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नज़्म
पहन ज़ुन्नार और क़श्क़ा लगा माथे उपर बारे
'नज़ीर' आया है बाम्हन बन के राखी बाँधने प्यारे
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
ज़ुन्नार पहने हुए कोई तस्बीह थामे
अपनी गर्द-ए-सफ़र के धुँद में लिपटे चले जा रहे हैं
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
राह-ए-हक़ में न थे पाबंद किसी मज़हब के
तारिक़-ए-सुबहा-ओ-ज़ुन्नार गुरु-नानक थे
श्याम सुंदर लाल बर्क़
नज़्म
दिल-ए-बरगश्ता को लेकिन ये मैं ने बात समझाई
''नहीं कुछ सुब्हा-ओ-ज़ुन्नार के फंदे मैं गीराई''
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
ये शोर-ए-हश्र ये पैकार-ए-सुब्हा-ओ-ज़ुन्नार
ये जाँ-गुदाज़ फ़ज़ाएँ ये रूह-सोज़ बहार
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
नज़्म
न अब वो रिश्ता-ए-ज़ुन्नार है न ज़र्फ़-ए-वज़ू
तमाम तौक़-ओ-सलासिल पिघलने वाले हैं
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
नज़्म
कुफ्र-ओ-इस्लाम का इस के नहीं खुलता 'उक़्दा
हाथ में सुब्हा भी है दोष पे ज़ुन्नार भी है