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नज़्म
कुछ इस तरह से बढ़ा दिल में ज़ौक़-ए-आज़ादी
कि रफ़्ता रफ़्ता तमन्ना जवान होती गई
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
मजीद अमजद
नज़्म
तेरी फ़ुर्क़त दिल-ए-मायूस पे इक तुर्फ़ा सितम
तेरी फ़ुर्क़त सबब-ए-काविश-ओ-बेदारी-ए-ग़म
शकील बदायूनी
नज़्म
इक जहाँ जिस में न हो इल्म-ओ-ख़िरद की दार-ओ-गीर
हो न जिस में काविश-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ मेरे लिए
जलील क़िदवई
नज़्म
तेरी बातों में तिरा फ़न तेरे फ़न में तेरी बात
क्यूँ हो तेरे बाब में फिर काविश-ए-ज़ात-ओ-सिफ़ात
नाज़िश प्रतापगढ़ी
नज़्म
कार-फ़रमा फिर मिरा ज़ौक़-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी है आज
फिर नफ़स का साज़-ए-गर्म-ए-शो'ला-अफ़्शानी है आज
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
जोश मलीहाबादी
नज़्म
ज़ौक़-ए-तकल्लुम पर उर्दू ने राह अनोखी खोली है
रंग की गहराई नापी है फूल की ख़ुशबू तोली है
हुरमतुल इकराम
नज़्म
है जिन में ज़ौक़-ए-आज़ादी वो ज़िंदानों में रहते हैं
वही बस्ती बसाते हैं जो वीरानों में रहते हैं
तकमील रिज़वी लखनवी
नज़्म
तेरी नज़र में हैं तमाम मेरे गुज़िश्ता रोज़ ओ शब
मुझ को ख़बर न थी कि है इल्म-ए-नख़ील बे-रुतब!
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मुझे होश ही नहीं कुछ कि मैं शाद हूँ कि 'नाशाद'
है सुरूर-ए-मय से बढ़ कर मिरा ज़ौक़-ए-शाइ'राना