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नज़्म
औज-ए-अफ़्लाक पे है माँग की अफ़्शाँ की दमक
शीशा-ए-मह से छलक कर मय-ए-तुंद-ओ-बे-दर्द
मुख़्तार सिद्दीक़ी
नज़्म
लफ़्ज़ के अंधे कुएँ में मा'नी का तारा भी आता नहीं है नज़र
लफ़्ज़ गौतम का इरफ़ाँ नहीं
करीम रूमानी
नज़्म
ठहर ऐ जज़्बा-ए-बे-ताब इसी रंगीन दुनिया में
लबों की सुर्ख़ मय से दिल के ख़ाली जाम को भर लें
ओवेस अहमद दौराँ
नज़्म
एक तितली ने कहा हुस्न-ओ-अदा है ज़िंदगी
मस्त-ओ-बे-ख़ुद हँस के बोला मै-कदा है ज़िंदगी
शाहीन भट्टी
नज़्म
ज़मज़मे का इत्र कैफ़-ए-नग़्मा लय की पुख़्तगी
शोरिश-ए-मय, लग़्ज़िश-ए-मय-नोश, जोश-ए-बे-ख़ुदी
शाद आरफ़ी
नज़्म
बे-फ़िक्र ज़िंदगी थी ख़ुद होश मुझ को कब था
इक कैफ़-ए-बे-ख़ुदी था मस्त-ए-मय-ए-तरब था
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
नज़्म
वो इल्म में अफ़लातून सुने वो शेर में तुलसीदास हुए
वो तीस बरस के होते हैं वो बी-ए एम-ए पास हुए
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
कि नहीं है मिरे अन्फ़ास में बू-ए-मय-ए-जाम
चमन-ए-दहर की तक़दीर कि मैं हूँ वो घटा