aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
शब्दार्थ
मैं ने कहा कि बज़्म-ए-नाज़ चाहिए ग़ैर से तिही
सुन के सितम-ज़रीफ़ ने मुझ को उठा दिया कि यूँ
"ग़ुंचा-ए-ना-शगुफ़्ता को दूर से मत दिखा कि यूँ" ग़ज़ल से की मिर्ज़ा ग़ालिब