aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "zidiile"
कैसे हर शाख़ से मुँह-बंद महकती कलियाँनोच ली जाती थीं तज़ईन-ए-हरम की ख़ातिरऔर मुरझा के भी आज़ाद न हो सकती थींज़िल्ल-ए-सुबहान की उल्फ़त के भरम की ख़ातिर
दुआ दुआ वो चेहराहया हया वो आँखेंसबा सबा वो ज़ुल्फ़ेंचले लहू गर्दिश मेंरहे आँख में दिल मेंबसे मिरे ख़्वाबों मेंजले अकेले-पन मेंमिले हर इक महफ़िल मेंदुआ दुआ वो चेहराकभी किसी चिलमन के पीछेकभी दरख़्त के नीचेकभी वो हाथ पकड़तेकभी हवा से डरतेकभी वो बारिश अंदरकभी वो मौज समुंदरकभी वो सूरज ढलतेकभी वो चाँद निकलतेकभी ख़याल की रौ मेंकभी चराग़ की लौ मेंदुआ दुआ वो चेहराकभी बाल सुखाए आँगन मेंकभी माँग निकाले दर्पन मेंकभी चले पवन के पाँव मेंकभी हँसे धूप में छाँव मेंकभी पागल पागल नैनों मेंकभी छागल छागल सीनों मेंकभी फूलों फूल वो थाली मेंकभी दियों भरी दीवाली मेंकभी सजा हुआ आईने मेंकभी दुआ बना वो ज़ीने मेंकभी अपने-आप से जंगों मेंकभी जीवन मौज-तरंगों मेंकभी नग़्मा नूर-फ़ज़ाओं मेंकभी मौला हुज़ूर दुआओं मेंकभी रुके हुए किसी लम्हे मेंकभी दुखे हुए किसी चेहरे मेंवही चेहरा बोलता रहता हूँवही आँखें सोचता रहता हूँवही ज़ुल्फ़ें देखता रहता हूँदुआ दुआ वो चेहराहया हया वो आँखेंसबा सबा वो ज़ुल्फ़ें
मैं इक देवता-ए-अनानर्गिसिय्यत का मारा हुआऔर अज़ल से तकब्बुर में डूबा हुआकाफ़ी ख़ुद-सर हूँज़िद्दी हूँ मग़रूर हूँमेरे चारों तरफ़ मेरी अंधी अना की वो दीवार हैजिस में आने की और मुझ से मिलने की घुलने की कोई इजाज़त किसी को नहीं हैतुम्हें भी नहीं हैउसे भी नहीं हैमुझे भी नहीं हैमैं अपनी अना की दीवारों में तुम से अलग हो रहूँमुझ पे सजता भी है येमैं शाइ'र हूँ जो कि फ़ऊलुन फ़ऊलुन से बहर-ए-रमल तकहर इक नग़मगी का मुकम्मल ख़ुदा हूँमैं लफ़्ज़ों का आक़ातख़य्युल का ख़ालिक़मैं सारे ज़माने से यकसर जुदा हूँमुझे ज़ेब देता है मैं अपनी दीवार में इस तरह से मुक़य्यद रहूँयूँही सय्यद रहूँमुझ पे सजता है ये।