aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "zul-fiqaar"
पैकर-ए-वफ़ा किस नेजिस्म से तराशा हैज़ुल्फ़-ओ-आरिज़-ओ-लब मेंपैरा का तमाशा है
यार हमारी फ़िक्र न करनाअपनी सोचो
आज भी जब मैं बाईक पे बैठूँआज भी मेरे पहलू पे इक हाथ दिखाई देता हैआज भी मेरे कानों को इक गीत सुनाई देता हैआज भी कोई ज़ुल्फ़ मिरा दिल ख़ुश्बू से महकाती हैयाद किसी की आज भी मेरे पीछे बैठ के जाती है
ज़िंदगी से उन्स हैहुस्न से लगाव हैधड़कनों में आज भीइश्क़ का अलाव हैदिल अभी बुझा नहींरंग भर रहा हूँ मैंखाका-ए-हयात मेंआज भी हूँ मुंहमिकफ़िक्र-ए-काएनात मेंग़म अभी लुटा नहींहर्फ़-ए-हक़ अज़ीज़ हैज़ुल्म नागवार हैअहद-ए-नौ से आज भीअहद-ए-उस्तुवार हैमैं अभी मरा नहीं
मैं फ़क़त जिस्म नहीं ज़ह्न भी हूँसब क़सीदे लब-ओ-रुख़्सार के बर-हक़ लेकिनचश्म-ए-मयगूँ के उधरक़ामत-ए-शमशाद के साथज़ुल्फ़-ए-पेचाँ से परेमेरी इक सोच भी है फ़िक्र भी हैमैं कि तख़्लीक़-ए-बशर का हूँ वसीला लेकिनक्यूँ दिखाई नहीं देता है तुम्हें मेरा शुऊ'रमेरी दानिश के कई रंग हैं तारीख़ के पासमेरे अफ़्कार मिरी राय मिरा तर्ज़-ए-ख़यालइन की तौक़ीर करोतुम ने औरत को फ़क़त हूर-शमाइल समझानावक-ए-इश्क़ का घायल समझातुम ने सदियों से अधूरा मुझे तस्लीम कियाइस में तरमीम करोसच की ताज़ीम करोमैं फ़क़त जिस्म नहीं ज़ह्न भी हूँमैं इकाई हूँ मुकम्मल मुझे तस्लीम करो
एहसास-ए-अव्वलींएक मौहूम इज़्तिराब सा हैइक तलातुम सा पेच-ओ-ताब सा हैउमडे आते हैं ख़ुद-ब-ख़ुद आँसूदिल पे क़ाबू न आँख पर क़ाबूदिल में इक दर्द मीठा मीठा सारंग चेहरे का फीका फीका साज़ुल्फ़ बिखरी हुई परेशाँ-हालआप ही आप जी हुआ है निढालसीने में इक चुभन सी होती हैआँखों में क्यूँ जलन सी होती हैसर में पिन्हाँ तसव्वुर-ए-मौहूमहाए ये आरज़ू-ए-ना-मालूमएक नाला सा है बग़ैर आवाज़एक हलचल सी है न सोज़ न साज़क्यूँ ये हालत है बे-क़रारी कीसाँस भी खुल के आ नहीं सकतीरूह में इंतिशार सा क्या हैदिल को ये इंतिज़ार सा क्या है
अपने एहसास के आईने में ख़ुद को देखाइक सिमटता हुआ साया हूँ बिखरता हुआ फूलएक तपता हुआ सहरा हूँ सुलगता हुआ शहरदर्द का सर्व-ए-रवाँ दुख का शजर दश्त-ए-ख़ुलूसएक फ़नकार हूँ सरमाया मिरा ख़ून-ए-जिगरज़िंदगी बारहा शो'लों में गिरफ़्तार हुईबारहा फ़िक्र-ए-दिल-ओ-जाँ भी शरर-बार हुईअपने माहौल के मेआ'र पे ख़ुद को परखाएक मुजरिम हूँ मिरा जुर्म वफ़ा की तश्हीरअज़्मत-ए-ज़ुल्म का मुनकिर हूँ शब-ए-ग़म का हरीफ़आदमिय्यत का तक़द्दुस है मिरे फ़न का जमालहक़-परस्ती मिरे अफ़्कार का सर-चश्मा है
