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नज़्म
ज़ुल्मत-ए-बुग़्ज़-ओ-हसद छाई रही हर-सू मगर
ख़ुद को चमकाया है मैं ने प्यार की तनवीर में
अख़तर बस्तवी
नज़्म
तमन्ना है जहान-ए-इल्म में चमकूँ सहा बन कर
जुमूद-ए-ज़ुल्मत-ए-हस्ती पे छा जाऊँ ज़िया बिन कर
मोहम्मद सादिक़ ज़िया
नज़्म
अँधेरों के घने सायों का हम को ख़ौफ़ क्या होगा
रिदाए-ए-ज़ुल्मत-ए-नादीदा हम को क्या डराएगी
नज़ीर फ़तेहपूरी
नज़्म
ज़ुल्म ओ आज़ार के हैवानों से लड़ना चाहा
मेरे हाथों ने कई बार उठाए पत्थर