पर जो कल शब तिरे शबनमी से तबस्सुम में लिपटी हुईइक नज़र बे-नियाज़ी से मुझ पर पड़ीतेरी पहली नज़र से मिरी जान-ए-जाँमेरी दीवार में इक गढ़ा पर पड़ गयाऔर ये ही नहीं मुझ पे वो ही नज़रजब दोबारा दोबारा दोबारा पड़ीमेरी दीवार में ज़लज़ले आ गएऔर रख़्ने शिगाफ़ों में ढलने लगेमेरे अंदर तलातुम वो आतिश-फ़िशाँवो बगूले वो तूफ़ाँ वो महशर बपा थाकि मैं वो कि जिस के तहम्मुल की हिकमत कीफ़हम-ओ-लताफ़त की तमसील शायद कहीं भी नहीं थीसुलगने लगाअपनी हिद्दत से ख़ुद ही पिघलने लगातुझ से कहना था ये कि मिरी जान-ए-जाँहर सितारे की अपनी कशिश होगी लेकिनख़लाओं में मुर्दा सितारों की क़िस्मतवो हॉकिंग की थ्योरी के काले गढ़ेवो वही वो कि जिन में है इतनी कशिश कि मकाँ तो मकाँवो ज़माँ को भी अपने लपेटे में ले लेंवो हॉकिंग की थ्योरी के काले गढ़ों की ग्रेविटी भीतेरी अंखों की गहरी कशिश के मुक़ाबिल में कुछ भी नहींऔर ये तो फ़क़त एक दीवार थीइस को गिरना ही थातेरी नज़रों से हारी है बिखरी पड़ी हैकि दीवार का रेज़ा-रेज़ा तिरी इक नज़र से मिरी जानउजड़ा पड़ा हैमैं जो देवता-ए-अना नर्गिसिय्यत का मारा हुआ वो जो ख़ुद-सर थाज़िद्दी था मग़रूर थाजो फ़ऊलुन फ़ऊलुन से बहर-ए-रमल तक हर इक नग़मगी का मुकम्मल ख़ुदा थातिरी इक नज़र से अनाओं के अर्श-ए-मुअ'ल्ला से सीधा तिरे पाँव में आ केबिखरा पड़ा है
ये झील वो है कि जिस के ऊपरहज़ारों इंसाँउफ़ुक़ के मुतवाज़ी चल रहे हैंउफ़ुक़ के मुतवाज़ी चलने वालों को पार लाती हैंवक़्त लहरेंजिन्हें तमन्ना, मगर, समावी ख़िराम की होइन्ही को पाताल ज़मज़मों की सदा सुनाती हैंवक़्त लहरेंउन्हें डुबोती हैं वक़्त लहरें!तमाम मल्लाह उस सदा से सदा हिरासाँ, सदा गुरेज़ाँकि झील में इक उमूद का चोर छुप के बैठा हैउस के गेसू उफ़ुक़ की छत से लटक रहे हैंपुकारता है: ''अब आओ, आओ!अज़ल से मैं मुंतज़िर तुम्हारामैं गुम्बदों के तमाम राज़ों को जानता हूँदरख़्त मीनार बुर्ज ज़ीने मिरे ही साथीमिरे ही मुतवाज़ी चल रहे हैंमैं हर हवाई-जहाज़ का आख़िरी बसेरासमुंदरों पर जहाज़-रानों का मैं किनाराअब आओ, आओ!तुम्हारे जैसे कई फ़सानों को मैं ने उन केअबद के आग़ोश में उतारा''तमाम मल्लाह इस की आवाज़ से गुरेज़ाँउफ़ुक़ की शाह-राह-ए-मुब्ताज़िल पर तमाम सहमे हुए ख़िरामाँमगर समावी ख़िराम वालेजो पस्त ओ बाला के आस्ताँ पर जमे हुए हैंउमूद के इस तनाब ही से उतर रहे हैंइसी को थामे हुए बुलंदी पे चढ़ रहे हैं!
