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नज़्म
शीशा-ए-मह से छलक कर मय-ए-तुंद-ओ-बे-दर्द
उस के माथे से चुरा लेती है सोने की डलक
मुख़्तार सिद्दीक़ी
नज़्म
लफ़्ज़ के अंधे कुएँ में मा'नी का तारा भी आता नहीं है नज़र
लफ़्ज़ गौतम का इरफ़ाँ नहीं
करीम रूमानी
नज़्म
एक तितली ने कहा हुस्न-ओ-अदा है ज़िंदगी
मस्त-ओ-बे-ख़ुद हँस के बोला मै-कदा है ज़िंदगी
शाहीन भट्टी
नज़्म
ठहर ऐ जज़्बा-ए-बे-ताब इसी रंगीन दुनिया में
लबों की सुर्ख़ मय से दिल के ख़ाली जाम को भर लें
ओवेस अहमद दौराँ
नज़्म
ज़मज़मे का इत्र कैफ़-ए-नग़्मा लय की पुख़्तगी
शोरिश-ए-मय, लग़्ज़िश-ए-मय-नोश, जोश-ए-बे-ख़ुदी
शाद आरफ़ी
नज़्म
बे-फ़िक्र ज़िंदगी थी ख़ुद होश मुझ को कब था
इक कैफ़-ए-बे-ख़ुदी था मस्त-ए-मय-ए-तरब था
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
नज़्म
कि नहीं है मिरे अन्फ़ास में बू-ए-मय-ए-जाम
चमन-ए-दहर की तक़दीर कि मैं हूँ वो घटा