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नज़्म
हबीब जालिब
नज़्म
मेरे माज़ी को अंधेरे में दबा रहने दो
मेरा माज़ी मिरी ज़िल्लत के सिवा कुछ भी नहीं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
डर है पड़े न सदमा ज़िल्लत का उस का सहना
चाहो अगर बड़ाई तो कहना बड़ों का मानो
अल्ताफ़ हुसैन हाली
नज़्म
जिस की ख़ातिर तिरी ज़िल्लत भी गवारा थी मुझे
आज उसी ''पैकर-ए-इस्मत'' का ख़ता-कार हूँ मैं
क़तील शिफ़ाई
नज़्म
इज़्ज़त वालों की ज़िल्लत का सब से बड़ा बाज़ार है ये
चुकते हैं ग़ैरत के सौदे बिकते हैं ईमान यहाँ
क़तील शिफ़ाई
नज़्म
जो वाक़िफ़ नहीं तेरे दर्द-ए-निहाँ से
इसे भी तो ज़िल्लत की पाबंदगी के लिए आल-ए-कार बनना पड़ेगा