चंद रोज़ और मिरी जान फ़क़त चंद ही रोज़ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पे मजबूर हैं हमऔर कुछ देर सितम सह लें तड़प लें रो लेंअपने अज्दाद की मीरास है माज़ूर हैं हम
हमारे साथ चलो ऐ पढ़े-लिखे लोगोचलो कि वक़्त के धारे तुम्हें बुलाते हैंउठो कि सुब्ह के नज़्ज़ारे तुम्हें जगाते हैंहर इक सितारा-सिफ़त रौशनी का पर्वर्दाबढ़े कि आज जहालत से जंग लाज़िम हैअंधेरे चारों तरफ़ फैलने लगे हैं बहुतकि ज़ुल्म-ओ-जब्र का माहौल हम पे हाकिम हैहवा-ए-ज़ुल्म से शाख़ों में इक झुकाव सा हैफ़ज़ा में ज़हर है साँसों पे कुछ दबाओ सा हैसो आशियानों को अब छोड़ना ज़रूरी हैसमय के पाँव में ज़ंजीर है तनफ़्फ़ुर कीबढ़ो कि बढ़ के इसे तोड़ना ज़रूरी हैज़रा सा जौहर-ए-'इल्म-ओ-हुनर से काम तो लोखुला है मय-कदा-ए-फ़िक्र आओ जाम तो लोहर इक ज़बान पे उल्फ़त की चाशनी धर दोहर एक दिल में मोहब्बत की रौशनी भर दोहमारे साथ चलो ऐ पढ़े-लिखे लोगोक़लम से लिक्खो नई सुब्ह के नए नग़्मेहर एक गीत को मज़लूम की सदा कर दोउठो और उठ के किताबों का हक़ अदा कर दो
इस भरे शहर में हर चीज़ की क़ीमत ठहरीदर्द बिक जाते हैं जज़्बात बिका करते हैंजगमगाते हुए सिक्कों के एवज़ दुनिया मेंकितने शायर हैं जो दिन रात बिका करते हैंइक तिरा शायर-ए-ख़ुद्दार नहीं बिक सकतामेरी महबूब तिरा प्यार नहीं बिक सकतामेरे ख़ाकों में तिरे हुस्न की तस्वीरें हैंजुम्बिश-ए-ज़ुल्फ़ तिरी जुम्बिश-ए-लब तेरी हैमेरा हक़ क्या है जो नीलाम उठाऊँ इन कामेरे अशआर वो दौलत है जो अब तेरी हैअब ये सरमाय-ए-अशआर नहीं बिक सकतामेरी महबूब तिरा प्यार नहीं बिक सकताअपने शेरों का चमन नज़्र किया है तुझ कोअपना अंदाज़-ए-सुख़न नज़्र किया है तुझ कोधड़कनें मेरे जवाँ दिल की बसी हैं जिस मेंमैं ने वो फ़िक्र वो फ़न नज़्र किया है तुझ कोकिसी फ़नकार का किरदार नहीं बिक सकतामेरी महबूब तिरा प्यार नहीं बिक सकता
ख़ामुशी टूट चुकी थीचढ़ती उम्र का नशाअब बोलने लगा थासोया नहीं था अभी कम-सिनी का अल्हड़-पनउस के पैकर के ख़ुतूतनफ़ीस तबीअतनर्म लहजाबोलती आँखेंलम्बे घने मुलाएम बालउस के काँधों पे यूँ बिखरते जैसेबरसती घटाएँफ़ज़ा में अपना जादू जगाने को बे-क़रार होंमेरे और उस केहोंटों का गुलाबी-पन अब निखरने लगा थाहमारी आँखों की सरगोशियाँलोग समझने लगे थेवो रिहाइश-गाह जहाँ हम आख़िरी बार मिले थेवहाँ अज़ीम इमारत खड़ी हैमैं अब भी वहाँ से गुज़रता हूँतो यूँ गुमाँ होता है जैसेशमीम-ए-ज़ुल्फ़ है अब तक बसी फ़ज़ाओं में
