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क्या आप जानते हैं?

मिर्ज़ा

ग़ालिब 13 बरस की उम्र में आगरा से दिल्ली चले आए। यहाँ कई किराए के मकान बदले। उन का आख़िरी मकान एक मस्जिद के साथ था। उसके बाद जो घर हक़ीक़ी तौर पर उन के नाम से मशहूर हुआ, वो दिल्ली के चाँदनी चौक के इलाक़े बल्लीमारान की गली क़ासिम जान में तीन कमरों पर मुश्तमिल घर था, जहाँ उन्हों ने अपनी ज़िंदगी के आख़िरी नौ साल गुज़ारे। ये अब ग़ालिब की हवेली कहलाता है। मौलाना हाली अपनी अज़ीम किताब ‘‘यादगार-ए-ग़ालिब’’ में लिखते हैं कि कुछ अर्से ग़ालिब अपने दोस्त काले ख़ान के मकान पर भी रहे। एक ज़माने में यहाँ लकड़ियों की टाल बन गई थी। इसे 1997 में भारत के महकमा आसार-ए-क़दीमा ने हासिल कर के इसे हेरीटेज साइट की हैसिय्यत दे दी। इस के पीछे देहली की एक मारूफ़ अदबी और समाजी शख़्सिय्यत फ़िरोज़ बख़्त और एक क़ानून दाँ अतयब सिद्दीक़ी की कोशिशें शामिल थीं, जिन्हों ने हवेली को हेरीटेज बनाने के लिए अदालत में एक पेटीशन दाख़िल की। एक तवील अर्से की क़ानूनी जंग के नतीजे में बिल-आख़िर 8 अगस्त 1997 को जस्टिस चंद्र मोहन नय्यर ने एक तारीख़ी फ़ैसला सुनाते हुए हुक्म दिया कि देहली हुकूमत 6 माह के अन्दर ग़ालिब की रिहाइश-गाह को महफ़ूज़ कर के उस अज़ीम शाइ'र के शायान-ए- शान एक यादगार क़ाएम करे।

क्या आप जानते हैं?

इज़हार

इज़हार-असर (1929.2011) एक दिलचस्प, हमा-जिहत शख़्सिय्यत थे। वो पहले ऐसे अदीब थे जिन्हों ने उर्दू में तसलसुल से साइंस फ़िक्शन लिखा। सिर्फ़ मैट्रिक पास थे लेकिन उर्दू और हिन्दी में  तक़रीबन एक हज़ार साइंसी, समाजी और जासूसी  नॉवेल लिखे थे। क्या आप जानते हैं कि वो कई बरसों तक कत्थक रक़्स का रियाज़ भी करते रहे थे। स्टेज शो भी किए और दूसरों को भी कत्थक सिखाया। उन्हों ने 200 साइंसी मज़ामीन लिखे थे जो हिन्द-ओ-पाक के रिसालों में शाए होते रहे और मज़ामीन के मजमूए ‘‘साइंस क्या है’’ और ‘‘आज की साइंस’’ भी शाए हुए थे। वो शायर भी थे और उन्हों ने साइंसी फ़िक्र और अमेजरी को नज़्मों में ढालने की भी कोशिश की। उन के शे'री मजमूए
‘‘ला-शरीक’’ में ज़ियादा तर नज़्में साइंसी मौज़ूआ'त पर हैं। शम्अ गुरूप के जासूसी नॉवेल ‘‘मुजरिम’’ के लिए ‘‘क़ानून वाला’’ नाम से लिखा करते थे। उनका एक रेडियाई ड्रामा ‘‘तीसरी आँख’’ बे-हद मक़्बूल हुआ था और आल इंडिया रेडियो के तमाम स्टेशनों से ब्राड कास्ट हुआ था। उन्हों ने दूसरे लोगों के लिए उनके नाम से क़लील मुआवज़ा ले कर सीरीयल भी लिखे थे। आज़ाद सहाफ़ी थे और कई रिसाले और डाइजेस्ट भी निकाले थे।
 मैं तो अफ़्लाक से आगे का परिंदा हूँ असर
 बाल-ए-जिब्रील भी शामिल है मिरे शहपर में

क्या आप जानते हैं?

वो अल्फ़ाज़ जो गुफ़्तुगू में हज़ारों बार बोले जाते हैं, उन पर ग़ौर करें तो वो भी बहुत से रूप दिखाते हैं। ऐसा ही मुआ'मला ‘न’ और ‘ना’ का है।
गूँजती है तिरी हसीं आवाज़
जैसे नादीदा कोई बजता साज़
जाँ निसार अख़्तर 