मिरा कमरे से बस नींदों का रिश्ता थाऔर उस ज़ीने से ख़्वाबों काजो लहराता हुआ जाता था छत तकवो छतजहाँ से आसमाँ नज़दीक थाजहाँ आराम फ़रमाती थीं आँखेंवो आँखें जिन में सपने थेवो सपने जिन में दुनिया थीवो दुनिया जिस में सब कुछ थावही छतजहाँ पर एक चिड़िया की सुरीली चहचहाहट थीपतंगों की सजावट थीफ़लक की झिलमिलाहट थीमगर अफ़सोसवो चिड़िया जो सवेरे घर में सबसे पहले उठती थीकिसे मा'लूम था इक दिन वो ज़ेर-ए-दाम आएगीपतंग-ए-काग़ज़ी जो आसमाँ छूने ही वाली थीकिसे मा'लूम था वो लौट कर नाकाम आएगीफ़लक जिस पर तमन्नाओं के कितने चाँद रौशन थेकिसे मा'लूम था उस पर अमावस की भी कोई शाम आएगीवो छत जो घर का सबसे पुर-सुकूँ और प्यारा हिस्सा थीकिसे मा'लूम था वो ख़ुद-कुशी के काम आएगी
दर्द बे-रहम हैजल्लाद है दर्ददर्द कुछ कहता नहींसुनता नहींदर्द बस होता हैदर्द का मारा हुआरौंदा हुआजिस्म तो अब हार गयारूह ज़िद्दी हैलड़े जाती हैहाँफतीकाँपतीघबराई हुईदर्द के ज़ोर सेथर्राई हुईजिस्म से लिपटी हैकहती हैनहीं छोड़ूँगीमौतचौखट पे खड़ी है कब सेसब्र से देख रही है उस कोआज की रातन जाने क्या हो
काँप रहे हैं ज़ालिम सुल्ताँ टूट गए दिल जब्बारों केभाग रहे हैं ज़िल्ल-ए-इलाही मुँह उतरे हैं ग़द्दारों के
सुनदरिया अपनी मुट्ठी खोल रहा हैसुनकुछ पत्ते और पत्तों के साथ कुछ हवा उखड़ गई हैजंगल के पेड़ इरादेज़मीन को बोसा दे रहे हैंचाहते हैं दरिया को मुट्ठी का जाल लगाएँआँखें मंज़र तह करती जा रही हैंसमुंदर मिट्टी को चौकोर कर नहीं पा रहे सुनगली लय पे फुन्कार रही हैइस में जले हुए कपड़े फेंकज़ीने गलियों में धँसे जा रहे हैंजिस्मों से आँखें बाँध दी गई हैंबहते सितारे तुझे 'अक्स कर रहे हैंतेरे पास कोई चेहरा नहींबताजंगल से लौटने वालों के पासमेरे लफ़्ज़ थे या मूरतकई जन्म बा'द बात दोहराई हैमेरी बात में जाल मत लगा मेरी बात बताबताबोझल साए पे कितना वज़्न रखा गया थासुनमौत की चादर तुम्हारी आँखें नापना चाहती हैकंचे इस चादर को छेद छेद कर देंगेचादर मैं पहले ही सी कर लाई थीक्या पैमाना ज़ंग-आलूद थाये चादर तुम्हें मिट्टी से दूर रखेगीऐसी हद ऐसी हद से मेरा वुजूद इंकार करता हैतुम्हारा वुजूद तो परिंदे रट चुकेतुम्हारी ज़बान कहीं तुम्हारी मुहताज तो नहीं
किसे ख़बर कि हज़ारों मक़ाम रखता हैवो फ़क़्र जिस में है बे-पर्दा रूह-ए-क़ुरआनीख़ुदी को जब नज़र आती है क़ाहिरी अपनीयही मक़ाम है कहते हैं जिस को सुल्तानीयही मक़ाम है मोमिन की क़ुव्वतों का 'इयारइसी मक़ाम से आदम है ज़िल्ल-ए-सुब्हानीये जब्र-ओ-क़हर नहीं है ये 'इशक़-ओ-मस्ती हैकि जब्र-ओ-क़हर से मुमकिन नहीं जहाँबानीकिया गया है ग़ुलामी में मुब्तला तुझ कोकि तुझ से हो न सकी फ़क़्र की निगहबानीमिसाल-ए-माह चमकता था जिस का दाग़-ए-सुजूदख़रीद ली है फ़रंगी ने वो मुसलमानीहुआ हरीफ़ मह-ओ-आफ़ताब तू जिस सेरही न तेरे सितारों में वो दरख़्शानी
