फ़राग़ रोहवी के दोहे
कैसे अपने प्यार के सपने हों साकार
तेरे मेरे बीच है मज़हब की दीवार
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नफ़रत के संसार में खेलें अब ये खेल
इक इक इंसाँ जोड़ के बन जाएँ हम रेल
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भूल गए हर वाक़िआ बस इतना है याद
माल-ओ-ज़र पर थी खड़ी रिश्तों की बुनियाद
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कैसी कैसी बोलियाँ जुमले शब्द अनेक
दुनिया-भर में है मगर प्यार की भाषा एक
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चाहे भगवन बोलिए या कहिए ग़फ़्फ़ार
उस की तन्हा ज़ात है उस के नाम हज़ार
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पूरी कब हो पाएगी मेरे मन की बात
जितनी लम्बी है कथा उतनी छोटी रात
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