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नज़्म
ये तिरे सर की सफ़ेदी और ये गर्द-ए-मलाल
में तो क्या शर्मा रहा है ख़ुद ख़ुदा-ए-ज़ुल-जलाल
जोश मलीहाबादी
नज़्म
दर्द-ए-ज़ेह से ज़ीस्त यूँही हलकान तड़पती रहती है
नए मसीहा आते हैं और सूली पर चढ़ जाते हैं
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
उधड़ती साँसों पे दाँत अपने चुभो रहा था
मैं दर्द-ए-ज़ेह से भी सुर्ख़-रू हो के आने वाली
आतिफ़ तौक़ीर
नज़्म
हैं जितने अक़ारिब वो अक़ारिब से हैं बद-तर
अहबाब हैं वो ख़ुद-ग़रज़-ओ-ज़ूद-फ़रामोश
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
नज़्म
सरमदी नग़्मात से सारी फ़ज़ा मामूर है
नुत्क़-ए-रब-ए-ज़ुल-मिनन हैं रात की ख़ामोशियाँ