फ़िरदौस बनाए हुए सावन के महीनेइक गुल-रुख़ ओ नस्रीं-बदन ओ सर्व-ए-सही नेमाथे पे इधर काकुल-ए-ज़ोलीदा की लहरेंगर्दूं पे उधर अब्र-ए-ख़िरामाँ के सफ़ीनेमेंह जितना बरसता था सर-ए-दामन-ए-कोहसारइतने ही ज़मीं अपनी उगलती थी दफ़ीनेअल्लाह-रे ये फ़रमान कि इस मस्त हवा मेंहम मुँह से न बोलेंगे अगर पी न किसी नेवो मूनिस-ओ-ग़म-ख़्वार था जिस के लिए बरसोंमाँगी थीं दुआएँ मिरे आग़ोश-ए-तही नेगुल-रेज़ थे साहिल के लचकते हुए पौदेगुल-रंग थे तालाब के तर्शे हुए ज़ीनेबारिश थी लगातार तो यूँ गर्द थी मफ़क़ूदजिस तरह मय-ए-नाब से धुल जाते हैं सीनेदम भर को भी थमती थीं अगर सर्द हवाएँआते थे जवानी को पसीने पे पसीनेभर दी थी चटानों में भी ग़ुंचों की सी नर्मीइक फ़ित्ना-ए-कौनैन की नाज़ुक-बदनी नेगेती से उबलते थे तमन्ना के सलीक़ेगर्दूं से बरसते थे मोहब्बत के क़रीनेक्या दिल की तमन्नाओं को मरबूत किया थासब्ज़े पे चमकती हुई सावन की झड़ी नेबदली थी फ़लक पर कि जुनूँ-ख़ेज़ जवानीबूँदें थीं ज़मीं पर कि अँगूठी के नगीनेशाख़ों पे परिंदे थे झटकते हुए शहपरनहरों में बतें अपने उभारे हुए सीनेइस फ़स्ल में इस दर्जा रहा बे-ख़ुद ओ सरशारमयख़ाने से बाहर मुझे देखा न किसी नेक्या लम्हा-ए-फ़ानी था कि मुड़ कर भी न देखादी कितनी ही आवाज़ हयात-ए-अबदी ने
गए बरसों इक हासिल क्या!फ़क़त इक मोम-बत्ती तीन-सौ-पैंसठ दिनों मेंकेक के ज़ीने पे चढ़ती हैज़रा सी फूँक पर हम-राहियों के साथ बुझती हैधुआँ चकरा के रोशन-दान से बाहर निकलता हैछुरी की धार से कितने बरस काटूँ!हवा का आश्ना चेहरा मिरी आँखों में रहता हैगए लम्हों को दोहराती हवा तर्ज़-ए-मोहब्बत हैवो आए तो नए लम्हों की रस्सी थाम कर चल दूँकहीं अंदर रुकी फूंकें लबों तक आएँतो ये बत्तियाँ गुल होंअभी कल के दरीचे खुल नहीं पाएमनाज़िर धुँद में हैंआँसुओं से धुल नहीं पाए
जिस क़दर दुनिया में मख़्लूक़ात हैसब से अशरफ़ आदमी की ज़ात हैइस की पैदाइश में है उल्फ़त का राज़इस की हस्ती पर है ख़ुद ख़ालिक़ को नाज़इस की ख़ातिर कुल जहाँ पैदा हुआये ज़मीं ये आसमाँ पैदा हुआअक़्ल का जौहर इसे बख़्शा गयाइल्म का ज़ेवर इसे बख़्शा गयाइस के सर में है निहाँ ऐसा दिमाग़जिस में रौशन है लियाक़त का चराग़सोच कर हर काम कर सकता है येशेर को भी राम कर सकता है येये सफ़ाई से चटानें तोड़ देअपनी दानाई से दरिया मोड़ देमन-चला है इस की हिम्मत है बुलंदडाल सकता है सितारों पर कमंदइस को ख़तरों की नहीं पर्वा ज़राआग में कूदा ये सूली पर चढ़ाइस के हर अंदाज़ में ए'जाज़ हैअर्श तक इस नूर की परवाज़ हैइस की बातों में अजब तासीर हैख़ाक का पुतला नहीं इक्सीर हैये अगर नेकी के ज़ीने पर