ुद आकर बहा जाएगी मौज-ए-सुरूरदेखता क्या है उठ और फ़िक्र-ए-मय-ओ-पैमाना करदा'वा-ए-उल्फ़त जता कर मुफ़्त में रुस्वा न होदार पर चढ़ने से पहले राज़-ए-इश्क़ अफ़्शा न करज़र्फ़-ए-नैसाँ चाहती है क़ुल्ज़ुम-आशामी तिरीबर्ग-ए-गुल की तरह शबनम के लिए तरसा न करकाम इब्राहीमियों का है कि खेलें आग सेकूद पड़ शो'लों में ख़ौफ़ अंजाम का असला न करले के नाम अल्लाह का तूफ़ाँ में कश्ती डाल देख़ौफ़-ए-बे-पायानी-ए-दरिया-ए-मौज-अफ़ज़ा न करख़ुद अमल तेरा है सूरत-गर तिरी तक़दीर काशिकवा करना हो तो अपना कर मुक़द्दर का न करसाया-ए-शमशीर में पोशीदा जन्नत है मगरना-कसों के सामने इस भेद का चर्चा न कर
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