नादीदा या'नी जो नज़र न आ रहा हो। और इसी से मिलता-जुलता लफ़्ज़ है ‘नदीदा’ या'नी लालची शख़्स। इसका लफ़्ज़ी मतलब है, जिस ने देखा न हो। लालची शख़्स किसी चीज़ को ऐसे ही देखता है जैसे इस से पहले कभी उस ने देखी ही न हो। ‘ना’ दूसरे लफ़्ज़ों के साथ जुड़ कर नफ़ी का काम करता है जैसे ‘नालायक़’ ‘ना-ख़ुश’ वग़ैरा।
‘न’ और ‘ना’ और ‘नहीं’ कहाँ इस्ति'माल होगा कहाँ नहीं इस बारे में अहल-ए-ज़बान ख़ूब जानते हैं।  ‘न’ कहाँ लिखा और बोला जाएगा ग़ालिब के इस शे'र से वाज़ेह है:
न सुनो गर बुरा कहे कोई 
न कहो गर बुरा करे कोई
लेकिन फ़िल्मी शाइरी में जावेद अख़्तर के लिखे मशहूर गाने में ‘‘कुछ ना कहो- कुछ भी ना कहो’’
मौसीक़ी की ज़रूरत के तहत लिखा गया है और कुछ ऐसा बुरा भी नहीं लगता अब अहल-ए-ज़बान चाहे जो भी कहें।
‘ना’ का इस्ति'माल उर्दू में ताकीद और ताईद के लिए भी होता है:
किसी बुज़ुर्ग के बोसे की इक निशानी है
हमारे माथे पे थोड़ी सी रौशनी है ना

क्या आप जानते हैं?

जोश

जोश मलीहाबादी ने कुछ वर्ष पूने में शालिमार स्टूडियो में गुज़ारे और वहां कुछ फिल्मों के गाने लिखे। 1944 में रीलिज हुई मशहूर फ़िल्म "मन की जीत" जो मशहूर अंग्रेज़ी लेखक थामस हार्डी के उपन्यास "Tess of the d'Urbervilles" से प्रेरित थी और डब्ल्यू ज़ेड अहमद के निर्देशन में बनी थी, उस फ़िल्म के सात में से छः गाने जोश मलीहाबादी ने लिखे थे।
उस फ़िल्म में उनका एक गीत ज़ोहरा बाई अंबालेवाली का गाया हुआ बहुत मशहूर हुआ था,"मोरे जोबना का देखो उभार", तत्कालीन सरकार को उसका मुखड़ा अश्लील लगा था और उस गीत को आल इंडिया रेडियो से प्रसारित करने पर पाबंदी लगा दी गई थी। हालांकि उस गीत में महबूबा के हुस्न की मिसालें बहुत अनोखी थीं:
जैसे भंवरों की झूम
जैसे सावन की धूम
जैसे सागर की भोर
जैसे उड़ता चकोर
जैसे नदी की मौज
जैसे तुर्कों की फ़ौज
बिल्कुल इसी अंदाज़ पर बरसों बाद जावेद अख़्तर ने फ़िल्म "1942 ए लव स्टोरी" के लिए गाना लिखा था," एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा"।
जोश मलीहाबादी ने जितनी भी फ़िल्मों के लिए गाने लिखे वह कभी पहले से तैयार किए गए संगीत के अनुसार नहीं लिखे बल्कि हमेशा फ़िल्म की सिचुएशन के के अनुसार लिखे।उन फ़िल्मों के निर्देशक और संगीतकार की ज़िम्मेदारी थी कि वे उन्हें संगीत में ढालें।

क्या आप जानते हैं?

बिना तरन्नुम के शायरी सुनाने को "तहत उल लफ़्ज़" कहा जाता है जिस को "तहत में पढ़ना" भी कहते हैं। शायरी को तरन्नुम से पेश किया जाए तो तर्ज़ और पढ़ने वाले की आवाज़ श्रोताओं को ज़्यादातर आकर्षित रखती है, जबकि तहत उल लफ़्ज़ में शब्दों की शान, आवाज़ के उतार चढ़ाव से शायरी का पूरा लुत्फ़ आता है। मुशायरों में ग़ज़लें और नज़्में तहत में बख़ूबी पढ़ी जाती हैं लेकिन शोक सभा में तहत उल लफ़्ज़ मर्सिया पढ़ने वालों ने तो उसे एक विशेष नाटकीय कला में रूपांतरित कर दिया है। मशहूर मर्सिया गो मीर अनीस के एक समकालिक मशहूर शायर मीर अनीस की मर्सिया गोई के क़ाइल न थे, उन्होंने लिखा है कि एक बार संयोग से अनीस की मजलिस में शिरकत हुई, मर्सिया के दूसरे ही बंद की बैत (छंद):
सातों जहन्नुम आतिश ए फ़ुरक़त में जलते हैं
शोले तिरी तलाश में बाहर निकलते हैं
"अनीस ने इस अंदाज़ से पढ़ी कि मुझे शोले भड़कते हुए दिखाई देने लगे और मैं उनका पढ़ना, सुनने में ऐसा लीन हुआ कि तन बदन का होश न रहा।"
जब नई शायरी आज़ाद नज़्म के रूप में प्रकट हुई तो मुशायरों में उसको सुनने के लिए कोई आमादा नज़र नहीं आता था। मशहूर एक्टर और ब्राडकास्टर ज़िया मुहीउद्दीन ने नून मीम राशिद की नज़्में विभिन्न आयोजनों में सुनाने का प्रयोग किया। उन्होंने कुछ इस तरह ये नज़्में सुनाईं कि जिन श्रोताओं के लिए ये नज़्में अस्पष्ट और व्यर्थ और काव्यात्मक अभिव्यक्ति से दूर थीं, वो भी इस पढ़त के जादू में आ गए और उन्हें उन नज़्मों में शायरी भी नज़र आ रही थी और मायने भी।