साक़ी-ए-कौसर

अनीसुर्रहमान

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    कौसर-ओ-तस्नीम स्वर्ग की दो नहरों के नाम हैं। प्रलय के दिन ये नहरें पैग़ंबर मुहम्मद साहब को दी जाएँगी और वो स्वर्ग में जाने वाले लोगों को इस से सैराब करेंगे। इसी वजह से मुहम्मद साहब को साक़ी-ए-कौसर (प्रलय के दिन जन्नत में जाने वालों को कौसर से शराब पिलाने वाला) भी कहा जाता है।

    मुहम्मद साहब के अलावा कहीं-कहीं हज़रत अली को भी साक़ी-ए-कौसर कहा गया है। कौसर के पानी के बारे में कहा जाता है कि ये बर्फ़ से ज़्यादा ठंडा, शहद से ज़्यादा मीठा और दूध से ज़्यादा उजला है। इस तलमीह / संकेत को उर्दू शायरी में बड़ी ख़ूब-बसूरती से पेश किया गया है साक़ी-ए-कौसर के अलावा कौसर-ओ-तस्नीम और हौज़-ए-कौसर भी इसी संकेत के रूप हैं।

    बहुत सही ग़म-ए-गीती शराब कम क्या है

    ग़ुलाम-ए-साक़ी-ए-कौसर हूँ मुझ को ग़म क्या है

    ग़ालिब

    आरज़ू-ए-चश्मा-ए-कौसर नहीं

    तिश्ना-लब हूँ शरबत-ए-दीदार का

    वली दकनी

    लब पे दिलबर के जलवा-गर है जो ख़ाल

    हौज़-ए-कौसर पे जूँ खड़ा है बिलाल

    वली दकनी

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