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क्या आप जानते हैं?

शह्र ए आशोब उर्दू शायरी की एक क्लासिकी विधा है जो एक ज़माने में बहुत लिखी गई थी। यह ऐसी नज़्म होती है जिसमें किसी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कठिनाईयों की वजह से किसी शहर की परेशानी और बर्बादी का हाल बयान किया गया हो। शह्र ए आशोब मसनवी, क़सीदा, रूबाई, क़तात, मुख़म्मस और मुसद्दस के रूप में लिखे गए हैं। मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी सौदा और मीर तक़ी मीर के शह्र ए आशोब जिनमें अवाम की बेरोज़गारी, आर्थिक कठिनाई और दिल्ली की तबाही व बर्बादी का उल्लेख है, उर्दू के यादगार शह्र ए आशोब हैं। नज़ीर अकबराबादी ने अपने शह्र ए आशोबों में आगरे की बदहाली, फ़ौज की ख़राब स्थिति और शरीफ़ों के अपमान का हाल बहुत ख़ूबी से प्रस्तुत किया है। 1857 की स्वतंत्रता संग्राम के बाद दिल्ली पर जो मुसीबत टूटी, उसे भी दिल्ली के अधिकतर शायरों ने अपना विषय बनाया है जिनमें ग़ालिब, दाग़ देहलवी और मौलाना हाली शामिल हैं। 1954 में हबीब तनवीर ने नज़ीर अकबराबादी की शायरी पर आधारित अपने मशहूर नाटक "आगरा बाज़ार" में उनके एक शह्र ए आशोब को बहुत ही प्रभावी ढंग से मंच पर गीत के रूप में प्रस्तुत किया था।

क्या आप जानते हैं?

पिछले वर्ष दुनिया के विश्वस्त अंग्रेज़ी शब्दकोश कैम्ब्रिज में उर्दू भाषा का सबसे ज़्यादा बोला जाने वाला शब्द "अच्छा" शामिल कर लिया गया। "अच्छा" शब्द शामिल किए जाने के साथ यह भी बताया गया है कि उल्लेखनीय शब्द भारतीय अंग्रेज़ी में भी आम तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। शब्दकोश में शब्द "अच्छा" को शामिल करते हुए उसके मायने ख़ुशी और आश्चर्य को व्यक्त करने के रूप में अंकित किया गया है और साथ ही वाक्य में प्रयोग करने के उदाहरण भी दिए गए हैं। लेकिन उर्दू में शब्द "अच्छा" कई और अर्थों में भी इस्तेमाल होता है, उदाहरण के लिए:
मुनासिब, ठीक, दुरुस्त,बुरा का विलोम, बहुत खूब (व्यंग्य के रूप में), तसल्ली, आश्वस्त, देखा जाएगा,समझे?,सुन लिया?(चेतावनी के लिए), इजाज़त है?, जैसे मशहूर फ़िल्मी गाना "अच्छा तो हम चलते हैं"
यह शब्द स्वस्थ्य,निरोग होने के लिए भी इस्तेमाल होता है जैसे ग़ालिब का ये शे'र:
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ

क्या आप जानते हैं?

