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नज़्म
गुमाँ होता है की लश्कर-कुशी बाद-ए-बहारी ने
ज़िरह-पोश आब हो जाता है जब बादल गुज़रते हैं
नज़्म तबातबाई
नज़्म
और ये सफ़्फ़ाक मसीहा मिरे क़ब्ज़े में नहीं
इस जहाँ के किसी ज़ी-रूह के क़ब्ज़े में नहीं