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नज़्म
परों को ज़ोरों से फड़फड़ाते थे और सेहनों में दौड़ते थे
यहीं था सब कुछ सफ़ीर-ए-लैला
अली अकबर नातिक़
नज़्म
रिश्वत-ख़ोरी और ग़बन की दफ़्तर दफ़्तर धूम रहेगी
कमज़ोरों पर शह-ज़ोरों का ज़ुल्म रहेगा