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नज़्म
तुझ को अपनाने की हिम्मत है न खो देने का ज़र्फ़
कभी हँसते कभी रोते हुए सो जाता हूँ मैं
हिमायत अली शाएर
नज़्म
उँगलियाँ ख़ून से तर दिल-ए-कम-ज़र्फ़ को है वाहम-ए-अर्ज़-ए-हुनर
दिन की हर बात हुई बे-तौक़ीर
उबैदुल्लाह अलीम
नज़्म
ज़ोफ़ दिखलाई है जब भी फ़ितरत-ए-अहरार ने
आग बरसा दी है तेरे नुत्क़-ए-गौहर-बार ने
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
ज़मीर-ओ-ज़र्फ़ की उस के यहाँ क़ीमत नहीं कोई
जहाँ में दर-ब-दर हैं साहब-ए-ईमाँ सियासत से
रहबर जौनपूरी
नज़्म
पीठ पर नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त इक बार-ए-गराँ
ज़ोफ़ से लर्ज़ी हुई सारे बदन की झुर्रियाँ
सीमाब अकबराबादी
नज़्म
मैं जो बे-रोज़ा हूँ ये भी ताजिरों का ज़र्फ़ है
सौ रूपे उजरत है मेरी सौ रूपे का बर्फ़ है
खालिद इरफ़ान
नज़्म
न किब्र-सिनी न ज़ोफ़ न लाचारी से पनाह माँगूँगा
न दुनिया जहान की ख़ुशियाँ न शान-ओ-शौकत ही
अबु बक्र अब्बाद
नज़्म
सर-ब-सर इक मुज़्दा-ए-तसकीन-ए-मरदान-ए-ज़ईफ़
क़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-यारान-ए-जवाँ पैदा हुआ