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नज़्म
ये ज़मीं थीं ज़िल्लत-ए-आफ़ाक़ जिस की पस्तियाँ
रिफ़अ'तों में रू-कश-ए-हफ़्त-आसमाँ होने को है
फ़ज़लुर्रहमान
नज़्म
बहर-ए-तूफ़ानी-ए-दुनिया में हैं हम सर-गश्ता
मौज-ए-ग़म में है जहाज़ अपना थिएटर खाता
सूरज नारायण मेहर
नज़्म
फिर भी मैं ख़ुश हूँ कि इस कार-गह-ए-दुनिया में
तुम से मिलने के लिए वक़्त ने रस्ता तो दिया