कई सदी की मशक़्क़त पे फ़िक्रमंद हुएख़याल-ए-यार फ़ज़ाओं के दर्द-मंद हुएशुऊ'र फ़िक्र से सरगोशियों में कहने लगेअभी तो क़ुदरती वसाइल की शनासाई हैअभी तो लब पे कई नुक़रई सदाएँ हैंअभी तो आदमी को आदमी पहचानता हैअभी तो मौसमों की रंगतें नहीं बदलींशुऊ'र फ़िकर से सरगोशियों में कहने लगेअभी तो शम्स के माथे पे कोई बल भी नहींअभी तो चाँद की हैअत भी हू-ब-हू है वहीअभी तो अहल-ए-फ़न के हाथ भी सलामत हैंअभी तो ज़ेहन में ख़ुश-हाल सोच रक़्साँ हैंशुऊ'र फ़िक्र से सरगोशियों में कहने लगेअभी भी लब पे मुस्कुराहटों की आस लिएब-ज़ाहिर दौर-ए-नौ के नग़्मे गुनगुनाते हुएअभी भी साहिल-ए-दरिया पे ज़ुल्फ़ खोले हुएमिरे ख़याल की सरगोशियाँ ये कहती हैंकई सदी की मशक़्क़त पे ज़र्ब कर देगानया सवेरा हमें शर्मसार कर देगा
वो ज़ालिमजो किसी का ज़ुल्म सहता हैकि वो ज़ालिमजो उस पर ज़ुल्म करता है
एशिया के दूर-उफ़्तादा शबिस्तानों में भीमेरे ख़्वाबों का कोई रूमाँ नहीं!काश इक दीवार-ए-ज़ुल्ममेरे उन के दरमियाँ हाइल न हो!ये इमारात-ए-क़दीमये ख़याबाँ, ये चमन, ये लाला-ज़ार,चाँदनी में नौहा-ख़्वाँअजनबी के दस्त-ए-ग़ारत-गर से हैंज़िंदगी के इन निहाँ-ख़ानों में भीमेरे ख़्वाबों का कोई रूमाँ नहीं!
ऐ मँडेला तिरी बेबाक क़यादत को सलामसच है इंसान की तौक़ीर बढ़ा दी तू नेता-अबद याद रहेगी ये मिसाली पैकारक़िलअ'-ए-ज़ुल्म की बुनियाद हिला दी तू नेये तिरी जेहद-ए-मुसलसल ये तिरा अज़्म-ए-समीमशम्अ तूफ़ान-ए-हवादिस में जला दी तू नेआज अफ़्रीक़ा के सब पीर-ओ-जवाँ हैं बेदारक़िस्मत-ए-ख़ुफ़्ता ग़ुलामों की जगा दी तू नेज़ोर-ए-बाज़ू ने तिरे आज बड़ा काम कियागर्दन-ए-ख़्वाजगी पल-भर में झुका दी तू नेजो थी इंसान पे इंसाँ के सितम की बुनियादपस्त-ओ-बाला की वो तफ़रीक़ मिटा दी तू नेतू ने शाहीं से ममूले को लड़ाया ऐ दोस्तख़ाक में हैबत-ए-अफ़रंग मिला दी तू नेऐ मिरे मर्द-ए-मुजाहिद तिरी जुरअत के निसाररंग और नस्ल की दीवार गिरा दी तू नेदेख है वक़्त की मौजों में रवानी तुझ सेज़िंदा है अज़्मत-ए-इंसाँ की कहानी तुझ से
घर की इज़्ज़त का भरम रखती रही वो औरतज़िंदगी जीती रही अपनी सँभाले हुरमतअपने बच्चों के लिए जीती रही थी अब तकज़हर हालात का ख़ुद पीती रही थी अब तकउम्र-भर ज़ुल्म-ओ-सितम हँसते हुए सहती रहीअपने ही आप से गुज़री जो उसे कहती रहीसिर्फ़ इक छत ही मिली प्यार का साया न मिलामुतमइन ज़ीस्त का ग़ुंचा न कभी दिल का खिलाबाल-बच्चे भी जवाँ हो के हुए बेगानेमाँ पे क्या बीत गई उस से रहे अनजाने
ज़ुल्म की क़िस्मत-ए-नाकारा-ओ-रुस्वा से कहोजब्र की हिकमत-ए-परकार के ईमा से कहोमहमिल-ए-मज्लिस-ए-अक़्वाम की लैला से कहोख़ून दीवाना है दामन पे लपक सकता हैशोला-ए-तुंद है ख़िर्मन पे लपक सकता है