चढ़ेएक दिन सारे फ़रिश्तों से बढ़ेऔर अगर इस्याँ की दलदल में फँसेइस का दर्जा कम हो हैवानात सेये कभी रुई से बढ़ कर नर्म हैये कभी सूरज से बढ़ कर गर्म हैएक हालत पर नहीं इस का मिज़ाजहर ज़माने में बदलता है रिवाजऔर था पहले ये अब कुछ और हैआए दिन इस का निराला तौर हैइस ने बेहद रूप बदले आज तकइस की तदबीरों से हैराँ है फ़लकडॉक्टर ताजिर प्रोफ़ेसर वकीलइन का होना है तरक़्क़ी की दलीलइस के पहलू में वो दिल मौजूद हैजो भड़कने में निरा बारूद हैरेल गाड़ी रेडियो मोटर जहाज़इस की ईजादों का क़िस्सा है दराज़दस्त-कारी में बड़ा मश्शाक़ हैजिद्दतों का हर घड़ी मुश्ताक़ हैखोल आँखें जंग की रफ़्तार देखदेख इस के ख़ौफ़नाक औज़ार देखये कहीं हाकिम कहीं महकूम हैये कहीं ज़ालिम कहीं मज़लूम हैआदमी जब ग़ैर के आगे झुकाआदमिय्यत से भटकता ही गयाआदमी मिलना बहुत दुश्वार हैख़ुद ख़ुदा को आदमी दरकार हैप्यारे बच्चो आदमी बन कर रहोहर किसी के साथ हमदर्दी करोसच अगर पूछो तो बस वो मर्द हैजिस के दिल में दूसरों का दर्द है'फ़ैज़' पहुँचाता नहीं जो आदमीउस को अपनी ज़ात से है दुश्मनीउस को अपनी ज़ात से है दुश्मनी
कज-फ़हम थी ज़िद्दी थी क़यामत थी सरासरसुक़रात को देती थी वो सलवात पे सलवात
सुना है तुम मनों मिट्टी तले आराम करती होतुम और आराम ना-मुम्किनसुना है मौत से भी आख़िरी दम तक लड़ाई कीमुझे मा'लूम है तुम कितनी ज़िद्दी थीं
न पूछ ऐ हम-नशीं कॉलेज में आ कर हम ने क्या देखाज़मीं बदली हुई देखी फ़लक बदला हुआ देखान वो पहली सी महफ़िल है न मीना है न साक़ी हैकुतुब-ख़ाने में लेकिन अब तलक तलवार बाक़ी हैवही तलवार जो बाबर के वक़्तों की निशानी हैवही मरहूम बाबर याद जिस की ग़ैर फ़ानी हैज़मीं पर लेक्चरर कुछ तैरते फिरते नज़र आएऔर उन की ''गाऊन'' से कंधों पे दो शहपर नज़र आएमगर इन में मिरे उस्ताद-ए-देरीना बहुत कम थेजो दो इक थे भी वो मसरूफ़-ए-सद-अफ़्कार-ए-पैहम थेवो ज़ीने ही में टकराने की हसरत रह गई दिल मेंसुना वन-वे ट्रैफ़िक हो गई ऊपर की मंज़िल मेंअगरचे आज-कल कॉलेज में वाक़िफ़ हैं हमारे कमहमें दीवार-ओ-दर पहचानते हैं और उन को हमबुलंदी पर अलग सब से खड़ा ''टावर' ये कहता हैबदलता है ज़माना मेरा अंदाज़ एक रहता हैफ़ना तालीम दरस-ए-बे-ख़ुदी हूँ इस ज़माने सेकि मजनूँ लाम अलिफ़ लिखता था दीवार-ए-दबिस्ताँ परमगर ''टावर'' की साअ'त के भी बाज़ू ख़ूब चलते हैंकबूतर बैठ कर सूइयों पे वक़्त उस का बदलते हैंउसी मालिक को फिर हलवे की दावत पर बुलाते हैंवो हलवा ख़ूब खाते हैं उसे भी कुछ खिलाते हैंअगर वो ये कहे इस में तो ज़हरीली दवाई हैमिरा दिल जानता है इस में अंडे की मिठाई हैफिर इस के बअ'द बहर-ए-ख़ुद-कुशी तय्यार होते हैंवो हलवा बीच में और गर्द उस के यार होते हैंवो पूछे गर कहाँ से किस तरह आया है ये हलवातो डब्बा पेश कर के कह दिया इस का है सब जल्वाकिसी कंजूस के कमरे में जा कर बैठ जाते हैंऔर उस के नाम पर टुक शाप से चीज़ें मंगाते हैंबिचारा 'जाफ़री' मुद्दत के बअ'द आया है कॉलेज मेंइज़ाफ़ा चाहता है अपनी अंग्रेज़ी की नॉलिज मेंतिरे सीने पे जब यारान-ए-ख़ुश आएँ की महफ़िल होतो ऐ 'ओवल' उसे मत भूल जाना वो भी शामिल हो
