एहतमाम सादिक़ का परिचय
मुसलसल सोचते रहते हैं तुम को
तुम्हें जीने की आदत हो गई है
एहतमाम सादिक़, जिनका अस्ल नाम एहतमामुल-हक़़ है, मौजूदा उर्दू शायरी का एक अहम और नुमायाँ नाम हैं। वह 11 नवंबर 1993 को ज़िला बलरामपुर, उत्तर प्रदेश के क़स्बे गुलरिहा में पैदा हुए। उनके वालिद किताबुल्लाह (मरहूम) पेशे से किसान थे, जबकि वालिदा नाज़िमा ख़ातून एक घरेलू ख़ातून हैं। घर का अदबी और इल्मी माहौल उनकी तख़लीकी सलाहियतों को निखारने का सबब बना।
उन्होंने अपनी इब्तिदाई तालीम गुलरिहा के मदरसा जामिया अरबिया क़ासिम-उल-उलूम से हासिल की, जबकि सानवी तालीम के लिए मदरसा़ अरबिया ख़ैर-उल-उलूम, डुमरिया गंज का रुख़ किया। आला तालीम के शौक़ ने उन्हें दिल्ली की जानिब रवाना किया, जहाँ से उन्होंने 2018 में जामिया मिलिया इस्लामिया से बी.ए. (उर्दू) और 2020 में एम.ए. (उर्दू) मुकम्मल किया।
उर्दू ज़बान-ओ-अदब के फ़रोग़ के लिए उनकी बेपनाह मोहब्बत उन्हें 2022 में रेख़्ता फ़ाउंडेशन ले आई, जहाँ वह अब तक अपने इल्मी और अदबी सफ़र को जारी रखे हुए हैं।
शाइरी से उनका लगाव बचपन से था, लेकिन पंद्रह साल की उम्र में उन्होंने बाक़ायदा शेर कहने की तरफ़ तवज्जोह दी। 2016 से उनका अदबी सफ़र पूरी संजीदगी से शुरू हुआ, जो आज तक जारी है। उनकी शाइरी में रिवायत, तहज़ीब और जदीद एहसासात का एक दिलकश संगम नज़र आता है, जो उन्हें उनके हम-अस्र शाइरों में एक मुन्फ़रिद पहचान अता करता है।