जो ख़ून सड़कों पे बह रहा था जो ज़ुल्म इंसान सह रहा थाक़लम के मज़दूर लिख रहे थेक़लम के मज़दूर लिख रहे थे कि मेहनतों के मुआवज़े मेंअज़ीम मेहनत-कशों के मेदों में सिर्फ़ फ़ाक़े भरे हुए हैंऔर उन के अज्साम-ए-आहनीं पर फ़क़त लिबास-ए-बरहनगी हैऔर उन के बच्चों की तर्बियत के लिए मदारिस खुले हुए हैंजहालत-ओ-जुर्म के मदारिसऔर उन को रहने को तंग तिरछे तवील फ़ुटपाथहर सड़क पर बिछे हुए हैंऔर उन के अमराज़ दूर करने को गोरकन मुस्तइद खड़े हैंक़लम के मज़दूर लिख रहे थेक़लम के मज़दूर लिख रहे हैंऔर उन की तहरीर-ए-तर का हर हर्फ़मुंतक़िम वक़्त पढ़ रहा है
क़ातिल-ओ-मक़्तूल बराबरज़ालिम-ओ-मज़लूम बराबरक़लम भी बंदूक़ बराबरमा'तूब-ओ-महबूब बराबरअपनी गोया साथी कीहर इक ख़ातून बराबरनई दानिश्वरी जो पढ़ीमूसा-ओ-क़ारून बराबरज़ुल्म तो सब पर साँझा थाबनी-इसराईल-ओ-फ़िरऔन बराबरमाँ चाहे रोती रहेशहीद बच्चे और मलऊन बराबरबलोच जो घर से ग़ाएब हैंसब पर मगर क़ानून बराबरज़ुल्म की अंधी फ़िक्र मेंयज़ीद-ओ-हुसैन बराबरनई नई पढ़ी सहाफ़तमशअ'ल-ओ-हुजूम बराबरअंधेरा भी उजाले सा हैज़ुल्मत-ओ-नूर बराबरबसीरत पर पर्दा पड़ासच और हर इक झूट बराबरउल्टी गंगा बहती हैमदारी-ओ-अफ़लातून बराबरजब तक अपना न बहेआब-ओ-ख़ून बराबरइक उन का भी मार गिराओफिर कहना मारने वाला और मरहूम बराबर
हम कि वामांदगी-ए-शौक़ का लम्हा ले करआ गए हैं तिरे पैकर के उजालों के क़रीबकितनी सदियों की मसाफ़त ले करएक दरमाँदा तही-दस्त मुसाफ़िर की तरहआ के ठहरे हैं तिरे प्यार के बरगद नीचेहम कि मसहूर तिलिस्मात-कदे हैं तेरेतेरी आँखों तेरे होंटों तेरी ज़ुल्फ़ों के असीरतेरी तमन्ना के फ़क़ीरमुंतज़िर हैं कि तिरे जिस्म का परतव उभरेऔर रौशन हों तख़य्युल की वो राहें जिन परकब से फैली हुई गुमनाम सी तारीकी हैयूँ सिमट जाए मिरे बख़्त पे उतरी हुई रातनूर छन कर तिरे पैकर की तुनुक-ताबी सेमेरी बे-नूर सी दुनिया को मुनव्वर कर देमेरे ख़्वाबों को हक़ीक़त कर देऐ रुख़-ए-यार इधर देख ज़रामेरे दिल-दार इधर देख ज़राजिस का इक उम्र तमन्नाई रहाअपने गुल-रंग से जल्वों के तुफ़ैलमुझ को वो कैफ़ वो रानाई देएक बे-नाम से रिश्ते को पज़ीराई देअब तो इक लम्स-ए-मसीहाई देहम को ऐ जान-ए-जहाँ इतनी इजाज़त दे देजिस घड़ी शाम ढलेतेरी गेसू की तरह शब की हसीं ज़ुल्फ़ खुलेतेरे आँचल का किनारा ले करएक बे-नाम सहारा ले करअपनी बेताब तमन्नाओं की गिर्हें खोलेंतेरे ज़ानू पे ये सर रख केदो आँसू रो लें
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