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नज़्म
संगीन हक़ाइक़-ज़ारों में ख़्वाबों की रिदाएँ जलती हैं
और आज जब इन पेड़ों के तले फिर दो साए लहराए हैं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
हुई जुम्बिश अयाँ ज़र्रों ने लुत्फ़-ए-ख़्वाब को छोड़ा
गले मिलने लगे उठ उठ के अपने अपने हमदम से
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
काले कोस ग़म-ए-उल्फ़त के और मैं नान-ए-शबीना-जू
कभी चमन-ज़ारों में उलझा और कभी गंदुम की बू
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
मुर्ग़-ज़ारों में दिखाती जू-ए-शीरीं का ख़िराम
वादियों में अब्र के मानिंद मंडलाती हुई