सुनो तुम्हारा जुर्म तुम्हारी कमज़ोरी हैअपने जुर्म पेरंग-बिरंगे लफ़्ज़ों की बे-जान रिदाएँ मत डालोसुनो तुम्हारे ख़्वाब तुम्हारा जुर्म नहीं हैंतुम ख़्वाबों की ताबीर से डर करलफ़्ज़ों की तारीक गुफा में छुप रहने के मुजरिम होतुम ने हवाओं के ज़ीने परपाँव रख करक़ौस-ए-क़ुज़ह के रंग समेटेऔर ख़लाओं में उड़तेफ़र्ज़ी तारों सय्यारों की बातें कींतुम मुजरिम हो उस नन्ही कोंपल के जिस नेसुब्ह की पहली शोख़ किरन से सरगोशी कीतुम मुजरिम हो उस आँगन के जिस में शायदअब भी तुम्हारे बचपन की मासूम शरारत ज़िंदा हैतुम मुजरिम हो तुम ने अपने पाँव से लिपटी मिट्टी कोएक इज़ाफ़ी चीज़ समझ कर झाड़ दिया
कोई ऐसा स्कूल भी तो खुलेजहाँ कापियाँ और किताबें न होंदीवारों पे लिक्खा हो पढ़ना नहींतरक़्क़ी के ज़ीने पे चढ़ना नहींरह-ए-इल्म में आगे बढ़ना नहींगले मेरे ये इल्म मढ़ना नहींहमेशा रहें ख़ुश कि ऐ चुल-बुलेकोई ऐसा स्कूल भी तो खुलेहमें न सिखाओ ये जी ओ टी गॉटहमारा तो ग़ुस्सा है ऐच ओ टी हॉटकि हम तोड़ डालें ये पी ओ टी पॉटछिड़क देंगे चेहरे पे हम इंकपॉटपड़े दाग़ ऐसा कि फिर न धुलेकोई ऐसा स्कूल भी तो खुलेन करनी पड़े याद ये हिस्ट्रीन जुग़राफ़िया हो और न कैमिस्ट्रीवकालत करेंगे न बैरिस्ट्रीसिखा दो शरारत की पामिस्ट्रीकि शैतान बनने पे हम हैं तुलेकोई ऐसा स्कूल भी तो खुलेबड़े हो के भालू नचाएँगे हमअखाड़े में मुगदर घुमाएँगे हमन पढ़ने को इंग्लैण्ड जाएँगे हमतुम्हीं पर कबूतर उड़ाएँगे हमजहालत के पलड़े में हम हैं तुलेकोई ऐसा स्कूल भी तो खुले
क्या इस निज़ाम को जागीर-दार बदलेगा?जोमेरे वोट से मुंतख़ब होता हैऔरमेरे ख़्वाबों पर टेक्स लगाता हैक्याइस निज़ाम को सरमाया-दार बदलेगा?जोमुझ से बारा घंटे की बेगार लेता हैमगरआठ घंटे की उजरत देने पर भी तय्यार नहीं!क्या दानिश-वर इस निज़ाम को बदल सकता है?मगर वो तोएक प्लाट या ग़ैर-मुल्की दौरे के एवज़हुक्मरानों के लिए लुग़त में से सताइशी अल्फ़ाज़जम्अ करता रहता है!ताजिर इस निज़ाम को कैसे बदलेगा?वो तो बजट की तमाम मुराआत समेट करसारी महँगाईमेरे खाते में दर्ज कर देता हैसियास्त-दान इस निज़ाम का मुहाफ़िज़ क्यूँ न हो!कि उस की बरकत सेवो सरकारी स्कूल और डिसपेंसरी में अपनी भैंस बाँध सकता हैऔरसाया देने वाले ग़ैर-सरकारी दरख़्त के नीचेक्लास लेने वाले ज़िद्दी टीचर कोअपनी पजेरो से बाँध कर घसीटे जाने की धमकी देता हैमैं नेसहाफ़ी से इस निज़ाम को बदलने की दरख़्वास्त कीमगर वोथाना मुहर्रिर के पास बैठ कर चाय पीने और ख़बरें लिखने में मगन थाये सब जानते हुएमैं अगले पाँच साल के लिएअपना चेहरा अपने हल्क़े के पटवारी को दे दूँगाजो उसेअक्स-ए-शजरा में लपेट कर रख लेगाऔरवोट की पर्ची पर मेरा अँगूठा ख़ुद ही लगा लेगा
