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नज़्म
कभी मोहब्बत ने ये कहा था मैं एक महबूब आदमी हूँ
मगर वो ज़र्ब-ए-जफ़ा पड़ी है कि एक मज़रूब आदमी हूँ
तारिक़ क़मर
नज़्म
होना है जो ख़ूबी से ज़ियाफ़त का सर-अंजाम
लड़की के ज़रिए से भी पहुँचाती हैं पैग़ाम
अली मंज़ूर हैदराबादी
नज़्म
क़ाज़ी सलीम
नज़्म
सधाने के लिए इंतिज़ामिया की यौमिया और
हफ़्ता-वार मीटिंग के ज़रीये बे-मुहाबा जानवरों को
सरवत ज़ेहरा
नज़्म
ज़मीर-ए-लाला में रौशन चराग़-ए-आरज़ू कर दे
चमन के ज़र्रे ज़र्रे को शहीद-ए-जुस्तुजू कर दे
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
अपनी दुनिया आप पैदा कर अगर ज़िंदों में है
सिर्र-ए-आदम है ज़मीर-ए-कुन-फ़काँ है ज़िंदगी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
आलम-ए-आब-ओ-ख़ाक में तेरे ज़ुहूर से फ़रोग़
ज़र्रा-ए-रेग को दिया तू ने तुलू-ए-आफ़्ताब!