"हज्व" उर्दू शायरी की एक विधा है जिसमें शायर किसी व्यक्ति या प्रतिद्वंद्वी के ख़िलाफ़ अपने गुस्से को व्यक्त करता है। कुछ लोग हज्व को क़सीदे ही का एक रूप मानते हैं। उर्दू में नियमित रूप से हज्व कहने का आरंभ मुहम्मद रफ़ी सौदा(1713-1781) से होता है। उन्होंने अपने हज्वों के लिए क़सीदा, मसनवी, क़ता, ग़ज़ल, रुबाई अर्थात सभी विधाओं का इस्तेमाल किया है।
मुहम्मद हुसैन आज़ाद "आब ए हयात" में लिखते हैं कि सौदा का 'ग़ुंचा' नाम का एक सेवक था जो हर समय सेवा में उपस्थित रहता था और साथ साथ क़लमदान लिए फिरता था। सौदा जब किसी से नाराज़ होते तो तुरंत पुकारते,"अरे ग़ुंचा, ला तो क़लमदान, ज़रा मैं इसकी ख़बर तो लूं, ये मुझे समझा क्या है।"
सौदा ने विभिन्न प्रकार की हज्वियात कही हैं। वो जो समकालिक नोक झोंक से भरपूर हैं या फिर शिष्टाचार के सुधार के लिए लिखी हैं या जिनमें अपने दौर की राजनीतिक दुर्दशा और आर्थिक बदहाली पर व्यंग्य है और हास्य उड़ाया गया है। सौदा ने एक हाथी और घोड़े की भी हज्वें लिखी हैं। उनकी मशहूर "तज़्हीक ए रोज़गार" वैसे तो एक दुर्बल घोड़े की हज्व है लेकिन वास्तव में यह मुग़ल सल्तनत के आखिरी दौर का रूपक है जो उस दौर की राजनीतिक और आर्थिक विपन्नता का प्रतिनिधि है।

क्या आप जानते हैं?

फ़रहंग ए आसफ़िया में अरबी, फ़ारसी, तुर्की, संस्कृत और अंग्रेज़ी के वह शब्द रखे गए हैं जो उर्दू भाषा में शामिल हो चुके हैं। फ़रहंग ए आसफ़िया के संपादक मौलवी सैयद अहमद देहलवी ने 1844 में सात वर्ष तक दिल्ली में एक अंग्रेजी भाषाविद  डा.फ़ेलन के साथ काम किया जो अंग्रेज़ी-उर्दू शब्दकोश संपादित कर रहे थे। यहीं से उन्हें यह शब्द कोश संपादित करने का विचार आया। 1878 में उन्होंने अरमुग़ान ए देहली नाम से एक पत्रिका के रूप में शब्दकोश को आरंभ किया, बाद में दकिन के निज़ाम महबूब अली ख़ां का संरक्षण मिल गया तो उन्होंने निज़ाम की उपाधि आसिफ़ के संदर्भ से फ़रहंग ए आसफ़िया के नाम से यह शब्दकोश प्रकाशित किया। यह उन्नीसवीं शताब्दी की गंगा-जमुनी तहज़ीब का एक ऐसा अल्बम है जिसमें उस दौर के रस्म रिवाज, परिधान, शायरी, साहित्यिक व शैक्षणिक शब्दावलियां,खान-पान, उठने बैठने आदि से संबंधित शब्दों का असीम भंडार मिलता है।

क्या आप जानते हैं?

शब्द 'आब' के मायने पानी या जल हैं लेकिन यह उर्दू शायरी और गद्य में अपने बहुत से रूप दिखाता है। कहीं अकेला और कहीं दूसरे शब्दों से मिलकर नई युक्तियों और मुहावरों के रूप में। कहीं यह सफ़ाई, चमक दमक और रौनक़ के मायने में तो कहीं तलवार की धार के मायने में इस्तेमाल होता है। शब्द 'आबरू' का भी इसी से रिश्ता है। आबरू का शाब्दिक अर्थ है चेहरे की चमक दमक और रौनक़ जो आमतौर पर मान सम्मान के मायने में इस्तेमाल होता है।
बना है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता
वगरना शह्र में ग़ालिब की आबरू क्या है
फ़रहंग ए आसफ़िया में 'आब' से संबंधित युक्तियां और मुहावरे छः पृष्ठों पर अंकित हैं।'आब' एक साथ दो बार लिखा हो तो शर्मिंदा होने के अर्थ में आता है।
तुम ने तो कह दिया मैं उन्हें जानता नहीं
हम आब आब हो गए ग़ैरों के सामने
यह शब्द कहीं आब ए बक़ा और आब ए हयात अर्थात अमृत बन जाता है तो कहीं खेतों में 'आबपाशी' यानी सिंचाई करता नज़र आता है। कश्मीरी भाषा में नहाने के पानी को आब कहते हैं।