मटियाले मटियाले बादल घूम रहे हैं मैदानों के फैलाव परदरिया की दीवानी मौजें हुमक हुमक कर हंस देती हैं इक नाव परसामने ऊदे से पर्बत की अब्र-आलूदा चोटी पर है एक शिवालाजिस के अक्स की ताबानी से फैल रहा है चारों जानिब एक उजालाझिलमिल करती एक मशअल से मेहराबों के गहरे साए रक़्सीदा हैंहर सू परियाँ नाच रही हैं जिन के आरिज़ रख़्शाँ नज़रें दुज़दीदा हैंअम्बर और लोबान की लहरें दोशीज़ा की ज़ुल्फ़ों पे ऐसे बल खाती हैंचाँदी के नाक़ूस की तानें धुँदले धुँदले नज़्ज़ारों में घुल जाती हैंहाथ बढ़ाए सर निहूड़ाए पतले सायों का इक झुरमुट घूम रहा हैपूजा की लज़्ज़त में खो कर मंदिर के ताबिंदा ज़ीने चूम रहा हैएक बहुत पतली पगडंडी साहिल-ए-दरिया से मंदिर तक काँप रही हैनाव चलाने वाली लड़की चप्पू को माथे से लगाए हाँप रही हैदीवानी को कौन बताए उस मंदिर की धुन में सब थक-हार गए हैंसाए बन के घूम रहे हैं जो बे-बाक चलाने वाले पार गए हैंवो जब नाव से उतरेगी मटियाले मटियाले बादल घिर आएँगेमैदानों पर कोहसारों पर दरिया पर नाव पर सब पर छा जाएँगेअव्वल तो पगडंडी खो कर गिर जाएगी ग़ारों ग़ारों में बेचारीबच निकली तो हो जाएगी उस के नाज़ुक दिल पर इक हैबत सी तारीहोश में आई तो रग रग पर एक नशा सा बे-होशी का छाया होगाजिस्म के बदले उस मंदिर में धुँदला इक लचकीला साया होगा
बे-यक़ीनी के ज़ीने पे चलते हुएउस ने बाहर क़दम जो निकालातो कैफ़े की दीवार से देखतीमोनालीज़ा के चेहरे पेसदियों से फैला तबस्सुम भीइक पल को गहना गयाटीना सानी की आवाज़ के साए मेंउस के होंटों की जुम्बिशसराबों सी महसूस होने लगीउस की आँखों पे छाई हुई धुंदचारों दिशाओं में उड़ने लगीबे-यक़ीनी का ज़ीना क़दम-ब-क़दमउस के पैरों के हमराह बढ़ने लगाआह खींची और उस नेदो-आलम की सारी उदासी कोअपने बदन में समेटा तो सोचाकि कोहरा उदासी का हम-ज़ाद हैयक-ब-यकज़ब्त की आमरिय्यत के बाग़ीकिसी ख़्वाब नेउस की पलकों के ज़िंदाँ सेकूद कर ख़ुद-कुशी की तोमफ़रूर आँसू क़तारें बना कर निकलने लगेगोल-चक्कर पे रौशन किसी क़ुमक़ुमे केउजाले में गेंदे के फूलों नेजब उस के गालों पे गिरती हुईओस देखी तो मुरझा गएसुरमई घास नेसाल की आख़िरी शाममें आज पहली दफ़ाउस को ख़ामोश देखातो नम हो गईचारों जानिब उतरती हुई धुंद नेख़ुद को कुछ और बोझल कियाउस को लोगों की नज़रों से ओझल किया
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