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नज़्म
वो ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म शमीम-ए-मस्त से धुआँ धुआँ
वो रुख़ चमन चमन बहार-ए-जावेदाँ लिए हुए
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
पड़ गई इक आह कर के रो के उठ बैठी कभी
उँगलियों में ले के ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म एेंठी कभी
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
एक दिन हम भी तिरी आँखों के बीमारों में थे
तेरी ज़ुल्फ़-ए-ख़म नजम के नौ-गिरफ़्तारों में थे
जोश मलीहाबादी
नज़्म
फ़रोग़-ए-चेहरा-ए-मेहनत, ग़ुबार-ए-दामन-ए-दौलत
नम-ए-पेशानी-ए-ग़ैरत, ख़म-ए-ज़ुल्फ़-ए-रसा होता
जमील मज़हरी
नज़्म
हल्क़ा-ए-ज़ुल्फ़-ए-सनम की तीरगी से दूर हूँ
ज़िंदगी के पेच-ओ-ख़म सुलझा रहा हूँ आज-कल
मासूम शर्क़ी
नज़्म
ज़रा हमारे ये शाम-ओ-सहर सँवर जाएँ
तो हम भी ज़ुल्फ़-ओ-रुख़-ए-मह-वशाँ की बात करें
मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा
नज़्म
रह-ए-मंज़िल में हम दुश्वारियों का ग़म नहीं करते
गुज़र जाते हैं हँस कर फ़िक्र-ए-पेच-ओ-ख़म नहीं करते
मुनीर वाहिदी
नज़्म
उलझ कर रह गए हैं मुद्दइ'यान-ए-रुबूबिय्यत
ख़याल-ए-ख़ाम बिल-आख़िर ख़याल-ए-ख़ाम है साक़ी
शमीम फ़ारूक़ बांस पारी
नज़्म
शोरिश-ए-दर्द-ओ-ग़म-ए-ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ की क़सम
चश्म-ए-नम चाक-जिगर दीदा-ए-हैराँ की क़सम